शिवसेना-कांग्रेस में छूआछूत खत्म?

शायद भाजपा आलाकमान को समझ नहीं आ रहा कि उसके साथ हुआ क्या| जबकि काठ की हांडी बार बार नहीं चढती यह बात राजनीति करने वालों को हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए| शिव सेना कभी महाराष्ट्र की एकमात्र लोकप्रिय हिन्दू पार्टी थी , बाल ठाकरे का राजनीतिक कद भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं लाल कृष्ण आडवानी और अटल बिहारी वाजपेयी के बराबर था| बाल ठाकरे उन दोनों को मिलने कभी दिल्ली नहीं आए जबकि वाजपेयी आडवानी जब भी मुम्बई जाते थेतो बाल ठाकरे से मिले बिना नहीं आते थे| बाल ठाकरे ने अपनी स्पष्टवादिता और भाष्य कला का लोहा मनवा लिया था जिसकी तारीफ़ कांग्रेस के नेता वी.एन.गाडगिल भी किया करते थे|

अगर बाल ठाकरे ज़िंदा होते तो भाजपा का वोट आधार बढने के बावजूद 2014 का विधानसभा चुनाव भाजपा-शिवसेना अलग अलग नहीं लड़ते| मोदी की भाजपा ने 2014 का विधानसभा चुनाव गठबंधन तोड़ कर लडा , जिस का उसे फायदा भी हुआ , पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री भी बन गया , लेकिन शिवसेना भाजपा का 21 साल पुराना विश्वास टूट गया| अब साथ चुनाव लड़ कर शिवसेना को बदला लेने का मौक़ा मिला है,तो वह क्यों जाने दे| इसलिए कहा गया है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढती|

गठबंधन में चुनाव लड़ने के बावजूद सरकार बनाने के लिए समर्थन न दे कर शिवसेना ने भाजपा को राजनीति का पहला सबक सिखाया है कि धोखा देना उन्हें भी आता है | यह आधार हो सकता है कि देवेन्द्र फडनवीस का खुद को मुख्यमंत्री घोषित करना उद्धव ठाकरे को नागवार गुजरा और वहीं से सबक सिखाने का मन बना | भाजपा ने अगर देवेन्द्र फडनवीस को एकतरफा मुख्यमंत्री घोषित न किया होता तो शायद ऐसे हालात पैदा न होते| खुद को स्पष्ट बहुमत नहीं मिले होने के बावजूद भाजपा ने शिव सेना से सम्पर्क तक नहीं किया| जैसे भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए पार्टनरों की हालत बना दी है , उसी तरह का व्यवहार शिव सेना के साथ किया गया| भाजपा नेतृत्व ने जनादेश की इस बारीक व्याख्या को भी नहीं समझा कि मराठा उससे कितने खफा हैं|

शिवसेना के अखबार सामना ने रविवार को भाजपा नेतृत्व के व्यवहार और कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए लिखा-“जब राजनीतिक सहयोग हासिल करने की कोशिश और धमकाने के तरीके काम नहीं करते तो यह स्वीकार करने का समय होता है कि हिटलर मर चुका है और गुलामी के गहराते बादल छंट गए हैं|” यह टिप्पणी निश्चित रूप से एनडीए को पंगु बना दिए जाने पर है| लेख में कहा गया है कि फडणवीस को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आशीर्वाद मिला था, इसके बावजूद वह इस पद पर नहीं बैठ पाए| संजय राउत, जो उद्धव ठाकरे के दाएं हाथ और मराठा प्रवक्ता के तौर पर उभर कर सामने आए है , ने कहा, ‘‘वह शपथ इसलिए नहीं ले पाए क्योंकि बीजेपी प्रमुख अमित शाह राज्य की गतिविधियों से दूर हैं|” शायद उन का इशारा दलबदल की कोशिशों से था|

शनिवार को राज्यपाल ने पहली बार सरकार बनाने के प्रयास शुरू किए , जब उन्होंने देवेन्द्र फडनवीस से विधिवत पूछा कि वह सरकार बनाने की हैसियत में हैं या नहीं?अगर वह अब भी न पूछते तो खुद कटघरे में होते कि उन्होंने सरकार बनाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया | अब उस के पास सरकार बनाने का मौक़ा है , अब अगर वह सरकार नहीं बनाती है तो उसका बड़े दल के नाते न्योते का दावा खत्म होगा और शिवसेना-एनसीपी गठबंधन बनने का रास्ता खुलेगा| शनिवार को अयोध्या पर मंदिर के पक्ष में फैसला आने के बाद शिवसेना-कांग्रेस में छूआछूत की बीमारी ख़त्म हो गई है| दोनों ओर से सौहार्द्रपूर्ण बयानों ने शिवसेना-एनसीपी की ढाई-ढाई साल की सरकार और कांग्रेस के बाहर से समर्थन की संभावनाएं बढ़ा दी हैं| जिससे भाजपा कैम्प में हडकम्प मचा और बैठकों का दौर शुरू हुआ| रविवार दिन भर शिवसेना, भाजपा, एनसीपी , कांग्रेस की गतिविधियाँ तेज हुई| इन बैठकों से निकल कर आया कि राजनीति में कोई एक दुसरे को अछूत नहीं मान रहा| एनसीपी 12 नवम्बर को अपने विधायक दल की बैठक में फैसला कर लेगी|

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