संवाद क्यों नहीं कर रही सरकार?

अजित कुमार- देश भर में संशोधित नागरिकता कानून, सीएए के खिलाफ आंदोलन चल रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में हजारों लोग पिछले एक महीने से धरने पर बैठे हैं। इनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। रिले धरना सा चल रहा है। लोग काम पर जाते हैं और फिर आकर धरने पर बैठ जाते हैं। यह धरना ऐसे समय में हुआ है, जब दिल्ली में ठंड का एक सौ साल का रिकार्ड टूटा है। इतनी ठंड के बावजूद लोग धरने पर बैठे रहे। इस धरने की वजह से लाखों लोगों को परेशानी हो रही है वह अलग कहानी है और हर दिन करीब दो करोड़ रुपए का नुकसान कारोबारियों को हो रहा है वह भी इस आर्थिक मंदी के दौर की अलग कहानी है। अब दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस से कहा है कि वह इस समस्या पर गौर करे और धरना खत्म कराए। पुलिस की ओर से कहा गया है कि वह बलप्रयोग की बजाय बातचीत के जरिए रास्ता निकालेगी।

अब सवाल है कि क्या यह कनून व्यवस्था की समस्या है? और क्या इसका समाधान निकालने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की है? या यह एक राजनीतिक समस्या है, जिसका समाधान केंद्र की सरकार और देश के राजनीतिक दलों को निकालना है? वैसे भी यह समस्या सिर्फ दिल्ली और शाहीन बाग इलाके की नहीं है। जिस किस्म का धरना शाहीन बाग में हो रहा है वैसा ही धरना कानपुर में भी है और गया में भी चल रहा है। पूर्वोत्तर के राज्यों में लगातार लोग आंदोलन कर रहे हैं। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया है। सो, हर जगह पुलिस से तो नहीं कहा जा सकता है कि वह इस मामले को सुलझाए?

असल में इस मामले में पुलिस की बहुत सीमित भूमिका है। हां, अगर सरकार पुलिस के दम पर इसे काबू में करना चाहे तो पुलिस की भूमिका बढ़ जाएगी। परंतु जैसा कि पुलिस कह रही है कि वह कारोबारी संगठनों, सामाजिक समूहों और अन्य लोगों से बात करेगी तब उसकी भूमिका सीमित हो जाती है। क्योंकि यह न तो स्थानीय समस्या है और न कानून व्यवस्था की समस्या है। यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है, जिसके कई आयाम है और कई पहलू हैं। इसका दायरा बहुत बड़ा है और सरकार गंभीर है तो उसे इस मामले को सुलझाने के लिए बड़े दायरे में ही पहल करनी होगी।

पर मुश्किल यह है कि सरकार इस मामले को सुलझाने के लिए कोई पहल नहीं कर रही है। केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है। उसके नेता सड़कों पर उतरे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह खुद अलग अलग राज्यों में जाकर सभाएं कर रहे हैं और लोगों को समझा रहें हैं कि नागरिकता कानून असल में क्या है। वे जो कह रहे हैं वह सही कह रहे हैं कि यह कानून किसी की नागरिकता छीनने का प्रावधान नहीं करता है, बल्कि नागरिकता देने का प्रावधान करता है। वे आंदोलन कर रहे कांग्रेस, आप, तृणमूल आदि के नेताओं को चुनौती भी दे रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर सफाई दी है। उन्होंने नागरिकता कानून को लेकर बने भ्रम को दूर किया और साथ ही यह भी कहा कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी को लेकर कोई बात नहीं हुई है। इतना सब कुछ करने के बावजूद सरकार देश भर में चल रहे धरने प्रदर्शन को खत्म कराने के लिए सांस्थायिक प्रयास नहीं कर रही है।

इसके लिए सरकार की ओर से कहा जा सकता है कि इस मामले में सांस्थायिक प्रयास संभव नहीं है क्योंकि विरोध-प्रदर्शन सांस्थायिक नहीं हैं। कोई एक संगठन इस विरोध प्रदर्शन के पीछे नहीं है। यह स्वंयस्फूर्त जनता का प्रदर्शन है। अगर ऐसा है भी तब भी सरकार इसे खत्म कराने की पहल कर सकती है। आखिर 2011-12 में जब अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ तो तब की कांग्रेस सरकार ने इसे खत्म कराने के कई प्रयास किए। अन्ना हजारे के महाराष्ट्र कनेक्शन को खोजा गया और उस समय के राज्य के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के जरिए पहल की गई।

देशमुख की पहल कर इंदौर के आध्यात्मिक गुरू भैय्यू जी महाराज ने दिल्ली आकर अन्ना हजारे से बात की। रामदेव ने आंदोलन का ऐलान किया तो उनसे बात करने के लिए तब की केंद्र सरकार के आधा दर्जन मंत्री हवाईअड्डे पर चले गए थे। बाद में भी रामदेव की टीम ने केंद्रीय मंत्रियों से बात की थी।

पर ऐसी कोई पहल सरकार की ओर से नहीं हो रही है। नागरिकता कानून के सभी पहलुओं की जानकारी लोगों के सामने रखते हुए सरकार चाहे तो प्रदर्शनकारियों से बात कर सकती है। प्रदर्शन का नेतृत्व भले कोई एक नेता नहीं कर रहा हो। पर प्रदर्शन में शामिल समूहों की सबको पहचान है। प्रधानमंत्री ने तो कपड़ों से प्रदर्शनकारियों को पहचानने का मंत्र दिया हुआ है। इसलिए किसी तरह का कंफ्यूजन नहीं है। दूसरे, किसी न किसी रूप में विपक्षी पार्टियों का समर्थन देश में चल रहे प्रदर्शनों को है। जैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में प्रदर्शन चल रहा है। हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी प्रदर्शन की कमान संभाले हुए है। केरल में कम्युनिस्ट पार्टियां विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। कांग्रेस के नेता भी इसमें शामिल हैं।

अगर सरकार अपनी जिद छोड़े और इसे प्रतिष्ठा का सवाल न बनाए तो वह पहल करके सभी विपक्षी पार्टियों को साथ ला सकती है। आम लोग सरकार से बात करने की पहल नहीं कर सकती है। पर सरकार चाहे तो आम लोगों से बात कर सकती है। सरकार अपना प्रतिनिधि शाहीन बाग भेज सकती है। सरकार ममता बनर्जी और ओवैसी से बात कर सकती है। कांग्रेस और लेफ्ट के नेताओं से सरकार बात कर सकती है।

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