जेल में कैदियों के साथ थियेटर वर्कशॉप - Naya India
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जेल में कैदियों के साथ थियेटर वर्कशॉप

गिरिजाशंकर

इंद्रावती नाट्य समिति सीधी रंगमंच में अपने अभिनव प्रयोगों के लिये जानी जाती रही है। जिले में नाट्य ग्राम बनाकर लोक कलाओं का रंगमंचीय उपयोग के साथ बघेली में लगातार बेहतरीन नाटक करते रहे हैं जिनकी चर्चा देश भर में होती रही है। समिति के युवा रंगकर्मी नीरज कुंदेर, नरेन्द्र सिंह, रोशनी प्रसाद मिश्र, करूणा सिंह अपने सहयोगी कलाकारों के साथ सीधी में लगभग साल भर थियेटर व लोककला के वर्कशाप आयोजित करते रहते हैं। सबसे लंबा नाट्य समारोह आयोजित कराने का श्रेय भी इन कलाकारों को जाता है। इनकी रंग सक्रियता के चलते देश भर के अनेक रंगकर्मी व अन्य कलाकार सीधी जैसे आवागमन विहीन जिले में आ चुके हैं। इन कलाकारों की खासियत यह है कि वे अपने नाटक खुद लिखते हैं तथा उन नाटकों का सामाजिक सरोकार होता है। शोषण व अत्याचार हर कालखंड में होता रहा है। समिति के रंगकर्मियों द्वारा उन कालखंडों में जाकर ऐसे पात्रों को तलाशना, उन पर शोध करना और फिर नाटक तैयार करने का परिणाम है कि ‘एकलव्य’ या ‘कर्णभारम’ जैसे नाटकों की प्रस्तुति।

पिछले दिनों उन्होंने एक और प्रयोग किया, सीधा जिला जेल में कैदियों के साथ रंग शिविर आयोजित का हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक ‘चरणदास चोर’ की प्रस्तुति करना। इस नाटक के सारे पात्र जेल में सजा भुगत रहे कैदी थे जिन्होंने न केवल नाटक में अभिनय किया बल्कि संगीत आदि भी तैयार किया। इसके लिये जेल के अधीक्षक तथा जिला प्रशासन बधाई का पात्र है जिन्होंने जेल में सजा काट रहे कैदियों की रंग प्रतिभा को पहचानने तथा उसे निखारने की दिशा में यह अभिनव प्रयोग किया। इस नाटक की प्रस्तुति के बहाने जेल परिसर में एक मंच भी बन गया जहां अब आगे भी रंगमंच व अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहेंगी। जेलों में कैदियों की प्रतिभाओं का रचनात्मक उपयोग करने की प्रक्रिया तो सालों से चल रही है। स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस जैसे मौकों पर कैदी सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहते हैं। कई जेलों में सेना व पुलिस बैंड की तर्ज पर कैदियों का बैंड भी तैयार किया गया है जो जेल के बाहर जाकर भी अपने बैंड के कार्यक्रम सार्वजनिक मंचों पर पेश करते हैं। जेल के कैदियों द्वारा विभिन्न सामान तैयार किये जाते हैं जिनकी उत्कृष्टता के चलते हमेशा उनकी मांग बनी रहती है। कैदियों द्वारा निर्मित खिलौने, फर्नीचर, गलीचे व अन्य सामानों की नियमित बिक्री की भी व्यवस्था है लेकिन जेल के अंदर कैदियों के लिये रंग षिविर लगाया जाना प्रायः नहीं होता है।

इस प्रसंग पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी अनूप रंजन पांडे ने बताया कि 1990 के आसपास उन्होंने भी बिलासपुर जिला जेल में कैदियों के लिये रंग शिविर आयोजित किया था लेकिन यह काम आगे नहीं बढ़ाया जा सका। उन्होंने उस रंग शिविर की एक दिलचस्प घटना सुनाई। नाटक तैयार हो गया लेकिन इसकी प्रस्तुति के एक दिन पहले एक उस कैदी को जमानत मिल गई जो संगीत समूह का मुखिया था और नाटक की प्रस्तुति के ठीक पहले जेल से रिहा होने के कारण नाटक की प्रस्तुति में भाग नहीं ले पाया। सीधी जेल में आयोजित रंग शिविर में पुरुष व महिला दोनों कैदियों ने हिस्सा लिया और तीन सप्ताह के इस शिविर में नाटक ’चरणदास चोर’ तैयार करने के साथ ही महिला कैदियों ने लोकगीतों की आकर्षक प्रस्तुति दी। इनमें से किसी कैदी ने इसके पहले नाटक नहीं किया था लेकिन इस नाटक में उन्होंने जिस बेहतरीन अभिनय व संगीत की प्रस्तुति दी, उससे ऐसा नहीं लगता था कि वे पहली बार नाटक कर रहे हैं। जेलों को बंदियों के लिये सुधारगृह भी कहा जाता है तथा उन्हें अपराध से भविष्य में मुक्त रखने के कई जतन किये जाते हैं जिसमें इस घटना के साथ उन्हें रंगकर्म से जोड़ना भी शामिल हो गया।

‘चरणदास चोर’ नाटक कैदियांे के रंग शिविर के लिये बेहद प्रासंगिक था। चरणदास के नामी चोर है जो एक साधु के संरक्षण में आकर जीवन भर सच बोलने का न केवल प्रण करता है बल्कि उसका पालन करते हुए अपनी जान दे देता है। कैदियों के लिये अपना आचरण व जीवन बदलने का संदेश देने वाले इस नाटक को कैदियांे ने ही जीवंत बना दिया। जेल में महिला व पुरुष दोनों कैदी हैं लेकिन सरकारी नियमों के अनुसार दोनों एक साथ नाटक नहीं कर सकते थे लिहाजा नाटक में महिला पात्रों की भूमिका पुरुष कैदियों ने निभाया, ठीक लोक अंदाज में और यह बघेली-छत्तीसगढ़ी बोली का नाटक लोक रंगमंच का आस्वाद भी पेश करता है। चूंकि सरकारी बजट में कैदियों की इस तरह की गतिविधियों के लिये कोई प्रावधान नही होता। इसलिये कलाकारों की वेशभूषा का इंतजाम इंद्रावती नाट्य समिति के रंगकर्मियों ने अपने स्टाक से किया। संगीत के लिये वाद्ययंत्र भी इसी तरह समिति द्वारा ही मुहैय्या कराई गई। हमारी व्यवस्था की यह विसंगति रही है कि जेलों में सजा पाने के बाद या मुकदमा चलते के दौरान जो कैदी होते हैं वे सामाजिक व आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के होते हैं। यह इत्तफाक है कि हमारी समूचा लोक संस्कृति इन्हीं वर्गों के हाथों संरक्षित रहा है। इसी के चलते सीधी जेल के अधिकांश कैदी लोककला में माहिर थे। नाटक में संगीत देने वाले कैदी भी वाद्ययंत्र बजाने में कुशलता रखते थे।

करना सिर्फ इतना था कि उनके संगीत को रंगमंच के अनुरूप ढालने का अभ्यास शिविर के निदेशक रोशनी मिश्र का अनुभव बताता है कि सामान्य रंग कलाकारों की तुलना में जेल के कैदी अधिक सिंसियर थे तथा उनमें सीखने की क्षमता भी अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिली। नाटक करने को लेकर उनमें अत्याधिक उत्साह दिखा। यह गतिविधि उनके दैनंदिनी दिनचर्या एकदम अलग होने के कारण उनकी दिलचस्पी इतनी हो गई थी कि उन्हें रिहर्सल में खूब मजा आता था। नाटक का प्रदर्षन जेल परिसर में हुआ जिसे देखने वालों में जेल के स्टाफ के अलावा सजा काट रहे अन्य बंदी थे जिन सबने बदले हुए माहौल का बेहद आनंद लिया। यह एक नये तरह का रंग अनुभव था। रंग शिविर के जरिये कैदियों के अंतरंग जीवन तथा जेल की व्यवस्थाओं का जायजा लेने का मौका भी रोशनी, नरेन्द्र, नीरज, करूणा आदि को मिला। उम्मीद की जानी चाहिए कि अपने इस अनुभव के आधार पर कोई नये-नये नाटक की रचना ये रंगकर्मी कर पायेंगे और शोषण बनाम रचनात्मकता की एक नई कहानी नाटक के जरिये हम सबके सामने आ सकेगी। जेल से निकलते वक्त कैदी का रूपांतर रंगकर्मी के रूप में होना भी एक नया प्रसंग रचेगा।

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