BJP : पॉवर सेंटर और जोर-आजमाइश का दौर..

गोपाल भार्गव
बुंदेलखंड के कद्दावर नेता भाजपा के सबसे सीनियर विधायक पंडित गोपाल भार्गव। कई सरकार में मंत्री रह चुके जो नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे। जिनकी अपनी बेबाकी भले ही उन्हें खुद संकट में डाल देती। लेकिन बिना लाग लपेट के ठेट बुंदेलखंडी लहजे में अपनी बात को वह कहने में नहीं चूकते। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज की मौजूदगी में गोपाल के लिए करने के लिए सदन में भले ही कुछ ज्यादा नहीं बचता। फिर भी उनके बयान सदन के अंदर ही नहीं बाहर भी सुर्खियां बनते रहे। नरोत्तम मिश्रा, राकेश सिंह के मुकाबले ज्यादा अनुभवी और वरिष्ठ गोपाल जरूरी बैठक के लिए ही दिल्ली जाते हैं। ज्यादातर समय गढ़ाकोटा में ही बीतता है। नेता प्रतिपक्ष हैं इसलिए भोपाल में अब पहले के मुकाबले ज्यादा रुकना पड़ता है तो भाजपा कार्यालय में उनका आना-जाना बढ़ चुका है। पंडित गोपाल भार्गव के लिए शिवराज सिंह चौहान को इग्नोर करना संभव नहीं तो चुनावी सभाओं में ही सही चौहान की तरफदारी उन्हें परेशानी में डाल चुकी।

फिलहाल भाजपा के अंदर ऐसा कोई नेता नहीं है जो गोपाल पर दबाव बना पाए या प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए उन्हें बिना भरोसे में लिए फैसले ले। संगठन महामंत्री सुहास भगत के बाद गोपाल ही वो नेता हैं जो शिवराज से लेकर राकेश सिंह के बीच तो नरोत्तम से लेकर शिवराज के बीच जब भी संकट भरोसे का पैदा होता तब अहम कड़ी साबित हो रहे हैं। जो राष्ट्रीय नेतृत्व के संपर्क में होने के बावजूद अलग से अपनी लाइन बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। अलबत्ता कांग्रेस और कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोलना हो तो फिर किस हद तक पहुंच जाएं। शायद उन्हें भी नहीं पता, नेता प्रतिपक्ष ऐसा नहीं कि उनसे चूक नहीं हुई। लेकिन वह अपनी गलती स्वीकार कर लेते। प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की अपेक्षाएं हों या फिर संगठन महामंत्री सुहास भगत की लाइन आगे बढ़ाना या फिर शिवराज के इरादों को भांप लेना गोपाल अब बखूबी समझ चुके। एक ब्राह्मण नेता वह भी अति पिछड़े बुंदेलखंड का पार्टी की बड़ी जरूरत बन चुका है। खासतौर से उमा भारती के बुंदेलखंड की राजनीति से दूरी बनाने के बाद, फिर भी भोपाल के लिए भाजपा विधायकों में अपनी स्वीकार्यता और भाजपा संगठन में अपनी धमक बनाना उनके लिए अभी भी किसी चुनौती से कम नहीं है।

कैलाश विजयवर्गीय
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पास भले ही पश्चिम बंगाल की एक बड़ी जिम्मेदारी हो, लेकिन मध्यप्रदेश में उनकी सक्रियता बढ़ चुकी है। जिनका मालवा-निमाड़ क्षेत्र में दबदबा छुपा नहीं। सुमित्रा महाजन ताई जैसे बड़े नेता के रहते कैलाश ने एक कद्दावर नेता के तौर पर इंदौर में खुद को स्थापित किया। तो दिल्ली में बढ़ते दखल ने उन्हें एक ऐसे भाजपा नेता के तौर पर स्थापित कर दिया है। जिनकी पहचान भगवाधारी दुपट्टा के साथ कट्टर हिंदुत्व के छवि वाले नेता की है।

विधायक रहते जिन्होंने खुद प्रदेश की राजनीति से कभी दूरी बना ली थी जिनके मंत्री रहते कैबिनेट के दूसरे सहयोगियों के मुकाबले शिवराज से टकराहट की चर्चा खूब होती थी। आज भी एक दबंग नेता के तौर पर जो कमलनाथ सरकार के खिलाफ अपनी पोजिशनिंग दर्शाते हैं। जबकि कांग्रेस पेंशन घोटाले को लेकर उन्हें निशाने पर लेती रहती बावजूद उनकी आक्रामकता और पलटवार में कोई कमी नहीं आई। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद उन्हें प्रदेश भाजपा नजरअंदाज नहीं कर सकता।

राहुल-सोनिया को निशाने लेने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देने वाले कैलाश का टारगेट ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर करना है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते अमित शाह की टीम में पहले ही शामिल हो चुके कैलाश दूसरे राष्ट्रीय पदाधिकारियों के मुकाबले ज्यादा एक्टिव तो अपने बयानों से सुर्खियों में बने रहते हैं। पुत्र आकाश विजयवर्गीय के विधायक बनने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति में खुद को सीमित किया लेकिन इन दिनों फिर सक्रिय हो चुके हैं। झाबुआ उपचुनाव का बयान हो या फिर बॉस के इशारे पर इस सरकार को गिरा देने का दावा करने वाले कैलाश की मध्यप्रदेश की राजनीति में भले ही पार्टी के कुछ नेताओं से मतभेद की खबरें आती रहीं ।बावजूद इसके प्रदेश संगठन विजयवर्गीय को नजरअंदाज नहीं कर पा रहा।

नरेंद्र सिंह तोमर
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मध्य प्रदेश भाजपा की राजनीति का इकलौता और सबसे बड़ा नाम । ग्वालियर चंबल की राजनीति से निकलकर पहले भोपाल अब दिल्ली में स्थापित हो चुके जो इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्रीय मंत्री अमित शाह दोनों के सबसे भरोसेमंद नेता के तौर दिल्ली में स्थापित हो चुके इससे पहले मध्य प्रदेश की सत्ता में रहते भाजपा की सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भरोसेमंद खुद को साबित कर चुके पार्षद से केंद्रीय मंत्री तक के सफर में उमा भारती बाबूलाल गौर शिवराज के मंत्रिमंडल का हिस्सा बने रहते दो बार प्रदेश के अध्यक्ष वह भी भाजपा को सत्ता में लौटाने वाले नेता का रिकॉर्ड जिनके नाम है।

भाजपा की केंद्रीय राजनीति में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राष्ट्रीय महामंत्री कई राज्यों के प्रभारी और मोदी सरकार के पहले और दूसरे मंत्रिमंडल का अहम हिस्सा फिलहाल मोदी सरकार के टॉप 5 मंत्रियों में शामिल नरेंद्र सिंह ने हमेशा पार्टी और संगठन की लाइन को ही आगे बढ़ाया। जिन्होंने कभी अपनी महत्वाकांक्षा उजागर नहीं होने की बावजूद इसके सफलता के पायदान वह चढ़ते चले गए मध्य प्रदेश के दूसरे नेताओं की तुलना में कम समय में अलग-अलग ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी निभाने और कसौटी पर खरा उतरने की उपलब्धि उनके नाम दर्ज है, जब भी मुख्यमंत्री रहते शिवराज के विकल्प के तौर पर मध्यप्रदेश में किसी एक नेता का नाम आगे आता था तो वह नरेंद्र सिंह तोमर ही थे ।

जिन्होंने भाजपा में क्षेत्रीय नेता के तौर पर अपनी अहमियत का एहसास करा कर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह से लेकर अजय सिंह का खुद को काउंटर साबित किया। नरेंद्र सिंह की गिनती इससे पहले राजनाथ सिंह के समर्थक के तौर पर होती रही लेकिन बदलते परिदृश्य में मोदी और शाह राजनाथ को बैलेंस करने के लिए इस क्षत्रिय नेता नरेंद्र सिंह को दूसरों के मुकाबले ज्यादा महत्व दे रहे अब जब मध्य प्रदेश में भाजपा विपक्ष की राजनीति कर रही तब नरेंद्र सिंह लगभग पूरी तरह से राज्य की राजनीति से दूरी बनाए हुए। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के प्रमुख दावेदार होने के बावजूद उन्होंने तीसरी बार संगठन की कमान संभालने से इनकार कर दिया था लेकिन सक्रिय रहने के लिए चुनाव अभियान समिति के प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभाली थी । अब जब मध्यप्रदेश में कई पावर सेंटर भाजपा के अंदर विकसित हो चुके हैं। तब भी नरेंद्र सिंह को नजरअंदाज करना प्रदेश के किसी नेता के लिए संभव नहीं है चाहे फिर वह प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सीएम इन वेटिंग का दावेदार ही क्यों ना हो अलबत्ता राज्यों की राजनीति में कई क्षत्रिय नेताओं के मुख्यमंत्री के तौर पर स्थापित होने के बावजूद मध्यप्रदेश में भाजपा में उनकी स्वीकार्यता को आने वाले समय में कोई खारिज नहीं कर सकता।

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