शांति और संयम की बयार के संकेत समझें दल

दरअसल भारतीय जनमानस कुछ कुछ समय के अंतराल के बाद अपनी ताकत दिखा देता है तब भी राजनीतिक दल अपने मैनेजमेंट में लगे रहते हैं लेकिन अंततः होता वही है जो जनता चाहती है।

तब सब प्रकार के मैनेजमेंट फेल हो जाते हैं जब जनता नहीं चाहती। देश के राजनीतिक दलों को अपने कैडर पर बहुत अभिमान रहता है लेकिन अनेक बार जनता ने कैडर को ठेंगा दिखाया है।

अब समय आ गया है जब देश में विवादास्पद मुद्दों का निपटारा तेजी से हो जाए और फिर बेरोजगारी पर, शिक्षा पर, महंगाई पर, किसानों की समस्याओं पर, महिलाओं की समस्याओं पर देश में बात हो, काम हो और समस्याओं का निराकरण हो।

बहरहाल लगभग 500 साल की लंबी लड़ाई के बाद 166 सालों तक अदालतों के चक्कर लगाने के बाद अयोध्या में मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला आ गया।

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इस फैसले के आने के बाद शासन-प्रशासन को आशंका थी कि कहीं कोई अप्रिय घटना घटित हो जाए लेकिन पूरे देश में शांति और संयम की जो बयार बही उसमें ही स्पष्ट संकेत हुए हैं कि अब देश की जनता क्या चाहती है। भले ही लोग अपनी-अपनी पीठ थपथपाएं कि हमने कानून व्यवस्था बनाए रखी लेकिन जनता जो तय कर लेती है वही होता है और अब देश की जनता तय कर चुकी है कि उसे धार्मिक या जाति मुद्दों में ना उलझाया जाए।

अब बेरोजगारों को रोजगार चाहिए। रोजमर्रा की चीजें सस्ती होना चाहिए। किसानों की समस्याओं का निराकरण होना चाहिए, देश में मां-बहनें सुरक्षित होना चाहिए। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए और राजनेताओं का आम जनता के प्रति व्यवहार सहज और सरल होना चाहिए।

अब जो भी दल इन संकेतों को समझेगा और उस पर काम करेगा जनमानस उसी तरफ करवट लेगा। उसे अब मैनेजमेंट से मैनेज नहीं किया जा सकता है। उसे तो सरकार के काम ही मैनेज कर सकते हैं जो सरकारें निर्भय होकर बिना वोट की राजनीति की चिंता किए काम करेंगी आम जनता उसी को पसंद करेगी।

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छोटे-छोटे चुनाव में धार्मिक और जातीयता के आधार पर वोट मांगने वाले नेताओं को भी संभलकर सावधान होना चाहिए। अब नई पीढ़ी निर्णायक स्थिति में आ गई है। जो किसी भी प्रकार की संकीर्णता में भरोसा नहीं करती है। ना तो वह छल-कपट, पाखंड करने वालों को महत्त्व देगी और ना ही चुनाव के समय नेताओं के होने वाले प्रचार-प्रसार से प्रभावित होगी।

वह तो अब हर दिन मूल्यांकन करेगी। हर बात की समीक्षा करेगी और एक-एक करके अपनी धारणा बनाती जाएगी। जिसे चुनाव के समय तोड़ना संभव नहीं होगा। अब तक राजनीतिक दल और अधिकांश नेता चुनावी वर्ष में ही लोकलुभावन काम करने लगते हैं। व्यवहार में सहजता और सरलता दिखाने लगते हैं।

बाकी 4 वर्षों तक वह अपने अभिमान में चूर रहते हैं। यहां तक कि अपने कट्टर समर्थकों तक को याद नहीं करते लेकिन अब ऐसा आगे से नहीं होगा। जागरूक जनता और जागरूक मतदाता सही और गलत को पहचानने में दुविधा नहीं रखते। जिस पर भरोसा करते हैं उसी को समर्थन देते हैं। अतः समय आ गया है कि भरोसा जीतें चुनावी मैनेजमेंट के भरोसे ना रहें ना धार्मिक उन्माद के भरोसे रहें ना जातीय संख्या के भरोसे रहें।

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कुल मिलाकर राजनीति में नया दौर आ रहा है और यह दौर उन नेताओं और दलों के लिए अच्छा है। जो काम करना चाहते हैं, निर्णय लेना जानते हैं और जो समाज और देश की भलाई की भावना लेकर काम करते हैं। आजादी के आंदोलन से लेकर अब तक के तमाम इतिहास के पन्ने जब-जब पलटे जाएंगे तब-तब राजनीतिक दलों और नेताओं को सबक मिलता रहेगा कि महात्मा गांधी ने कैसे पूरे देश को आजादी के आंदोलन के लिए तैयार किया।

उन्होंने कोई आडंबर नहीं रचा, कोई रुतबा नहीं दिखाया और ना ही धनबल और बाहुबल एकत्रित किया, जबकि आज के नेता सफलता के लिए यही सब जोड़ने में लगे रहते हैं। यदि वे मानव शक्ति को जोड़ें तो उससे उन्हें स्थाई लाभ होगा।

जाहिर है एक बार फिर देश ने शांति और संयम की बयार के माध्यम से राजनीतिक दलों और नेताओं को संकेत दे दिए हैं कि देश में जनता जो चाहती है वही होता है और आज का जनमानस सही के प्रति स्वीकृति बना चुका है उसे अब बहला-फुसलाकर। भड़काया नहीं जा सकता।

यदि आपको जनसमर्थन चाहिए तो राजनीतिक दल की तरह नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की तरह न्याय व्यवस्था अपने दलों के अंदर कायम कीजिए और नेता भी व्यक्तिगत तौर पर मूल्यांकन के आधार पर कार्य करें तभी उनकी लोकप्रियता बढ़ेगी अन्यथा सत्ता के समय अवसरवादियों से घिरे रहने वाले नेता सत्ता जाने के बाद अकेले नजर आते हैं।

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