भय का वातावरण और नागरिक अधिकारों पर खतरा तो कैसा भरोसा !

विजय तिवारी

भारत के मनोनीत प्रधान न्यायाधीश शरद बोवड़े ने एक चैनल को दिये गए इंटरव्यू में देश की जनता को संदेश दिया कि वह अदालत पर भरोसा रखें। वे ऐसे समय में देश की सर्वोच्च न्यायपालिका की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं जब देश में अविश्वास और अनिश्चय से उत्पन्न भय का वातावरण है! दिल्ली के तीस हजारी अदालत में जिस प्रकार पुलिस और वकीलों में हिंसक झड़पें टीवी पर दिखाई पड़ीं और जिस प्रकार वकील जिन्हंे बार काउंसिल ऑफिसर ऑफ लॉ कहती-बताती है, उनके व्यवहार को देखकर आरक्षण समर्थकों अथवा छात्रों के आंदोलनों की याद आती है।

उधर पुलिस को पिटते देखकर उन लोगो को जरूर दिल में सकूं पहुंचा होगा, जो कभी इनके चंगुल में फंसकर जांच और पूछताछ की कार्रवाई के शिकार हुए होंगे! परंतु जिस प्रकार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर दोषारोपण किया है और पुलिस ने आंदोलन किया और उससे यह तो साफ है कि हालत ठीक-ठाक बिलकुल नहीं है और जिस प्रकार दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और जज हरीशंकर ने 3 नवम्बर को ही आदेश सुना दिया कि वकीलों के खिलाफ पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करेगी! जब रिव्यू पिटीशन लगाई गई तब पुनः मुख्य न्यायाधीश की खंड पीठ ने केंद्र सरकार (दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है) को निर्देश दिया कि अदालत के विगत आदेश में स्थिति स्पष्ट है अर्थात तीस हजारी या साकेत स्थित अदालत में वकील और पुलिस की भिड़ंत में कोई दोषी नहीं है! अब एक महिला पुलिस अधिकारी और उसकी सहायक महिला पुलिस सिपाही के साथ हुई बदसलूकी कोई अपराध नहीं हुआ! टीवी चैनल द्वारा दिखाये गए फुटेज में साकेत में मोटर साइकल सवार को काला कोट पहने और गले में बैंड लगाए लोग पीट रहे थे वह अपराध नहीं हुआ!

अदालत के इस फैसले के बाद पुलिस मुख्यालय पर अदालत पर भेदभाव और पक्षपात का सारेआम नारा लगाया गया। अगर वर्दीधारियों की भीड़ में से ऐसे नारे लगे तब निश्चय ही स्थिति को असामान्य ही कहा जाएगा। जब कानून के रखवाले और शांति व्यवस्था के जिम्मेदार के साथ जिंदगी और मौत की सजा सुनाने वाले जज साहब और अदालत पर भी अविश्वास सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया जाये तब प्रधान न्यायाधीश जी जनता किस प्रकार कानून और अदालतों की सच्चाई और निष्पक्षता पर भरोसा करे? उच्च न्यायालय ने तो दो निरीक्षकों को निलंबित और दो संयुक्त पुलिस आयुक्तों का तबादला करने का भी आदेश दिया था।

उच्च न्यायालय की इस कार्रवाई से आम लोगों के मन में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। यह तब किया गया जब अदालत ने पहले छ सप्ताह में घटना की न्यायिक जांच करने का निर्देश दिया था! उसके दरम्यान वकीलों को कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा कवच देने का कारण यह हो सकता है कि पुलिस निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं करे! तब उन झगड़े और बदतमीजियों के जिम्मेदारों के विरुद्ध कौन कार्रवाई करेगा! बार काउंसिल ऑफ इंडिया के बार-बार आग्रह पर भी वकील साहेबान काम पर नहीं लौटे! उधर अधिकारियों के समझाने पर पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी पर वापस आ गए और आंदोलन खत्म किया। भले ही पुलिस को समाज में खलनायक के रूप में देखा जाए पर बक़ौल हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘बात अगर हो लाख टके की, इनकी पीड़ा मिलकर देखो बिना पुलिस के चलकर देखो!’

अदालत की साख उसकी निष्पक्षता पर निर्भर करती है, वरना सजा तो पुलिस की हिरासत में भी होती है। कभी-कभी तो पूछताछ के दौरान ही आदमी दम तोड़ देता है। पुलिस हिरासत में होने वाली मौत हो अथवा पुलिस के गोली चालन की घटना हो उसकी जांच भी अदालती ही होती है! भारत के लोगों को न्यायालय में काले कोट में बैठे सज्जन की ईमानदारी पर भरोसा होता है परंतु जब पुलिस वालों का भरोसा अदालत से उठ जाये तब क्या होगा?

क्या जब नागरिकों की जासूसी के लिए बंदोबस्त हो रहा हो, जब काले धन के मामलों में सरकार लोगों के नाम अदालत के आग्रह के बाद भी सार्वजनिक नहीं करे? जब आम नागरिक से जुड़े मुद्दों पर सरकार की बेरुखी की अदालत अनदेखी कर दे! चार नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में व्याप्त प्रदूषण पर जिस तरह स्वयं नोटिस लेकर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों को फटकार लगाई वह ज्यूडिशियल एक्टिविज्म का बेहतर नमूना है परंतु वहीं सुप्रीम कोर्ट को उत्तरा प्रदेश सरकार द्वारा मंदिरों की जमीन के मामले में यह कहना पड़ा कि यूपी में क्या जंगल राज है?

दूसरी ओर उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश का तबादला और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर मीडिया में अनेक प्रकार की खबरें आती रही हैं। जैसे कलकता हाईकोर्ट की महिला जज का तबादला और जस्टिस कुरैशी को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करना फिर उन्हें त्रिपुरा जैसे राज्य में नियुक्त करना! अथवा पटना हाईकोर्ट के जज द्वारा न्यायपलिका के अंतर्गत व्याप्त अनुचित व्यवस्था की सार्वजनिक शिकायत पर उन्हें तबादला भुगतना पड़ा, साथ ही मुख्य न्यायाधीश का भी तबादला हो गया! इलाहाबाद हाईकोर्ट के भी एक जज साहब ने भी न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद का आरोप लगाया। उन्होंने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की! जबकि उन्हें अपनी तकलीफ देश के प्रधान न्यायाधीश को बतानी चाहिए! क्या इससे यह नहीं सामने आता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में भी सब ठीक-ठाक शायद नहीं है? जैसा प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के तीन जज धरने पर बैठे थे!

जब चुनाव आयोग के उस सदस्य को सरकार प्रताड़ित करे क्योंकि उसने अन्य दो सदस्यों के समान नरेंद्र मोदी और अमित शाह को लोकसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन की आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी अपने फैसले में बताया था! छपी हुई खबरों के अनुसार वित्त मंत्रालय ने उनके प्रशासनिक कार्यकाल की जांच के लिए विजिलेन्स जांच करने की कार्रवाई शुरू कर दी है! उधर सीबीआई के निदेशक (अवकाश प्राप्त) भी अपनी पेंशन और ग्रेच्युटी पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल के कृपापात्र के विरुद्ध जांच कराई थी। अब इस संदर्भ में जज लोया की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत की जांच और गुजरात के आईपीएस अफसर भट्ट की गिरफ्तारी भी निष्पक्ष न्याय का उदाहरण तो नहीं कहा जा सकता!

दूसरी ओर देखिये सीबीआई अदालत दिल्ली के जज साहेब ने पूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम की जमानत की अर्जी खारिज करते हुए उन्हें इमेक्स कांड का किंग पिन बताया! जबकि सीबीआई उनके विरुद्ध मात्र नौ लाख रुपये की हेरा-फेरी की चार्ज शीट उच्च न्यायालय में दाखिल की है। मजे की बात यह है कि यह फैसला उन्होंने अपनी नौकरी के अंतिम दिन सुनाया और दूसरे दिन ही उन्हें दिल्ली में भ्रष्टाचार निरोधक अधिकरण का अध्यक्ष बना दिया गया! इस संदर्भ में पूर्व प्रधान न्यायाधीश को अवकाश प्राप्त करने के बाद केरल राज्य का राज्यपाल बन दिया गया! अब इन सब कार्रवाइयों से जनता के मन में अदालत के प्रति भरोसा तो डिगता ही है।

बॉक्स प्रधान न्यायाधीश शरद बोवड़े ने न्यायपालिका और सरकार के मध्य मधुर संबंध होने की भी बात कही। शायद इधर कुछ समय में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के कुछ फैसलों पर विपरीत टिप्पणी की थी जिसमें आरक्षण कानून में गिरफ्तारी को लेकर मतभेद था। सरकार ना तो दलितों को नाराज करना चाहती थी और ना ही सवर्ण मतदाताओं को असंतुष्ट करना चाहती थी इसीलिए अदालत के फैसले के बाद संबंधित कानून को पुनः संशोधित कर पूर्व स्थिति को लाने का प्रयास किया। न्यायालय जहां नागरिक के मौलिक अधिकारों को महत्ता दे रहा था वहीं केंद्रीय सरकार चुनावी जमीन पर पकड़ बनाने पर जोर दे रही थी।

अगर सरकार से मधुर संबंध होंगे तब भीमाकोरे गांव के आरोपियों सुधा और अन्य की जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट अभी तक एक खंड पीठ नहीं बना पाया है! अभी तक पांच जजों ने इन आरोपियों की जमानत याचिका सुनने से पहले ही अपने को अलग कर लिया! यह बहुत असमंजस की स्थिति है कि याचिकाकर्ता की सुनवाई ही टलती जाए, सिर्फ तारीख पर तारीख पड़ती जाए। फिल्म दामिनी का यह डॉयलॉग इस स्थिति में मौजूं लगता है, जबकि इन आरोपियों के पास से किसी प्रकार के हथियार अथवा आपत्तिजनक साहित्य नहीं बरामद हुआ है। सिर्फ तोलस्टोय की वॉर एंड पीस को महराष्ट्र की अदालत ने आपत्तिजनक निरूपित किया। क्या ऐसे फैसलों से न्यायपालिका की निष्पक्षता रह पाएगी? अदालत को जनहितकारी मामले में नागरिकों का पक्ष लेना चाहिए अथवा सरकार का, यह तो अदालत को ही सोचना होगा। सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संवैधानिक संरक्षक है। नागरिकों की निजता पर जब राज्य का हमला हो रहा हो तब क्या मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट आगे आयेगा? भले ही उसे राज्य या सरकार के खिलाफ फैसला देना हो!

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