राजनीति के कोरोना-वायरस

नीतीश कुमार ने दूसरी बार कहा था कि प्रशांत किशोर को जनता दल यू में लेने के लिए उन्हें अमित शाह ने कहा था। किसी दूसरे के सिर पर कोई तब ठीकरा फोड़ता है जब उसे वह बोझ समझने लगता है। नीतीश कुमार के इन बयानों से जाहिर था कि वह प्रशांत किशोर को पार्टी पर बोझ समझने लगे थे। लेकिन हैरानी की बात है कि नीतीश कुमार ने बिना आधार वाले प्रशांत कुमार को तब तक झेला जब उस ने नीतीश कुमार को झूठा नहीं कहा। यह तो खुलेआम चुनौती थी जब प्रशांत किशोर ने कहा कि कौन यह भरोसा करेगा कि अभी भी आपमें इतनी हिम्मत है कि अमित शाह द्वारा भेजे गए आदमी की बात न सुनें ? इस के बाद भी जब नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को पार्टी से नहीं निकाला तो ऐसा लगने लगा था कि नीतीश कुमार किसी दबाव में है, यह सवाल बना हुआ था कि अगर नितीश कुमार का दावा सही है , तो क्या वह अमित शाह से पूछ कर ही प्रशांत किशोर को पार्टी से निकालेंगे।

अपन ऐसा पहली बार देख सुन रहे थे कि कोई अदना सा गैर र-जनीतिक व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर की किसी पार्टी में शामिल होते ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया जाता है और जिस व्यक्ति ने उस का राजनीतिक कद बनाया, वह उसी को झूठा कह रहा है। अमित शाह ने न तो नीतीश कुमार के दावे की पुष्टि की थी और न खंडन किया था। यानी दाल में कुछ काला जरुर था कि प्रशांत कुमार ने अमित शाह के खिलाफ भी बयानबाजी कर दी , इस के बावजूद वह चुप्पी साधे हुए थे|

अमित शाह ने जब यह कहा था कि बटन इतने जोर से दबाना कि उसका करंट शाहीन बाग़ में लगे , तब प्रशांत किशोर ने कहा था कि दिल्ली के वोटर जोरदार झटका धीरे से देंगे। क्या यह अजीब नहीं लगता कि जनता दल यू और भाजपा दिल्ली में मिल कर चुनाव लड रहे हैं और जनता दल यू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आम आदमी पार्टी को जिताने के लिए काम कर रहा है।

आखिरकार प्रशांत किशोर का अमित शाह पर किया गया ट्विट जनता दल से उन की बर्खास्तगी का कारण बन गया। नीतीश कुमार तो पहले ही भरे बैठे थे। जब प्रशांत किशोर के जनता दल यूं में शामिल होने और उन्हे पार्टी उपाध्यक्ष बनाने की खबर आई थी तो जनता दल के पुराने नेता खुश नही थे। उन्हें लगता था कि जैसे बाहर से आ कर पवन वर्मा राज्य सभा सदस्य बन गए ,वैसे ही एक दिन प्रशांत किशोर भी राज्य सभा में बैठे होंगे| अब प्रशांत किशोर के साथ ही पवन वर्मा को भी जनता दल यू से निकाला गया है।

वह भी सीधे सीधे नीतीश कुमार को चुनौती दे रहे थे। नीतीश कुमार ने जमीनी नेताओं का हक मार कर इन दोनों को कद्दावर नेता बना दिया था। ये दोनों तथाकथित बुद्धिजीवी हैं जिन का जमीनी राजनीति से कुछ लेना देना नहीं।

नीतीश कुमार ने मंगलवार को जब दूसरी बार कहा कि वह जहां जाना चाहता है , जाए तो साफ़ संकेत था कि अब ज्यादा देर नहीं| यह सूंघते ही जनता दल के नेता अजय आलोक ने प्रशांत किशोर को लेकर कहा , यह शख्स भरोसे के काबिल नहीं है , वह नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार का भरोसा नहींजीत पाया ….वह आम आदमी पार्टी के लिए काम करता है ……राहुल गांधी के सम्पर्क में रहता है …….ममता बेनर्जी के साथ योजनाएं बनाता है ….इस पर कौन भरोसा करेगा …..? हम खुश हैं कि यह आदमी हमे छोड़ कर जा रहा है …जहां जाना चाहता है जाए। अजय आलोक तो कई दिन पहले से प्रशांत किशोर को लेकर नीतीश कुमार को सतर्क कर रहे थे , लेकिन भाजपा में कोई  मोदी और अमित शाह को सतर्क नहीं कर रहा।

नीतीश कुमार ने आखिर अजय आलोक की बात मानी और अपनी पार्टी में घुसे कोरोना-वायरसों को निकाल बाहर किया। चीन में तो कोरोना-वायरस अब आया है , भाजपा में तो 2014 के बाद से कई कोरोना-वायरस घुस चुके हैं। क्या कारण है कि राजनीतिक दलों में विचारधाराहीन लोगों को इतनी तरजीह दी जाने लगी है। जमीन पर पार्टी के लिए सालों-साल काम करने वाले कार्यकर्ताओं को किनारे कर के ये बड़े नेता नौकरशाहों और दलालों को चुनावों में टिकट थमा देते हैं और वे भ्रष्टाचार की कमाई को पानी की तरह बहा कर चुनाव जीत जाते है और अपनी जुगाड़ प्रतिभा से मंत्री भी बन जाते हैं। राजनीति में समाज सेवा की राजनीति इसी लिए विलुप्त हो रही है और लोकतंत्र पंगु हो रहा है।

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