सिंधिया की सनसनी सरकार पर सस्पेंस

प्रदेश में जहां भाजपा सिंधिया के स्वागत में पलक पावड़े बिछा रही है वहीं कांग्रेस सिंधिया की राह में कहां-कहां कांटे बिछाए जा सकते हैं, इस खोजबीन में लगी है। दूसरी ओर सरकार को लेकर सस्पेंस लगातार बढ़ता जा रहा है।

भाजपा विधायक जहां गुरूग्राम में ठहरे हैं वहीं कांग्रेस विधायक जयपुर में डेरा जमाए हैं। सबसे ज्यादा खींचतान और सुरक्षा का ध्यान बेंगलुरु में रुके कांग्रेस की बागी 22 विधायकों को लेकर है। मध्यप्रदेश की राजनीति प्रायः दो दलीय रही है और दल-बदल का खेल ना के बराबर था।

अधिकांश विधायक जिस दल में राजनीति शुरू करते थे उसी में जीवन समाप्त भी कर देते थे लेकिन अन्य राज्यों की तरह अब प्रदेश में भी विधायकों का यह संकोच टूट गया है। इस बार तो जिस तरह से विधायकों की खातिरदारी पर्यटन और यदि आरोपों को सच मानो करोड़ों के लाभ होने की जो हवा लग गई है। अब दल-बदल करने वाले विधायक की प्रवृत्ति कमजोरी नहीं वरन उपलब्धि भी मानी जा सकती है। अब जहां दम वहां हम की स्थिति निर्मित हो गई है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रदेश में सनसनी इसी बात को लेकर बनी है कि अब तक मध्य प्रदेश की राजनीति में कोई भी नेता अपने साथ मंत्रियों और विधायकों को इतनी बड़ी संख्या में दल-बदल नहीं करा पाया। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी जिन्होंने अधिकांश टिकट बांटे थे। जब उन्होंने पार्टी छोड़ी वह भी तब इतनी बड़ी संख्या में दल-बदल नहीं करा पाईं। इसी तरह अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया भी करिश्मा नहीं दिखा पाए।

बहरहाल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आते ही राज्यसभा का उम्मीदवार बन जाना और राजधानी भोपाल में जिस तरह से सिंधिया का स्वागत हुआ है उससे उनकी चर्चा भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में हो रही है। भाजपा जहां सिंधिया के सहारे प्रदेश में सरकार बनाने का सपना संजोए हैं वहीं भविष्य में प्रदेश में और भी मजबूत होने का रास्ता बना लिया है। प्रदेश भाजपा कार्यालय पहुंचने पर सिंधिया की उपस्थिति में जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस सरकार, उसके नेताओं को ललकारा है उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश में भाजपा अब पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में कूद चुकी है।

नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने जिस तरह से सिंधिया के साथ पूरी भाजपा के खड़े होने का विश्वास दिलाया है उससे सिंधिया भी उत्साहित नजर आए। पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने भी अपने उद्बोधन में सिंधिया की उपस्थिति को भाजपा के लिए अच्छा बताया और सिंधिया ने भी अपने उद्बोधन में जहां विशिष्ट भाषण शैली के चलते कार्यकर्ताओं की तालियां बटोरी वहीं मंच पर बैठे नेताओं की विशेषताएं बताकर उनका भी दिल जीता।

जब सिंधिया दिल्ली से लेकर भोपाल तक भाजपा कार्यालय में स्वागत और सम्मान पा रहे हैं तब दूसरी ओर कांग्रेसी नेता सिंधिया की राह में क्या-क्या कांटे बिछाए जा सकते हैं, इसका जतन करने में लगे हैं। सिंधिया की बगावत के कारण सरकार पर संकट आ गया है। दिल्ली में जहां राहुल गांधी ने बयान देकर सिंधिया पर तंज कसा है वहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी सिंधिया पर हमलावर हैं, जबकि सरकार सिंधिया के प्रभाव वाले इलाकों में अधिकारियों की नए सिरे से पदस्थापना करने में जुटी है।

जिन अधिकारियों को सिंधिया की सिफारिश पर पदस्थ किया गया था उन्हें हटाकर सरकार अपने विश्वसनीय अधिकारी-कर्मचारियों की पदस्थापना कर रही है और उन फाइलों को खंगाला जा रहा है जिन पर सिंधिया की मुश्किलें बढ़ाई जा सकती हैं। सिंधिया ही नहीं, सिंधिया के समर्थक विधायक और मंत्रियों के क्षेत्रों में भी अधिकारी-कर्मचारियों के तबादले किए जा रहे हैं। मंत्रियों के डेढ़ वर्ष के कार्यकाल की फाइल खोली जा रही है। उनके निर्णय की समीक्षा की जा रही है जिससे उन पर कोई कार्रवाई की जा सके।

मध्य प्रदेश की सियासत में घमासान शुरू हो गया है। अब तक बयानों में विरोधाभास और अंदरखाने में मेल-मिलाप करने वाले नेताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अब जो भी दल पीछे हटेगा उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस राष्ट्रीय नेतृत्व के पास कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर भरोसा है और यही एक जोड़ी का विकल्प है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व और संघ प्रदेश की बेपटरी होती राजनीति और लुंज-पुंज होती प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए किसी सख्त नेतृत्व की तलाश में है जो मोदी, शाह या योगी की तरह कसावट ला सके।

कुल मिलाकर मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय जहां भाजपा और कांग्रेस में सिंधिया की सनसनी है वहीं सरकार के भविष्य को लेकर सस्पेंस लगातार गहराता जा रहा है। दोनों दलों की ओर से प्रयासों में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। यहां तक कि मोर्चे पर तैनात किए गए मंत्री अब झूमाझपटी के बाद भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। कुछ दिन में सरकार का भविष्य तो तय हो जाएगा लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति अब किस दिशा में जाएगी, कहां नहीं जा सकता क्योंकि दलीय निष्ठा की दीवारों में दरार पड़ गई है और विधायकों को दलबदल का चस्का भी लग गया है।

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