हिंदुत्व पर भारी पड़ती मराठा राजनीति?

अजय सेतिया

नैतिकता के आधार पर देखा जाए तो शिवसेना की जिद्द नाजायज है, पर अगर 125 -150 सीटों के समझौते के समय अमित शाह ने 50-50 का वायदा किया था तो भाजपा को उसे निभाना चाहिए। अमित शाह ने अब तक इस वायदे का खंडन नहीं किया है| राजनीति में शाह और मात का खेल चलता है। भाजपा ने पिछली बार एनसीपी की मदद से सरकार बना कर शिवसेना को घुटने टेकने के लिए मजबूर किया थातो आज शिवसेना की बारी है। राजनीति में घमंड हमेशा बरकरार नहीं रहता। भाजपा ने इसी घमंड में चुनाव से पहले शरद पवार के खिलाफ ईडी से ऍफ़आईआर दर्ज करवा कर एनसीपी से समर्थन पाने के दरवाजे बंद कर लिए थे।

इसलिए पांच साल से खून का घूँट पी रही शिवसेना को बदला लेने का सही मौक़ा मिला है। शरद पवार ने भी बदला लेने का मन बना लिया दिखाई देता है| दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली बात चरितार्थ हो सकती है। पिछली बार शिवसेना और एनसीपी दोनों भाजपा को समर्थन दे रहीं थी , अब दोनों भाजपा से दूरी बना रही हैं। भाजपा ने इन पांच वर्षों में दोनों को दुश्मन बना लिया।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि 2014 में जब भाजपा ने अपने पुराने सहयोगी को धक्का मार कर गठबंधन से बाहर कर दिया था और एनसीपी के समर्थन से सरकार बना ली थी तो राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने बीच बचाव कर के उद्धव ठाकरे को सरकार में शामिल होने के लिए राजी किया था| उद्धव ठाकरे सरसंघ चालक मोहन भागवत का इतना सम्मान करते हैं कि उन्होंने मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की मांग की थी। शिव सेना का संघ के प्रति यह सम्मान उस की हिंदुत्व की विचारधारा के कारण है। बाला साहब ठाकरे के समय से ही संघ और शिवसेना का तारतम्य बना हुआ है|

बाला साहिब ठाकरे ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उनके शिवसैनिकों ने बाबरी ढाँचे को तोड़ा है। शिवसेना ने रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने के लिए अयोध्या कूच की धमकी भी दी थी। हिंदुत्व की विचारधारा भाजपा-शिवसेना में केंद्र बिन्दु है और संघ दोनों के मध्य बीच-बचाव की धुरी , तो सवाल खड़ा होता है कि संघ ने चुप्पी क्यों साधी हुई है?

बिना संघ के बीच बचाव के शिवसेना भाजपा का गतिरोध खत्म नहीं हो सकता लेकिन ऐसा तो कुछ जरुर है कि संघ ने चुप्पी साध ली है , क्या संघ भाजपा नेतृत्व से खफा है। क्या संघ भी चाहता है कि शिवसेना और एससीपी गठबंधन की मराठा सरकार स्थापित हो। भारतीय जनता पार्टी ने इन चुनावों में 122 के मुकाबले 105 सीटें जीत कर सिर्फ 17 सीटें ही नहीं गवाई हैंमराठाओं का विशवास भी गवाया है , भाजपा की सीटें घटने का कारण मराठाओं की नाराजगी है।

2014 के चुनाव में भाजपा के 122 विधायकों में से करीब 40 विधायक मराठा थे , शिवसेना के भी करीब 25 विधायक मराठा थे , इस के बावजूद भाजपा ने ब्राह्मण देवेन्द्र फडनवीस को मुख्यमंत्री बनाया और पूरे पांच साल बनाए रखा। उल्लेखनीय कि महाराष्ट्र के अब तक के 18 मुख्यमंत्रियों में से 12 मराठा रहे हैं। क्या ब्राह्मण होने के बावजूद फडनवीस संघ के ब्राह्मण नेतृत्व को नहीं जीत पाए।

देवेन्द्र फडनवीस यह समझ रहे थे कि संभाजी राजे , उदयन राजे और शिवेंद्र राजे भोंसले को भाजपा में शामिल करवा कर मराठाओं को अपने पाले में ला कर और मराठाओं को आरक्षण दे कर उन्होंने कांग्रेस-एनसीपी के मराठा किले को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है लेकिन चुनाव नतीजे बताते हैं कि मराठाओं ने 2014 का बदला ले लिया। यहाँ तक कि उन्होंने शरद पवार का साथ छोड़ कर भाजपा में गए छत्रपति शिवाजी के वंशज उदयन राजे तक को हरा दिया।

मराठों ने शरद पवार को अपना एकछत्र नेता घोषित करते हुए एनसीपी के पाले में 35 सीटें दी हैं जबकि भाजपा के 2014 में 40 के मुकाबले सिर्फ 12 मराठा जीते हैं। दूसरे नंबर पर शिवसेना के 25 मराठा जीते हैं। कांग्रेस के भी आधे विधायक यानी करीब 20- 21 विधायक मराठा हैं। इस लिए अगर कांग्रेस की मदद से शिवसेना- एनसीपी सरकार बनती है तो यह मराठाओं की सरकार होगी क्योंकि इन दलों के 154 विधायकों में से 80 विधायक मराठा होंगे , जबकि बाहर रहे भाजपा के 105 विधायकों में से सिर्फ 10-12 ही मराठा हैं।

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