कम से कम हमारे शहीदों को तो बख्शो..? - Naya India
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कम से कम हमारे शहीदों को तो बख्शो..?

ओमप्रकाश

भारत की राजनीति का स्तर अब कौन से पाताल लोक में ले जाया जाएगा, यह आम आदमी की समझ से परे है, क्योंकि आज के राजनेता अपने किए गए कार्यों पर नहीं शहीदों के नाम पर वोट मांगने लगे है, केन्द्र में मौजूदा सत्ताधारी दल ने अब तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को राजनीति का मोहरा बना रखा था, किंतु अब अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए आजादी के शहीदों का कद उनके ही क्षेत्रों में जाकर उनके नाम पर वोट की फसल काटने के उद्देश्य से उनका कद छोटा किया जा रहा है, जिसका ताजा उदाहरण देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हेतु जारी संकल्प पत्र में महाराष्ट्रीयन शहीद विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को ‘भारतरत्न’ की पदवी से सम्मानित करने का वादा करना है और प्रधानमंत्री द्वारा महाराष्ट्र चुनाव प्रचार में इस वादे का बार-बार जिक्र करना है।

वीर सावरकर को छिछली राजनीति को मोहरा बनाने से न सिर्फ सावरकर जी के जीवन से जुड़ी वे किस्से-कहानियां उजागर की गई जो उन्हें विवादित व निंदा का पात्र बनाती है, बल्कि उनकी गरिमा भी कम करती है। जबकि पूरे देश में वीर सावरकर एक सर्वमान्य स्वतंत्रता सेनानी रहे है, जिनकी महात्मा गांधी ने भी तारीफ की थी, अब उनको राजनीति का मोहरा बनाने के बाद उन्हें बापू की हत्या का साझेदार तक कहा जा रहा है, जबकि देश की नई पीढ़ी सावरकर जी के ऐसे किसी इतिहास को नहीं जानती थी और वे नई पीढ़ी के भी प्रेरणा स्त्रोत रहें, किंतु अब वही नई पीढ़ी उन्हें अब किस नजरिये से देखने लगी है, यह किसी से भी छुपा नहीं है?

दूसरे भारतीय जनता पार्टी ने अपनी स्वार्थ लिप्सा के कारण शहीदों को राष्ट्रीय परीधि से निकालकर क्षेत्रीय खांचे में डालने का भी प्रयास किया है, जो सावरकर जी पूरे देश के स्वातंत्र्य इतिहास के प्रमुख पात्र थे, अब उन्हें क्षेत्रवाद का अंग बना दिया, यही स्थिति चलती रही तो वीर सुभाष पश्चिमी बंगाल तक, चन्द्रशेखर आजाद मध्यप्रदेश तक और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उत्तरप्रदेश तक सीमित होकर रह जाएगी, क्योंकि अब इन प्रसिद्ध शहीदों के परिजनों ने भी अपने पूर्वज शहीदों के लिए ‘भारतरत्न’ की मांग शुरू कर दी है, तो यह देश पसंद करेगा? यदि यही सिलसिला जारी रहा तो प्रत्येक शहीद के मौजूदा परिजन अपने-अपने पूर्वज शहीद के लिए देश के सर्वोच्च सम्मान की मांग करेंगे, या उस वक्त का इंतजार करंेगे जब उनके क्षेत्र में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव हो और राजनीतिक दल उनके शहीद पूर्वजों को ‘भारतरत्न’ देने का वादा अपने संकल्प पत्र में करें? और यदि यह चलन पूरे देश में शुरू हो गया तो शहीद पूर्वजों की आत्माएंे आज की राजनीति व उनके नेताओं को कैसी दुआएं या बददुआऐं देगी?

जब देश में सत्तारूढ़ पार्टी व उसके दिग्गज नेता अपने चुनाव प्रचार का माध्यम इस स्तर पर लाकर खड़ा कर रहे है तो फिर दूसरे क्षेत्रीय या जिलास्तरीय दल कौन से हथकण्डे अपनाएगें इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है, फिर जो राष्ट्रीय दल यह शहीदी हथकण्डा अपना रहा है, वह पिछले साढ़े पांच सालों से देश की सत्ता पर काबिज है, क्या इन सढ़सठ महीनों में उसने कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिसे वह चुनावी मुद्दा बना पाए? जहां तक तीन तलाक या जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म करने का सवाल है, वही भी एक सम्प्रदाय व क्षेत्र विशेष में चर्चित है ही, क्योंकि तीन तलाक व जम्मू-कश्मीर से जुड़े लोगों की आवाजें ही सतह पर कहा आ पा रही है, वास्तव में तो सत्तारूढ़ दल की इन उपलब्धियों के सही मूल्यांकनकर्ता ये ही लोग है, हाँ, सत्तारूढ़ दल के लिए बेरोजगारी महंगाई, उन्मूलन, आर्थिक सुधार जैसे मुद््दें चुनावी मुद्दे बन सकते थे, किंतु इन क्षेत्रों में कुछ हो ही नहीं पाया तो इसमें बैचारे सावरकर जी या अन्य शहीदों का क्या दोष? इस तरह कुल मिलाकर एक प्रदेश की सत्ता बरकरार रखने के लिए शहीदों पर राजनीति को ठीक नहीं कहा जा सकता, शायद इस मामले में भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना के प्रमुख का सवाल सही है कि ‘वीर सावरकर जी को भाजपाने अभी तक याने पिछले पांच साल में सर्वोच्च सम्मान क्यों नहीं दिया?’

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