संगठन मंत्रियों की भूमिका में बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव

भाजपा ने मंडल और जिला समितियों के निर्वाचन से पहले संगठन मंत्रियों की भूमिका और क्षेत्र विशेष की जिम्मेदारी में बड़ा बदलाव कर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को चौंका दिया है। खासतौर से उन्हें जो अपनी पसंद के मंडल और जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर तैनात संगठन मंत्रियों पर निर्भर होकर रह गए थे। संगठन चुनाव की प्रारंभिक प्रक्रिया के तहत जब 60 हजार से ज्यादा बूथों की जमावट का काम भाजपा ने पूरा किया, लेकिन दीपावली से पहले पूर्व निर्धारित प्रक्रिया के तहत संगठन के अगले चरण के चुनाव आगे बढ़ा दिए गए, जो दीपावली के बाद नवंबर से आगे बढ़ेंगे।

शायद मध्यप्रदेश में भाजपा के अंदर यह पहला मौका होगा, जब संगठन चुनाव की प्रक्रिया के बीच में ही संगठन मंत्रियों को इधर से उधर कर दिया गया। यह सब कुछ उस वक्त सामने आया, जब 15 साल सत्ता में रहने के बाद भाजपा पिछले 10 माह में विपक्ष की भूमिका को लेकर ज्यादा संजीदा कम से कम जनता के बीच नजर नहीं आई। यही नहीं कुछ विरोध प्रदर्शन को छोड़ दिया जाए तो इस दौरान बीजेपी कमलनाथ सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर दबाव नहीं बना पाई। इस बीच मिशन मोदी को लेकर जरूर मध्यप्रदेश में पार्टी ने एक नया इतिहास लिखा, लेकिन इसका श्रेय मोदी मैजिक और शाह के मैनेजमेंट हो ही गया। झाबुआ उपचुनाव को लेकर देर से ही सही बीजेपी सक्रिय हुई, लेकिन इससे पहले तक भाजपा के अंदर से बड़े जिम्मेदार नेताओं के बीच समन्वय का अभाव ही नहीं, रणनीति को लेकर असमंजस और विरोधाभास कई बार चर्चा का विषय बना। तो संकेत यही गया कि सत्ता से दूर होने के बाद नए नेतृत्व को लेकर भाजपा कई गुटों में बढ़ चुकी है।

लोकसभा में जीत के बाद मध्यप्रदेश भाजपा के कई नेता पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में सत्ता और संगठन में अपना दबदबा बनाए रखने में सफल रहे, लेकिन मध्यप्रदेश की सियासत में भाजपा से प्रदेश की जनता ही नहीं, उनके अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को जो उम्मीदें थीं वह विपक्ष में रहते शायद पूरी नहीं हो सकती। झाबुआ उपचुनाव के परिणाम की बिना प्रतीक्षा किए पूर्वसंध्या पर ही प्रदेश अध्यक्ष ने लिखित आदेश के साथ 5 संगठन मंत्रियों के बीच नए सिरे से कार्य का बंटवारा कर दिया। इंदौर के जयसिंह छाबड़ा को छोड़ दिया जाए तो दूसरे संगठन मंत्रियों को नए क्षेत्र के दायित्व सौंपे गए। इस फेरबदल में विवादों में रहने वाले आशुतोष तिवारी को भोपाल संभाग की जिम्मेदारी से जोड़े रखते हुए उन्हें सागर से बाहर निकालकर उनके अपने गृह क्षेत्र ग्वालियर संभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। यानी सबसे ज्यादा फायदे में कोई रहा तो आशुतोष, जिनका प्रदेश की राजधानी में दखल बरकरार रहेगा और अपने घर में भी रसूख और रुतबे का इस्तेमाल हस्तक्षेप के साथ करा सकते हैं। इसी के साथ ग्वालियर-चंबल संभाग से सबसे वरिष्ठ संगठन मंत्री शैलेंद्र बरुआ को बाहर निकालकर जबलपुर और होशंगाबाद की नई जिम्मेदारी सौंप दी गई। ग्वालियर यानी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह के एक छत्र राज और दबदबे वाला संभाग, जहां से शैलेंद्र बरुआ को मुक्त करते हुए जबलपुर यानी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के अपने गृह क्षेत्र में तैनात कर दिया गया।

शैलेंद्र बरुआ इससे पहले इंदौर यानी मालवा क्षेत्र तो सागर संभाग यानी बुंदेलखंड में लंबे समय तक पार्टी की सेवाएं करते रहे। अनुभवी जितेंद्र लिटोरिया को विंध्य क्षेत्र यानी रीवा-शहडोल संभाग से मुक्त करते हुए उज्जैन संभाग भेजा गया है, जहां संघ की गतिविधियां और सक्रियता दूसरे संभागों के मुकाबले ज्यादा रहती हैं। शायद निर्विवाद और बेहतर परिणाम लाने का पारितोषिक उन्हें मिला। इसी तरह जबलपुर संभाग के लो प्रोफाइल संगठन मंत्री यानी केशव भदौरिया को बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हुए 2 जिलों से आगे अब सागर और चंबल संभाग भेजा गया। तो श्याम महाजन जो अभी तक होशंगाबाद, सीहोर, नरसिंहपुर यानी नर्मदापुरम संभाग की जिम्मेदारी निभा रहे थे उन्हें रीवा और शहडोल तैनात किया गया। अलबत्ता एक ओर ग्वालियर और चंबल में अलग-अलग संगठन महामंत्री की नियुक्ति लेकिन रीवा शहडोल संभाग एक साथ सौंपे गए।

भाजपा के सामने कमलनाथ सरकार रहते जब आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा का पुराना वर्चस्व बरकरार रखने की मानी जा रही, तब पार्टी कार्यकर्ताओं को भी इंतजार कि आखिर संगठन की कमान प्रदेश में आने वाले समय में कौन संभालेगा? सवाल झाबुआ उपचुनाव के परिणाम का इंतजार न करते हुए आखिर संगठन मंत्रियों को इधर से उधर क्यों किया गया? क्या उपचुनाव परिणाम को लेकर बीजेपी कॉन्फिडेंट नहीं है कि वह विधानसभा में जीत हासिल करने वाली यह सीट विपक्ष में रहते बचा सकती है? क्या भाजपा नेताओं और उसके नीति निर्धारकों को झाबुआ में हार की आशंका को ध्यान में रखते हुए यह जमावट पहले ही करनी थी? संगठन मंत्रियों की टीम का नेतृत्व यूं तो विशेषाधिकार के साथ संगठन महामंत्री करते हैं, लेकिन अधिकार क्षेत्र प्रदेश अध्यक्ष का ही माना जाता है तो सवाल इस फैसले की टाइमिंग को लेकर जरूर खड़े हो रहे हैं। सवाल यह लंबे चिंतन मंथन का नतीजा है या फिर बदलती परिस्थितियों सुहास भगत को कार्यकर्ताओं और नेताओं को संदेश देने के लिए संगठन मंत्रियों के जरिए यह संदेश देना पड़ा।

फिर भी आखिर भाजपा के अंदर संगठन मंत्रियों का बदलाव किसने, क्यों और किस लिए किया? क्या यह प्रदेश अध्यक्ष व संगठन महामंत्री की सहमति का फैसला है या फिर इसके पीछे वजह कुछ और है? नई जमावट का मकसद संगठन चुनाव को निष्पक्ष साबित करना है । या फिर संगठन मंत्रियों की भूमिका को लेकर प्रदेश नेतृत्व नए सिरे से सोचने और समझने को मजबूर हुआ। तो क्या यह संगठन मंत्रियों के लिए नई चुनौती है या फिर इसे उनके खिलाफ शिकायत और भरोसे की कमी का नतीजा माना जाए। पिछले दिनों जिस हनीट्रैप की चर्चा ने बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया था और इसके तार भाजपा के पूर्व मंत्री, जिम्मेदार नेता और संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े नेताओं से भी जोड़े जा रहे थे तो सवाल क्या इस फैसले के बाद संगठन मंत्रियों को कम से कम हनीट्रैप मामले में पार्टी नेतृत्व ने अपनी ओर से हरी झंडी दे दी है। यदि इनमें से कोई भी संगठन मंत्री नई जिम्मेदारी और भूमिका में ड्रॉप कर दिया जाता तो शायद कामकाज की समीक्षा और परफॉर्मेंस से ज्यादा चर्चा हनीट्रैप से जोड़कर ही की जाती.. क्योंकि मालवा क्षेत्र के एक संगठन मंत्री ऐसे ही विवादों के कारण कार्यमुक्त किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर मंडल और जिलाध्यक्ष के निर्वाचन से पहले संगठन मंत्रियों की भूमिका में फेरबदल से जो संदेश निकलकर सामने आया उसमें इंदौर और भोपाल संभाग यानी तो बड़े महानगरों के संगठन मंत्री को न छेड़ते हुए जबलपुर और ग्वालियर में बड़ा बदलाव किया गया है।

तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या विधानसभा चुनाव के परिणाम को ध्यान में रखते हुए देर से ही सही इन संगठन मंत्रियों को उनके परफॉर्मेंस से जोड़कर बदला गया.. क्योंकि कांग्रेस के मुकाबले 5 सीट पिछड़ गई भाजपा को ग्वालियर से लेकर जबलपुर, उज्जैन और सागर क्षेत्र में बड़ा झटका चुनाव परिणामों ने दिया था। सवाल यह भी खड़ा होता है कि वर्तमान सांसद, केंद्रीय मंत्री, राष्ट्रीय पदाधिकारी, वर्तमान विधायक, पूर्व मंत्री और पूर्व विधायकों के लिए इस फेरबदल में कोई बड़ा संदेश संगठन चुनाव को लेकर क्या पार्टी ने अपनी ओर से दे दिया है। नई भूमिका में इन संगठन मंत्रियों के लिए नए क्षेत्र में क्या मनमानी पर रोक लग सकेगी तो सवाल इससे फायदा किसको मिलेगा? क्या संगठन महामंत्री जिनके ऊपर संगठन चुनाव की बड़ी जिम्मेदारी उन्हें इस फैसले से सबसे ज्यादा ताकत मिलेगी या फिर इस फेरबदल की आड़ में प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने शिवराज सिंह चौहान, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान और संगठन महामंत्री सुहास भगत की जमावट को तोड़ने के लिए नई व्यवस्था और जमावट बनाई है। सुहास भगत को छोड़कर उनकी टीम में कोई भी संगठन मंत्री प्रचारक की पृष्ठभूमि का नहीं है। अधिकांश पूर्णकालिक ही हैं। इनमें से कुछ लोग चुनाव लड़ने की तमन्ना भी रखते हैं।

जहां तक बात संगठन महामंत्री सुहास भगत की है तो उन्होंने अपने कार्यकाल में अरविंद मेनन की बनाई टीम पर इन्हें विचार परिवार के प्रति समर्पित मानकर भरोसा बरकरार रखते हुए उनसे ही काम लिया है। यदि ऐसे में संगठन मंत्री के तौर पर कोई नया चेहरा सामने नहीं आया तो फिर इस फेरबदल की आवश्यकता आखिर सुहास भगत को क्यों महसूस हुई? यह वह सवाल है जिसका जवाब या संकेत मंडल-जिलाध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष के निर्वाचन में देखने को मिल सकता है। सवाल जिस भाजपा में नेतृत्व का संकट गहराता जा रहा उस संगठन में आखिर सुहास भगत का बढ़ता वर्चस्व आने वाले समय में क्या गुल खिलाएगा..?

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