अयोध्या में जमीन को लेकर मचा महाभारत

विजय तिवारी

अदालत की आम परम्पराओं के मुताबिक बड़े फैसले शनिवार को नहीं सुनाये जाते, पर

सुप्रीम कोर्ट ने चार सौ साल से अनसुलझे मुकदमे को निपटाने के लिए यही दिन चुना।

जबकि अदालत ने पहले नवंबर के दूसरे सप्ताह में सुनाये जाने के संकेत दिये थे, पर

मालूम नहीं क्यों शनिवार को चुना गया।

खैर जो भी कारण रहा हो पर भारी-भरकम और भीषण बंदोबस्त के बाद सड़क पर तो मरघट की शांति रही, जो अगले दिन भी दिखाई पड़ी।

परंतु जिस प्रकार सरकार से मधुर संबंध बनाने वाले मीडिया ने न्यायपालिका के कथन को पूरा किया कि न्यायपालिका और सरकार में मधुर

संबंध होना चाहिए, भावी प्रधान न्यायाधीश शरद बोवड़े के कथन का पूरा पालन किया।

टीवी चैनलों पर इन फैसलों को ऐतिहासिक और अद्भुत तथा देश हित में बताया गया।

परंतु रविवार का सूरज चढ़ने के साथ ही पांच जजों के सामूहिक और संयुक्त फैसले पर सवाल उठने लगे। हालांकि चैनलों में इन विचारों को जगह नहीं मिली।

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सर्वप्रथम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली ने कानूनी कसौटी पर इस फैसले को रखा।

उन्होंने कहा कि अदालत द्वारा यह तो कहा गया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड यह नहीं साबित कर सका कि मस्जिद में 1526 के बाद नमाज़ अदा की जाती थी?

तब यह सवाल हिन्दुओं से क्यों नहीं पूछा गया कि उसी अवधि में क्या वहां चबूतरे पर पूजा की जाती थी क्या?

उन्होंने कहा कि आस्था को प्रमाण मान लिया गया, दूसरे के सबूत को भी नहीं माना गया।

मालिकाना हक़ के मुकदमे में आस्था या परंपरा को आधार बनाएंगे तब बहुत से धर्म स्थान तोड़ने पड़ेंगे।

ये तो हुई एक जज की प्रतिक्रिया। अब दूसरे पक्ष को देखें।

सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने और उसमे निर्मोही अखाड़ा को सदस्य बनाने तथा सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ भूमि देने का आदेश दिया।

अब अयोध्या के बजरंगियों ने स्थानीय प्रशासन से मांग की है कि चूंकि अयोध्या की पांच कोशी और बारह कोशी परिक्रमा होती है अतः

मुसलमानों को मस्जिद के लिए भूमि का आवंटन भी बारह कोश के बाहर किया जाए।

एक कोस में दो मील होते इस हिसाब से 24 मील बाहर जमीन दें।

वैसे भी स्थानीय प्रशासन ने अयोध्या में महत्वपूर्ण स्थान पर 5 एकड़ भूमि की सुलभता पर असमर्थता जताई है।

तब कैसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू किया जा सकेगा?

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दूसरा मसला मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्ट बनाए जाने का निर्देश भी अदालत ने दिया है।

परंतु अभी केंद्रीय गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय इस ओर कवायद कर ही रहे थे

कि राम जन्म भूमि न्यास के नृत्य गोपाल दास ने दो मुद्दे या कहें आपत्तियों की कैवियट लगा दी है।

पहला तो सुप्रीम कोर्ट के ट्रस्ट बनाने के आदेश को ही अनावश्यक बता दिया है।

उनके अनुसार राम जन्मभूमि न्यास है, अतः दूसरा न्यास निर्माण के लिए क्यों?

उन्होंने कहा कि निर्मोही अखाड़ा अपना न्यास विघटित कर हमारे न्यास में आ जाये।

इस पर निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास का बयान आया है

कि हम शुरू से ही राम जन्मभूमि न्यास के खिलाफ जमीन और अदालत में लड़ाई लड़ते रहे हैं।

हम निर्मोही हैं। हम राम जन्म भूमि न्यास का हिस्सा कभी नहीं बन सकते।

वे चाहें तो न्यास को सरेंडर कर हमारे साथ आ सकते हैं।

हम निर्मोही हैं। हम उनका हिस्सा कभी नहीं बन सकते।

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राम जन्म भूमि न्यास के नृत्य गोपाल दास ने प्रस्तावित केंद्र सरकार के ट्रस्ट के अध्यक्ष का नाम भी सुझा दिया है।

उन्होंने कहा कि अगर राम जन्म भूमि न्यास को मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी देने में कानूनी बाधा है

तो उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को केंद्र सरकार ट्रस्ट का मुखिया बनाए।

उन्होंने कहा कि वे गोरक्ष पीठ के अधिश्वर हैं।

अब महंतजी स्वार्थवश कितना असत्य भाषण करते हैं यह उनके कथन से साफ है।

वास्तव में गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मठ है जो सिद्ध योगी परंपरा का है।

इस मठ का गोरक्षा से कोई लेना देना नहीं है।

लेकिन आजकल की राजनीति में गाय या गौ राजनीति की वैतरणी पार करने का सिद्ध तरीका है

तो नृत्य गोपाल दास जी नाच गए, खेल दिया दांव, क्योंकि आबादी में कुछ ही लोग इस पाखंड को समझ पाएंगे।

दूसरे धार्मिक ट्रस्ट आमतौर से क्षत्रिय की अधीनता में नहीं होते।

परंतु गोरख नाथ जी अपनी पीठ को क्षत्रिय को ही देने का निर्देश दे गए थे।

अब अगर ऐसा होता है तो ब्राह्मण जाति के लोग तो इस बात का पुरजोर विरोध करेंगे,

जैसा की उत्तर प्रदेश की राजनीित में अभी हो रहा है।

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तीसरी आपत्ति मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट के स्वरूप के बारे में विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष चंपत रॉय ने की है।

उनका कहना है कि मंदिर निर्माण में हमारी भूमिका निर्णायक रही है।

हमारे कार सेवकों ने अपनी जान गंवाई है,

इसलिए हमारी भावनाओं, त्याग का ख्याल केंद्र को रखना चाहिए।

उनकी मांग है कि प्रस्तावित ट्रस्ट में ना तो कोई सरकारी अधिकारी हो और ना ही कोई नेता-मंत्री हो,

अर्थात सरकार की ओर से कोई प्रतिनिधित्व नहीं होना चाहिए।

उन्होंने प्रस्तावित मंदिर की पूजा-अर्चना की विधि तथा इसमें किन सम्प्रदायों के लोगों को जगह मिले यह भी कहा कि की पुजारियों में

वैष्णव, शैव और सगुण ब्राह्मण मानने वालों को ही जगह मिले।

किसी एक परिवार का पूजा-अर्चना पर एकधिकर ना हो,

इसलिए उन्होंने बद्रीनाथ मंदिर मॉडल अपनाए जाने की वकालत की।

अब चंपत रॉयजी की जानकारी को संशोधित करना होगा,

क्योंकि बद्रीनाथ मंदिर में पूजा का प्रथम अधिकार आदिगुरु शंकराचार्य के समय से

केरल के नंबुदरी ब्राह्मणों का ही चला आ रहा है।

उन्हें रावल महाराज कह जाता है। अब इसे कहते हैं कि शनिवार को किए कामों में स्थायित्व होता है

परंतु शनिश्चर यदि भरी हो कुंडली में तो होता काम भी बिगड़ जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सार्थकता और प्रश्न चिन्ह तो लग रहा है।

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दूसरी ओर संघ और सरकार समर्थक अभी भी समाचार पत्रों के पन्नों में आलोचना और फैसले पर सवाल उठाने वाली आवाजों को जवाब नहीं दे रहे हैं,

वे अभी भी इस मुगालते में हैं कि जैसे काश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म कर राज्य का विभाजन कर दिया कुछ वैसा ही इस मामले में भी

नरेंद्र मोदी और अमित शाह कर लेंगे।

परंतु महाराष्ट्र में अपने सहयोगी से दगाबाजी का परिणाम ही है कि परसी थाली भी सरक गई।

राजनीति में नैतिकता का कोई स्थान भारत में नहीं बचा है,

क्योंकि कुर्सी ही धर्म है राजनीतिक दलों का, परंतु अदालत की इज्जत उसकी

न्याय के प्रति सच्चाई के व्यवहार की है, जो इस मामले में संदिग्ध हो गई है।

बस खतरा एक ही है कि जिस सांप्रदायिक वैमनष्य को बचाने के लिए कानूनी रूप में यह समझौते का रास्ता निकाला गया है,

कहीं वह असफल ना हो जाये। सत्ताधीशों की कुर्सी की लोलुपता और येनकेन प्रकारेण अपनी चुनावी गोट बिठाने की जुगत इस देश में बसे

लोगों को एक-दूसरे का खून का प्यासा न बना दे।  जैसा एक प्रदेश में हुआ जब सत्ता बदनीयत हुई।

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