‘पदलिप्सा’ ने लोकतंत्र को जमींदोज किया..?

ओमप्रकाश मेहता

राष्ट्र के अंदर समाहित महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के बाद पिछले एक पखवाड़े से

‘पदलिप्सा’ का नाटक खेला जा रहा है,

और यहां राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद भी इस नाटक का पटाक्षेप नजर नहीं आ रहा है,

अभी भी यहां के राजनेता अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त है।

…और यदि सत्ता के अमृत के प्याले से चूकी भाजपा और उसके प्रधानमंत्री जी विरोधियों को प्रतिशोध का ‘‘डोज़’’ देनेे से बाज नहीं आए तो

छः महीनें बाद महाराष्ट्र में पुनः चुनाव के माध्यम से जनता की खून पसीने की कमाई का हजारों करोड़ रूपया फिर जाया होगा

और देश की जनता को मूकदर्शक बनकर यह ‘दुखांत नाटक’ देखने को मजबूर होना पड़ेगा।

आज की राजनीति का यह सबसे अहम् दुःखद नाटक होगा, जिसने प्रजातंत्र को निर्वस्त्र होने को मजबूर कर दिया है।

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यदि देश के अन्य प्रान्तों में भी यही नाटक खेला जाने लगा तो देश के प्रजातंत्र की आयु अत्यंत अल्प हो जाएगी और फिर प्रजातंत्र के लिए

आंसू बहाने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहेगा।

देश की मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र से चाहे ‘तीन तलाक’ का कलंक मिटा दिया हो,

किंतु राजनीतिक क्षेत्र में यह प्रथा जोर-शोर से जारी है और अब तो स्वयं भाजपा को ही इससे अभिशप्त होने को मजबूर होना पड़ रहा है।

राष्ट्र के प्रमुख राज्य महाराष्ट्र में पिछले महीने राज्य विधानसभा के चुनावा सम्पन्न हुए,

ये चुनाव भाजपा और शिवसेना ने एकजुट होकर लड़े थे

और इस गठबंधन ने सत्ता के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा भी हासिल कर लिया था,

इसलिए परिणाम घोषित होने पर किसी की भी यह कल्पना नहीं थी कि महाराष्ट्र में किसी राजनीतिक नाटक के प्रहसन लिखे जा रहे हैं,

बल्कि आशंका हरियाणा को लेकर थी जहां सत्तारूढ़ भाजपा बहुमत हासिल करने में कुछ पीछे रह गई थी

किंतु वहां के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने जोड़तोड़ करके पूर्व कांग्रेस नेता के प्रपौत्र से राजनीतिक गठबंधन किया और सरकार बना ली,

जबकि महाराष्ट्र में जहां सरकार आसानी से बनती नजर आ रही,

वहां भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने चुनाव पूर्व वादे का रायता फैला दिया और स्थिति गठबंधन तोड़ने केन्द्र से अपने मंत्री का इस्तीफा

दिलवाने और राजनीतिक गाली-गलौच तक पहुंच गई।

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शिवसेना की दलील थी कि भाजपाध्यक्ष अमित शाह के सामने चुनाव पूर्व सत्ता प्राप्ति पर पचास-पचास प्रतिशत भागीदारी की बात हुई थी,

जिसमें मुख्यमंत्री का पद भी शामिल था,

जबकि भाजपा पहले ही दैवेन्द्र फणनवीस को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर चुकी थी,

इस दलीय विग्रह के बाद ‘तीन तलाक’ लागू हो गया और भाजपा अल्पमत में आ गई

और अंततः उन्होंने राज्यपाल को सरकार नहीं बनाने का

टका सा जवाब दे दिया।

इसके बाद शिवसेना ने कांगेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस की ओर रूख किया,

किंतु दोनों दल एक सप्ताह तक फैसला नहीं कर पाए कि उन्हें

शिवसेना के साथ सरकार बनाना है या नहीं,

इधर राज्यपाल ने भाजपा के बाद शिवसेना से पूछा सरकार बना सकने के बारें में किंतु कांग्रेस व एनसीपी की ढीली नीति के कारण राज्यपाल

ने राष्ट्रपति शासन की विधिवत घोषणा कर दी गई।

किंतु इस नाटक का दुःखद अंत हो जाने के बाद शिवसेना व दोनों कांग्रेस ‘मुर्दालोकतंत्र’ में जान फूंकने के प्रयास जारी रखे हुए है

और आश्वस्त है कि अगले छः महीनें में तो वे बहुमत जुटा ही लेंगे।

यद्यपि शिवसेना का आरोप है कि राज्यपाल ने उन्हें समर्थन जुटाने का पर्याप्त समय नहीं दिया और कांग्रेस का कहना है

कि राज्यपाल ने उन्हें अपना बहुमत सिद्ध कर सरकार बनाने का मौका ही नहीं दिया,

लेकिन ये दल यही अपने आरोप सही भी मानते है तो यह क्यों भूलते है कि आज देश में मोदी के राज्यपाल है,

और उनका नियंत्रण अघोषित

रूप से केन्द्रीय गृहमंत्री के हाथों में है, जो अभी भी भाजपा के अध्यक्ष है।

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इस प्रकार कुल मिलाकर इस नाटक को ‘दुःखांत’ बनाने में किसी एक दल विशेष की नहीं

बल्कि महाराष्ट्र के सभी राजनीतिक दलों व कथित रूप से महामहिम राज्यपाल की भूमिकाएँ अहम् रही।

अब तो यही उम्मीद करें कि इसका मंचन किसी अन्य राज्य में न हों?

इस प्रकार कुल मिलाकर विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ ऐसे प्रयासों का शुभारंभ हो गया है,

जिससे यहां के लोकतंत्र को केवल क्षति ही नहीं बल्कि खात्में तक की आशंका पैदा हो सकती है?

जिस देश में ‘कुर्सी’ सबसे अहम् मान ली जाए और देश व देशवासियों को गौण मान लिया जाए,

वहां के लोकतंत्र की दुर्गति की कल्पना भी संभव नहीं है,

इसलिए इस देश में तो अब प्रजातंत्र या लोकतंत्र का भगवान ही मालिक रहेगा।

भगवान इस नाटक के पात्रों को सद्बुद्धि प्रदान करें।

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