झाबुआ में ‘शिवराज’ को दांव पर लगाने के मायने..!

राकेश अग्निहोत्री

भोपाल। भाजपा के अंदर उठापटक खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पहले भी नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव के कई बयान उनकी अपनी पार्टी के नेताओं को चौंका चुके। तो एक बार फिर भार्गव चर्चा में। वह भी तब जब भाजपा संगठन सदन में अपने विधायकों की संख्या को दुरुस्त कर रहा था और झाबुआ जीतने के लिए वह गंभीर हो चला। झाबुआ से लेकर भोपाल तक नेता प्रतिपक्ष पर दोपहर से लेकर रात तक फोकस बना रहा। कभी सदस्यता अभियान तो अब संगठन चुनाव में व्यस्तता का हवाला देकर जो भाजपा पिछले 10 माह में कमलनाथ सरकार के खिलाफ माहौल नहीं बना पाई।

आखिर क्या वजह है कि उसने झाबुआ उपचुनाव में अपने नेता पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दांव पर लगा दिया। जिस तरह नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने झाबुआ में जीत के साथ शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर मुख्यमंत्री की शपथ बनाने का वादा और दावा किया है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तो सवाल गोपाल भार्गव की अपने इस बयान से मुकर जाने को लेकर भी खड़े हो रहे हैं क्या प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व के इशारे पर पहले उन्होंने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात कही या फिर यह उनकी अपनी निजी राय थी और राष्ट्रीय नेतृत्व के इशारे पर बाद में पलट गए। जो भी हो पार्टी के अंदर कई नए सवाल खड़े हो चुके है।

शिवराज आदिवासियों के बीच काफी लोकप्रिय रहे जो अपनी सरकार की योजनाओं को बंद किए जाने पर आपत्ति जताते हुए झाबुआ चुनाव प्रचार में कूद चुके। सुबह से लेकर देर रात तक चाहे बिजली गुल हो छोटी बड़ी सभाओं के जरिए कांतिलाल और कमलनाथ पर निशाना साध रहे। मतदाताओं की नब्ज पर हाथ रखकर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने की उनकी कोशिश से निर्णायक दौर में भाजपा कुछ बेहतर स्थिति में आकर खड़ी नजर आ रही। नरेंद्र सलूजा की बिना समय गवाएं सामने आई प्रतिक्रिया के साथ कांग्रेस ने तो मजाक उड़ाना भी शुरू कर दिया। इसे संयोग माना जाए या फिर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा। जो सोमवार को जब झाबुआ में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव युवा मोर्चा के मंच पर शिवराज की मौजूदगी में दीपावली के बाद एक बार फिर मामा की शपथ का वास्ता देकर वोट मांग रहे थे। लगभग उसी समय भोपाल के प्रदेश भाजपा कार्यालय में पूर्व संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ भाजपा के विधायक रहते कांग्रेस के पाले में जा चुके नारायण त्रिपाठी की री एंट्री प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह की मौजूदगी में कराई जाती है।

चर्चा नारायण त्रिपाठी पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के संपर्क में आ चुके और झाबुआ में माहौल बनाने के लिए भाजपा ने यह समय चुना। जो नरोत्तम मिश्रा के साथ झाबुआ उपचुनाव के प्रचार का भी हिस्सा बनेंगे। यदि उधर सनसनी फैला देने वाले गोपाल भार्गव के बयान पर गौर करें तो शिवराज को छोड़कर मंच और सामने उपस्थित समर्थक सभी ताली बजा रहे थे। यदि दोनों घटनाक्रम को भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय झाबुआ में दिए गए बयान से जोड़कर देखा जाए तो इसे भाजपा की रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा। ऐसे में भाजपा की यह कोशिश कांग्रेस और कमलनाथ सरकार के खिलाफ घेराबंदी माना जा सकता तो भाजपा ने इससे पहले अपना घर दुरुस्त साबित करने के लिए पहले विधायक शरद कौल फिर नारायण त्रिपाठी का कांग्रेस से मोहभंग और भाजपा में भरोसा जताने की स्कि्रप्ट को आगे बढ़ाया तो सवाल यहीं पर खड़ा होता है कि क्या भाजपा में गुटबाजी का जो संदेश कार्यकर्ताओं को विचलित कर रहा था उस पर अब विराम लगेगा या फिर पंडित गोपाल भार्गव का यह बयान खेमेबाजी को और बढ़ावा देगा। जो पार्टी के अंदर एक नई बहस छेड़ेगा। झाबुआ उपचुनाव अभी तक सबसे ज्यादा व्यक्तिगत तौर पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह की नेतृत्व क्षमता से जुड़ चुका था। जो प्रदेश अध्यक्ष की एक और पारी खेलने की मंशा इशारों-इशारों में जाहिर कर चुके।

ऐसे में पंडित गोपाल भार्गव के बयान के साथ भाजपा द्वारा शिवराज को झाबुआ में दांव पर लगा देना सिर्फ चुनाव जीतने की रणनीति का हिस्सा माना जाएगा या फिर इससे उलट कोई नई कहानी सामने आएगी। भाजपा के अंदर मेल-मुलाकातों और कमरा बंद बैठ को पर गौर किया जाए तो गोपाल भार्गव यदि शिवराज के नजदीक जाते हुए नजर आ रहे तो पूर्व संसदीय मंत्री पंडित नरोत्तम मिश्रा की भी शिवराज से कुछ दिन पहले हुई मुलाकात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिनके बारे में चर्चा होती रही कि नेता प्रतिपक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष कि उनकी राह में शिवराज रोड़ा बनते रहे। भाजपा के दूसरे नेताओं की भूमिका पर गौर किया जाए तो राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय व्यक्ति से ज्यादा पार्टी के हित में कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम कमलनाथ सरकार को गिरा देने के दावे के साथ कर चुके।

ऐसे में शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की पिछले दिनों हुई मुलाकात को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। यही नहीं, शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह के पुराने प्रगाढ़ संबंध आने वाले समय में भाजपा की इंटरनल पॉलिटिक्स में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा के लिए झाबुआ उपचुनाव का अपना महत्व उसकी जीत-हार के अपने मायने लेकिन उससे ज्यादा महत्व संगठन चुनाव का जहां अभी राष्ट्रीय नेतृत्व को यह तय करना है कि राकेश सिंह एक और पारी खेलेंगे या फिर कमलनाथ सरकार से मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अमित शाह के नेतृत्व में कोई नई स्कि्रप्ट मध्यप्रदेश के लिए लिखी जाएगी। जो भी हो लेकिन जिस तरह कैलाश विजयवर्गीय से लेकर शिवराज सिंह चौहान, गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा के अलावा राकेश सिंह और सुहास भगत प्रदेश की राजनीति में कुछ ज्यादा ही संजीदा अब नजर आने लगी है।

तो निश्चित तौर पर भाजपा के अंदर कोई खिचड़ी जरूर पक रही है। यह महज संयोग नहीं हो सकता कि पहले भटक गए दो विधायकों को पार्टी मीडिया के मार्फत कमलनाथ के खिलाफ खड़ा दिखाएं और फिर झाबुआ चुनाव जीतने के लिए ही सही कमलनाथ सरकार को गिरा देने का दावा किया जा रहा। नए सवाल गोपाल भार्गव के युवा मोर्चा के मंच से दिए गए बयान और कुछ घंटे बाद ही इंदौर में अपने बयान से पलट जाने को लेकर खड़े हुए हैं। लेकिन सवाल फिर भी जस का तस झाबुआ में जीत के लिए यदि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मामा के तौर पर दांव पर लगाया जा रहा तो हार का ठीकरा किसके सिर फूटेगा। आखिर शिवराज को लेकर भाजपा के अंदर कन्फ्यूजन कब कैसे खत्म होगा। देखना दिलचस्प होगा पंडित गोपाल भार्गव का बयान शिवराज और भाजपा को कितनी ताकत देता। कहीं यह दांव झाबुआ में भाजपा को उल्टा तो नहीं पड़ जाएगा जहां कांग्रेस का सरकार में रहते जीत का दावा अभी तक ज्यादा मजबूत नजर आ रहा।

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