नरेश लाल : अंडमान का रंगदूत - Naya India
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नरेश लाल : अंडमान का रंगदूत

गिरिजाशंकर

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय यानी एनएसडी से निकलकर कुछ रंगकर्मी मुम्बई की राह पकड़ते हैं तो कुछ अपने-अपने शहरों में लौटकर रंगकर्म करने लगते हैं। नरेश लाल उन्हीं में हैं जो अपने शहर लौटकर थियेटर कर रहे हैं। 20 साल पहले वे अंडमान से एनएसडी आये और निदेशन में पढ़ाई पूरी कर वापस अंडमान लौट गये और पिछले लगभग दो दशक से वहीं थियेटर कर रहे हैं। उनकी रंगयात्रा काफी दिलचस्प है। अंडमान द्वीप में थियेटर जैसा तो कुछ था नहीं, हाँ रामलीलायें जरूर हुआ करती थी।

नरेश के पिता स्व. सरजूलालजी भी रामलीला ग्रुप चलाते थे जिसमें नरेश अभिनय भी करते थे। उनके पिता ने रामलीला में लगभग 4 दशक तक रावण की भूमिका अदा की, अपनी अंतिम सांस तक। नरेश के पिता चाहते थे कि नरेश कुछ और न बनकर रंगकर्मी बने ताकि उनकी रामलीला की परंपरा को वह आगे बढ़ा सके। रंगकर्म में दिलचस्पी तो थी ही, पिता की इच्छा का सम्मान भी करना था। उसी दौरान उन्होंने एनएसडी में प्रवेश के लिये आवेदन किया और चुन लिये गये। 90 में उनकी एनएसडी की शिक्षा-दीक्षा पूरी हुई और वे वापस पोर्टब्लेयर यानी अंडमान वापस लौट गये। एक बात जान ले कि एनएसडी में कोई फेल होता ही नहीं। एक बार प्रवेश मिल गया तो पास आउट होकर ही निकलना है।

रंगमंच के निदेशक बनकर अंडमान जब लौटे तो उन्होंने पहले रामलीला की शैली में कुछ परिवर्तन शुरू किया। मसलन प्रांपटिंग से संवाद बोलने की शैली बदलकर पूरा संवाद नाटक की तरह याद कराया जाने लगा। ऐसी कुछ और तब्दीलियों के साथ रामलीला को नया स्वरूप उन्होंने दिया। एक बदलाव और आया, पहले वे अपने पिता के निर्देशन में रामलीला करते थे, अब वे रामलीला खुद निर्देशित करने लगे और उनके निर्देशन में पिताजी काम करने लगे। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपना रंग समूह बनाना शुरू किया तथा रामलीला के साथ ही हिन्दी रंगमंच करने लगे। अंडमान वालों के लिये यह नया अनुभव था। नरेश के सामने अपने नाटकों के लिये दर्षक वर्ग बनाने की चुनौती थी। इसके लिये उन्होंने आडिटोरियम के बजाय चौपाल व गली मुहल्लों में नाटक करना शुरू किया। उनके अनुसार दर्शकों को नाटक देखने के लिये बुलाने के बजाय हम खुद उनके पास जाकर नाटक करने लगे। नुक्कड़ नाटकों के जरिए सामाजिक मुद्दे हम उठाते रहे हैं।

नरेश ने स्व. मोहन राकेश लिखित आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस व आधे अधूरे सहित दो दर्जन से अधिक नाटकों का निदेशन व मंचन किया जिनमें थैंक्यू मि. ग्लाड, कबीरा खड़ा बाजार में, तुगलक, किसी एक फूल का नाम लो आदि शामिल है। नरेश के अनुसार अंडमान में वैसे तो महिला पात्रों की ज्यादा समस्या नहीं है लेकिन वहां नई पीढ़ी के लोगों में नाटकों के प्रति अधिक उत्साह नजर नहीं आता।
पोर्ट ब्लेयर यानी अंडमान द्वीप समूह में विभिन्न भाषाओं को बोलने वाले रहते हैं फिर भी बोलचाल की मुख्य भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी वैसी नहीं जो हिन्दी पट्टी के राज्यों की है बल्कि मिली जुली जिसे हिन्दूस्तानी कह सकते हैं। इसीलिये यहां हिन्दी रंगमंच की स्वीकार्यता की संभावना बनी रही है जिसका बेहतर ढंग से दोहन करने का काम नरेश कर रहे हैं। चूंकि पूरे अंडमान राज्य में एनएसडी पास आउट वे अकेले ही हैं जो यहां लगातार रंगमंच कर रहे हैं, इसलिये सरकारी अनुदान मिलने में दिक्कते नहीं रही। शुरूआती सालों में उन्होंने अनुदान लिया भी लेकिन पिछले कुछ सालों से इसे बंद कर दिया। उनका कहना है कि कागजी औपचारिकतायें इतनी अधिक है कि उससे रंगमंच का काम प्रभावित होता है। सरकारी अनुदान नहीं लेने वाले वे अकेले नहीं है। कई राज्यों में ऐसे अनेक रंगकर्मी हैं जो लाल फीताशाही के चलते सरकारी अनुदान लेने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते।

अंडमान का थियेटर एक तरह से देश के दृश्य से अलग-थलग ही बना हुआ है। गैर हिन्दीभाषी राज्यों के रंगमंच की पहचान उनकी भाषा के कारण उभरती है लेकिन चूंकि अंडमान राज्य हिन्दीभाषी राज्य माना जाता है लिहाजा क्षेत्रीयता की पहचान का संकट यहां के रंगमंच के सामने है। अंडमान में कोई बड़ा नाट्य समारोह नहीं होता इसलिए हिन्दीभाषी राज्यों के नाटकों का मंचन वहां नहीं होता और अंडमान थियेटर की सक्रिय भागीदारी हिन्दीभाषी राज्यों के नाट्य समारोहों में नजर नहीं आती। नरेश के नाटक जरूर अंडमान के बाहर मंचित होता रहा है।
नरेशचंद्र लाल के खाते में रंगमंच के अलावा भी बहुत कुछ उपलब्धियां हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान का अंडमान के लिये ब्रांड एम्बेस्डर बनाया गया है। साथ ही सेंसर बोर्ड का सदस्य भी नियुक्त किया गया है। इसे अंडमान से अकेले एनएसडी से निकले रंगकर्मी होने का लाभ भी कह सकते हैं कि उन्हें ऐसी अन्य जिम्मेदारियां सरकार द्वारा सौंपी गई है। उन्होंने गांधी पर एक फिल्म बनायी 2011 में जो बेहद सराही गई और 2016 में उन्हें इसके चलते पद्मश्री के अलंकरण से नवाजा गया।

नरेश द्वारा लिखी इस कहानी में गांधी जीवित रूप से स्कूल बच्चों से मिलते हैं और उन्हें बताते हैं कि वे गांधी हैं तो बच्चे उनसे कहते हैं कि उन्हें तो यह पढ़ाया गया है कि आपकी हत्या कर दी गई। गांधी कहते हैं कि नहीं मैं आज भी जिंदा हूँ और वे बच्चों को लेकर उन स्थानों पर ले जाते हैं जहां सत्य, अहिंसा, गैर छुआछूत, श्रम की महत्ता जैसे उनके पूण्य यथार्थ दिखाई पड़ते हैं और गांधी कहते हैं कि इन जगहों पर आज भी जिंदा हूँ। जब मैंने उनसे पूछा कि आप नाटककार हैं तो इस पर नाटक क्यों नहीं खेला तो उनका कहना था आप सही कह रहे हैं। अब मैं इस पर नाटक तैयार करूंगा। वैसे दो दशक तक अंडमान द्वीप में लगातार थियेटर करना और करते रहना, मेरी समझ से उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि और हिन्दी रंगमंच के प्रति बड़ा योगदान माना जाना चाहिए।

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