कुछ तो मजबूरियां.. यूं कोई बेवफा नहीं होता…

महाराष्ट्र में बीजेपी द्वारा सरकार नहीं बनाए जाने का फैसला लिए जाने के साथ देश की नजर शिवसेना पर आकर टिक गई। अब एनडीए गठबंधन से दूर जा रही शिवसेना को साबित करना है कि सरकार बनाने के लिए उसके पास जरूरी विधायकों का समर्थन है।

शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत लगातार इस बात का इशारा करते रहे। यदि बीजेपी सबसे बड़े दल होने के नाते शिवसेना के नेतृत्व में सरकार नहीं बनाती तो भी शिवसेना का ही मुख्यमंत्री बनेगा।

सोमवार को राज्यपाल और एनसीपी से शिवसेना नेताओं की मुलाकात जब होगी तो नई सरकार के गठन की संभावनाओं का सस्पेंस भी काफी हद तक खत्म हो चुका होगा। पर्दे के पीछे शिवसेना एनसीपी के सीधे संपर्क में आ चुकी है तो कांग्रेस की भूमिका तय होना क्योंकि विधायकों का एक खेमा सरकार में शामिल होना चाहते।

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बहुमत सिद्ध करने के लिए सदन में शिवसेना को सिर्फ एनसीपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के समर्थन की भी दरकार रहेगी। यानी सोनिया गांधी और शरद पवार ने जिस कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को सामने रखकर विधानसभा का चुनाव लड़ा था। उसमें से शिवसेना के साथ कौन किस शर्त पर सरकार में शामिल होगी या नहीं, यह फार्मूला गौर करने लायक होगा। क्योंकि शिवसेना ने पहले ढाई साल में अपना सीएम बनाए जाने की मांग पर ही भाजपा से दूरियां बनाई।

अभी तक आदित्य ठाकरे को शिवसेना का मुख्यमंत्री का उम्मीदवार माना जाता था तो आप उद्धव ठाकरे के नाम की चर्चा है। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि आखिर टूटते गठबंधन के साथ नए सिरे से बनते बिगड़ते यह सियासी रिश्ते सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करेंगे या फिर राष्ट्रीय राजनीति में भी इसके दूरगामी असर देखने को मिलेंगे।

देश की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी जिसने शिवसेना के साथ चुनाव लड़कर सबसे ज्यादा सीट पर जीत हासिल की। जिसने जहां चाहा उस राज्य में अपनी सरकार बनाई आखिर बड़ा दल होने के बावजूद यदि वह महाराष्ट्र में क्यों सरकार नहीं बना पा रही तो फिर इसकी वजह क्या है.. आखिर शिवसेना ने अपना सीएम बनाए जाने की जिद क्यों की।

क्या नरेंद्र मोदी, अमित शाह की भाजपा के साथ बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच उसने यह मान लिया था कि भाजपा की सरकार में रहते वह महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले समय में और कमजोर साबित हो सकती है। शिवसेना ने आखिर आक्रामक रुख क्यों अख्तियार किया और समझौते की सभी संभावनाओं पर विराम लगाया। क्या हिंदुत्व की विचारधारा के बावजूद भाजपा के साथ रहते अस्तित्व का संकट उसे सताने लगा था।

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उद्धव ठाकरे ने भले ही देवेंद्र फड़नवीस पर सीक्रेट फार्मूले समेत झूठ बोलने के गंभीर आरोप लगाए लेकिन सवाल क्या रिश्तों में कड़वाहट की वजह है सिर्फ देवेंद्र या फिर अमित शाह से भी रिश्तों में दरार पहले ही आ चुकी थी। तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि भाजपा जिसने हरियाणा में भी अपने विरोधी के साथ मिलकर सरकार बना ली।

आखिर शिवसेना से दूरी बनाने की नौबत क्यों निर्मित की, क्या यह भाजपा की दूरगामी रणनीति का हिस्सा है। जो वह आने वाले समय में विपरीत विचारधारा की एनसीपी और कांग्रेस के इस घोषित-अघोषित गठबंधन के साथ शिवसेना को एक्सपोज कर महाराष्ट्र में अकेले दम पर ही आगे बढ़कर दिखाएगी तो सवाल पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का समर्थन कर उनकी सरकार बनाने वाली एनसीपी ने इस बार मोदी और शाह की भाजपा से दूरी क्यों बनाई।

क्या चुनाव से पहले केंद्रीय जांच एजेंसियों के फैसलों ने पवार को बीजेपी नेतृत्व से पूरी तरह दूरी बनाने को मजबूर कर दिया था। या फिर कांग्रेस से ज्यादा सोनिया गांधी पर भरोसा कर वह मोदी और शाह को चुनौती देने की कोई नई स्कि्रप्ट महाराष्ट्र से लिखकर शरद पवार आगे बढ़ाना चाहते। तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर शरद पवार ने खुद मुख्यमंत्री का दावा क्यों नहीं पेश किया। क्या शिवसेना को भरोसे में लेकर अब कांग्रेस के साथ मिलकर एनसीपी भाजपा के खिलाफ सैद्धांतिक मतभेदों की इस लड़ाई को और आगे ले जाने की योजना पर काम करेगी।

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सवाल यह भी खड़ा होता है कि महाराष्ट्र के इस अप्रत्याशित गठबंधन का दूसरे राज्यों की राजनीति में कांग्रेस को क्या हासिल होगा.. तो सवाल कांग्रेस शिवसेना और एनसीपी महाराष्ट्र में बन गई इन नई परिस्थितियों के जरिए आखिर अपने अपने सियासी हित कब तक साथ देंगे। क्या गारंटी है कि इस गठबंधन से नाखुश इन दलों के ही विधायक भविष्य में भाजपा के खेमे में खड़े नजर नहीं आएंगे।

तो सवाल बीजेपी के चाणक्य अमित शाह के लिए इस बार महाराष्ट्र में सरकार बनाकर दिखाने की रणनीति क्यों कामयाब नहीं हो पाई। आखिर शिवसेना की नाराजगी की मुख्य वजह क्या थी। क्या देवेंद्र फडणवीस का नेतृत्व उसे स्वीकार नहीं था तो उसकी वजह पिछला कार्यकाल और उसके खट्टे मीठे अनुभव।

क्या वह प्रेशर पॉलिटिक्स के जरिए मोदी और शाह को मजबूर कर रही थी कि किसी और नेता का नाम सामने लाए। राम मंदिर का फैसला सामने आने के बाद उद्धव ठाकरे 24 नवंबर को अयोध्या जाने का ऐलान कर चुके हैं तो लालकृष्ण आडवाणी से लेकर संघ से अपने रिश्ते मैं कड़वाहट नहीं आने के संकेत दिए थे।

ऐसे में जब भाजपा धारा 370 से लेकर राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार को ही क्रेडिट देने लगी है। ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है हिंदुत्व और भगवाधारी पॉलिटिक्स में शिवसेना ने भाजपा से दूरी बनाना क्यों मुनासिब समझा।

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जहां तक बात मोदी और शाह की भाजपा की है तो क्या उसे अब अपनी छवि की चिंता सता रही है वह अपने ऊपर जोड़-तोड़ से सरकार बनाने का आरोप अब नहीं लगने देना चाहती है, या फिर राम मंदिर के फैसले के बाद राज्यों की राजनीति में उलझकर किसी बड़े लक्ष्य से वह भटकना नहीं चाहती है।

तो सवाल शिवसेना जैसे ही सबसे पुराने अकाली दल गठबंधन के साथ भी भाजपा के रिश्ते में भी कोई बदलाव देखने को मिलेगा या फिर गठबंधन की कि इस फ्रिक्शन पॉलिटिक्स का असर दिल्ली के बाद बिहार में भी देखने को मिल सकता है। यह सवाल इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र में बीजेपी ने मैदान छोड़ दिया तो शिवसेना मुख्यमंत्री अपना बनाने के लिए मोर्चा संभाले हुए।

जिन्होंने विधानसभा चुनाव साथ साथ लड़ा था, यानि महाराष्ट्र की सियासत ऐतिहासिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है । जब पूरा देश का फोकस अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसला बना हुआ था तब महाराष्ट्र में सियासी सरगर्मियां तेज हुई और शाम ढलते-ढलते राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने शिवसेना से सरकार बनाने पर उनका नजरिया पूछ लिया।

इससे पहले भाजपा ने सदन में बहुमत सिद्ध करने के लिए जरूरी विधायक संख्या ना होने का हवाला देकर सत्ता से दूर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। इस बीच एनसीपी का बयान हमारे पास समर्थन नहीं कि वह सरकार बना सके। लेकिन यदि शिवसेना को हमारा समर्थन चाहिए तो उसे मोदी सरकार में शामिल अपने मंत्रियों को बाहर निकालना होगा।

यह सब घटनाक्रम तेजी से तब बदला जब एनसीपी ने अपने विधायक दल की बैठक 12 नवंबर को बुलाई थी। उधर कांग्रेस ने अपने विधायकों को राजस्थान में एकजुट बनाए रखने के लिए फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व पर छोड़ दिया।

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