जय श्रीराम या वंदे मातरम या जन गण मन-मारपीट कर कहलाना!

दिल्ली के चुनाव परिणामों की घोषणा के समय भारतीय जनता पार्टी के आतुर देशभक्तों को कुछ ऐसे अवसर मिले थे जब मतगणना में उनके उम्मीदवार और आप के प्रत्याशी में सैकड़ो का अंतर रह जाता था। तब स्वयंसेवकों की टोली बड़ी ज़ोर से जय श्रीराम का घोष करती थी। पुलिस से शिकायत करने पर ईमानदार और निष्पक्ष पुलिस अधिकारी कहते थे कि यह तो धार्मिक नारा है इससे चुनाव आयोग के निर्देशों का उल्लंघन नहीं होता परंतु जब जवाब में आप वालों ने जय बजरंग बली का नारा बुलंद करना शुरू किया तब माहौल में गर्मागर्मी आने लगी।

जब ईमानदार दिल्ली पुलिस ने आप वालों को नारा लगाने से रोकने को कहा तब उन्होंने जय श्रीराम वालों को भी चुप करने को कहा। शायद देश के इतिहास में पहली बार धर्म और राजनीति की चाशनी बनाकर परोसने वाले सत्तारूढ़ दल तथा संघ के अनुषांगिक संगठनों को पुलिस ने जय श्रीराम का नारा लगाने से रोका। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि धार्मिक बयानों में भगवाधारी स्वयंभू संत कह गए हैं कि भगवान से भक्त बड़ा! परंतु यह एकमात्र घटना है जब जयघोष को रोकने वाले के विरुद्ध बयानबाजी नहीं हुई अन्यथा इन आतुर धर्म प्रेमियों के सामने ना तो कानून टिकता है ना ही कोई संगठन क्योंकि सत्ता का सहारा पाये ये वीर अकेले नहीं होते।

हमेशा झुंड में ही नारा लगाते, लोगों को डराते-लूटपाट करते, हिंसा करते निकल जाते थे, क्योंकि सत्ता या सरकार का संरक्षण इन शरीफ लोगों को होता था। बुलंद शहर में पुलिस के इंस्पेक्टर की बजरंग दल और स्वयंसेवक संघ के संयोजक ने हत्या कर दी परंतु पुलिस अपने ही साथी के हत्यारों को नहीं पकड़ पा रही थी. क्योंकि कहते हैं कि उस स्वयंसेवक को योगीजी का अभयदान था। जब उस घटना का वीडियो बाज़ार में आ गया, जिसमें उसकी भूमिका साफ नजर आने लगी तब लज्जित होकर उससे सरेंडर कराया जैसा कि ‘गंगाजल’ फिल्म में किया गया था।

आतंक के बल पर राष्ट्रवादी और देशभक्त बनाना

अभी हाल में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों में एक वीडियो आया जिसे बीबीसी ने अपने समाचार बुलेटिन में दिखाया कि किस प्रकार चार पुलिस के जवान जमीन पर घायल पड़े पांच लोगों पर डंडे और लात मारकर कह रहे कि चलो राष्ट्रगान सुनाओ। अब कराहते हुए उन लोगों ने दो लाइनें बोली भी फिर उन बहादुर पुलिस वालों ने कहा कि चलो भारत माता की जय बोलो, तब उन घायल लोगों ने जय भी बोली। अब उन जवानों को इतना तो मालूम है कि राष्ट्रगान लेट कर नहीं गाया जाता, बल्कि खड़े होकर और वह भी सावधान की मुद्रा में अलर्ट होकर गाया जाता है।

जब बीबीसी ने इस वीडियो पर दिल्ली पुलिस से प्रतिक्रिया मांगी तो वो मौन रहे, चुपचाप रहे यानि कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसी तारतम्य में 3 मार्च को भारतीय जनता पार्टी के संसदीय दल की बैठक में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर व्यंग्य किया कि भारत माता की जय बोलने से उन्हें बू आती है। मोदीजी बू तो आपके द्वारा अपने पूर्व के प्रधानमंत्री को ना समझने से आती है। आपने ही तो झारखंड की कुनवी सभा में बोला था कि मैं कपड़ों से पहचान जाता हूं कौन है? जब आप इतने सक्षम हैं तो यह भी जन गए होंगे कि ज़मीन पर पड़े हुए लोग किस समुदाय के हैं।

ईस्ट इंडिया कंपनी के समय मध्य भारत में ठग बहुत थे जो तीर्थ यात्रियों की टोली में भजन गाते-बजाते हुए चलते थे।फिर जैसे ही मौका मिलता था वे रेशमी रुमाल से यात्री का गला घोंट देते थे और बहुत ज़ोर का जयकारा बोलते थे, ‘जय महाकाली।’ इतना ही नहीं, वे माथे पर लाल टीका, रामनामी दुपट्टा ओड़े रहते। लोगो की धार्मिक आस्था का ये ठग लाभ उठाते थे। उनके द्वारा महाकाली का जयकारा कोई पुण्य नहीं हो जाता था, वे थे तो हत्यारे ही।

आखिरकार लॉर्ड विलियम बेनतिक ने कर्नल स्लिमन को इन ठगों को पकड़ने का हुकुम दिया। फौज देख कर ठग तितर-बितर हो गए। फिर स्लिमन ने तीर्थ यात्रियों का भेष बनाकर ही उनके लोगों को पकड़ा। उनके सरदार ने कहा कि हम तो महाकाली के नाम पर काम करते हैं पर स्लीमन ने जब पकड़-पकड़ कर सडकों पर उन्हें खुलेआम फांसी पर लटकाया तब धर्म के नाम से लूट और हत्या की यह प्रथा बंद हुई। लॉर्ड विलियम बेनतिक ने ही सतीप्रथा को भी बंदा कराया था। सोचें वह एक व्यापारिक कंपनी का अधिकारी था जिसका काम कंपनी के व्यापार को सुचारु रूप से चलाना, पर उसने आर्य सभ्यता में पौराणिक समय की कुछ कुरीतियों को धर्म के नाम पर नहीं चलने दिया और यहां तो कानून का खुलेआम उल्लंघन ही जय श्रीराम के नारे से होता है।

मोदीजी ने सांसदों से कहा कि देश को तोड़ने वालों के खिलाफ खड़े रहना है। देश के विभाजन को 70 वर्षों में खतरा नहीं हुआ सिर्फ अभी हुआ। क्योंकि आपकी सरकार ने देश के भिन्न-भिन्न धर्म के समुदायों के लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया, जो कल तक सरकार चुनते थे जिन्होंने आपको चुना उन्हीं से नागरिक होने के दस्तवेजी सबूत मांगे। जिन दस्तावेज़ों को पहले तक स्वयंसिद्ध प्रमाण माना जाता था, उन्हें भी िटब्यूनल और उच्च न्यायालय तक अमान्य करते हैं। मजे की बता यह है कि हाईकोर्ट यह भी नहीं बताता कि कौन सा दस्तावेज़ अंतिम है जो उनकी नागरिकता सिद्ध कर दे।

अब बात गलत और सही नारे की। हैदराबाद में संचार माध्यम की छात्रा अमूल्य लियोना द्वारा लगाए गए नारों की। अमूल्य ने मंच से हिंदुस्तान िजंदाबाद के बाद पाकिस्तान जिंदाबाद, भूटान जिंदाबाद, चीन जिंदाबाद और अफगानिस्तान, ईरान, श्रीलंका, म्यांमार जिंदाबाद के नारे भी लगाए। पर तेलंगाना पुलिस-प्रशासन को सिर्फ पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा आपत्तिजनक, आपराधिक लगा और पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (राजद्रोह) में उसके खिलाफ प्राथमिकी लिखी जबकि दिल्ली के दंगों में नफरत भरे भाषण देने वाले चार नेताओं के खिलाफ हाईकोर्ट के न्यायाधीश के निर्देश को उसी कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 5 हफ्ते की तारीख दी क्योंकि सरकारी वकील की दलील थी कि अभी गिरफ्तारी होने से माहौल गड़बड़ हो जाएगा परंतु अमूल्य के मामले में तो शक्ल देखकर कानूनी कार्रवाई हुई। संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी और कानून के सामने सभी नागरिकों की बराबरी का वादा सिर्फ कागजी रह गया है।

अंत में यही लिखना है कि कानून तो सब अच्छे हैं पर उनका अनुपालन करने वाले ही जय श्रीराम कहने वाले बन गए। गौरतलब है कि आजकल शवयात्रा में भी यही नारा लगता है। फर्क इतना है कि उसमें सिर्फ एक आवाज़ ही निकलती है बाक़ी लोगों के सर झुके रहते हैं।

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