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अब विदेशी वैक्सीन का इंतजार

भारत ने सारी दुनिया में करीब सात करोड़ वैक्सीन बांट दिए या बेच दिए और अब दुनिया के दूसरे देशों से वैक्सीन आने के इंतजार में बैठा है। भारत का वैक्सीनेशन अभियान लगभग ठप्प पड़ गया है या तेजी से दौड़ने की बजाय रेंग रहा है क्योंकि भारत के पास वैक्सीन नहीं है। 18 साल से उपर की उम्र के नौजवानों को वैक्सीन लगाने की मंजूरी तो सरकार ने दे दी लेकिन यह सोचा ही नहीं कि उनके लिए वैक्सीन कहां से आएगी। सो, पहले दिन एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन कराया पर वे समय हासिल नहीं कर पाए। कई राज्यों ने वैक्सीनेशन का चौथा चरण यानी 18 साल से ऊपर की उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने का अभियान रोक दिया है। वैक्सीन की कमी से उनके यहां वैक्सीनेशन केंद्र बंद हो रहे हैं।

सोचें, भारत ने सात करोड़ वैक्सीन बांटी है या बेची है और अब एक करोड़ डोज के लिए अमेरिका का मुंह देखा जा रहा है। अमेरिका ने अभी तक वैक्सीन की एक भी डोज किसी देश को नहीं दी है। वह एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं कर रहा है फिर भी करोड़ों डोज उसने स्टोर करके रखी है। अब भारत चाहता है कि उसमें से एक करोड़ डोज वह भारत को दे दे। इसी तरह रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी का रास्ता देखा जा रहा है, जिससे चौथे चरण का अभियान आगे बढ़ेगा। यह वैक्सीन आयात होकर आ रही है और इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का आभार जता दिया है। सोचें, यह नेतृत्व की कैसी अदूरदर्शिता है, जो उसने अपनी उत्पादन क्षमता पर विचार किए बगैर, उसका आकलन किए बगैर दुनिया भर के वैक्सीन भेजनी शुरू कर दी थी?

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