विधान परिषद के गठन को लेकर वाद-विवाद शुरू

मध्य प्रदेश सरकार ने विधान परिषद के गठन को लेकर जो शुरुआती तैयारियां शुरू की हैं उसको लेकर वाद विवाद की स्थिति बन गई है जबकि अभी इसकी गठन को लेकर एक लंबी यात्रा तय करना है। इसके पहले भी इसके गठन को लेकर प्रयास हो चुके हैं लेकिन वे अब तक फलीभूत नहीं हो पाए हैं। दरअसल विधान परिषद के गठन को लेकर सरकार ने तैयारियां शुरू की है उसके विरोध में भाजपा नेता राज्यपाल बुधवार को राज्यपाल से मिले और अपना विरोध दर्ज कराया जबकि संसदीय कार्य मंत्री डॉक्टर गोविंद सिंह का कहना है कि विधान परिषद के लिए विधानसभा में संकल्प पारित करने की जरूरत नहीं है

क्योंकि विधानसभा के गठन के समय ही यह तय कर दिया गया था कि विधान परिषद का गठन होगा। इस संबंध में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का कहना है कि कोई भी संकल्प विधेयक विधानसभा में पारित होने के बाद यदि क्रियान्वित नहीं होता है तो अस्तित्वहीन हो जाता है। विधानसभा में प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह का संबंध में कहना है कि सभी कानूनी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है और नियमों को खोजा जा रहा है फिर जाकर इस संबंध में कोई दिशा तय होगी। छत्तीसगढ़ विधानसभा बनने के बाद नए तरह की संवैधानिक स्थिति पैदा हो गई है। उसके लिए क्या-क्या संविधान में प्रावधान हैं कुछ दिन में समय स्पष्ट हो जाएगा। कुल मिलाकर विधान परिषद के गठन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं।

विधानसभा में संकल्प पारित करने के लिए दो तिहाई सदस्यों की जरूरत होती है जिसके लिए भाजपा का समर्थन जरूरी है और भाजपा जिस तरह से विधान परिषद के गठन को लेकर विरोध करने पर उतारू है उसे फिलहाल विधान परिषद के गठन की मुश्किल बढ़ती जा रही है। सत्ताधारी दल भले ही विधान परिषद की तैयारी जोर-शोर से करे लेकिन इसके लिए विधानसभा में संकल्प पारित होने से लेकर केंद्र सरकार की सहमति भी जरूरी है क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा में भी यह संकल्प पारित होना जरूरी है। जाहिर है विधान परिषद के गठन को लेकर भाजपा और कांग्रेस का साथ होना जरूरी था लेकिन दोनों दल जिस तरह से अलग-अलग राह पर चल पड़े हैं उससे एक बार फिर विधान परिषद का गठन खटाई में पड़ सकता है।

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