Ethiopia declares state emergency 2019 उफ! एक देश की अपने
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उफ! एक देश की अपने हाथों अपनी बरबादी

Ethiopia declares state emergency

2019 में नोबल शांति पुरस्कार जीतने वाले प्रधानमंत्री अबी अहमद ने अपने ही हाथों देश को गृहयुद्ध में धकेला। इथियोपिया आज वह देश है जो अपने ही खिलाफ युद्ध कर रहा है। इतिहास गवाह है कि ऐसे युद्ध का अंत बर्बर विस्थापन और मौत में होता है। पूरा देश खत्म हो जाता है और लोग विस्थापित हो भारी कीमत चुकाते हैं। Ethiopia declares state emergency

प्रधानमंत्री अबी अहमद ने 2019 में नोबल शांति पुरस्कार जीता। उसकी तब प्रशंसा हुई। माना गया था कि इथियोपिया के अस्थिर इलाकों में शांति लाने वाले सही व्यक्ति को पुरस्कार मिला है। उन्हें देश और अफ्रीकी सींग कहे जाने वाले इलाके, दोनों के लिए उम्मीद की किरण के रूप में देखा गया। पर वह तब की बात।

अब चौतरफा नोबेल शांति पुरूष अबी अहमद की आलोचना है। उनकी निंदा व अपमान है। उन्होने अपने हाथों, अपनी राजनीति, देश में क्षेत्रिय, नस्लीय तनावों को बढ़वा कर चुनावी फायदे की गणित में ऐसा सत्यानाश कराया कि इथियोपिया आज गंभीर गृहयुद्ध में है। नरसंहार की खबरें भी आने लगी है।  

इसकी शुरुआत नोबल शांति पुरस्कार जीतने के एक साल बाद, नवंबर 2020 में हुई। प्रधानमंत्री ने टुच्ची, छोटी राजनीति में एक क्षेत्रिय पार्टी टिग्रेयन पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (टीपीएलएफ) को सत्ता से बाहर धकेला। यह पार्टी एक जनजातिय अर्धसैनिक समूह से थी। सत्ता में इसका दबदबा अशांत उत्तरी प्रांत टिग्रेयन में था तो साथ ही 1990 के दशक के शुरू में सैनिक तानाशाही से संसदीय व्यवस्था बनने के बाद वह केंद्र सरकार में भी थी। वह देश चलाने के उस मॉडल का पार्ट थी जिसे एथनिक फेडरलिज्मकहा गया। इस व्यवस्था में मौटे तौर पर नस्लीय आधार पर बने-बंटे प्रदेशों को थोड़ी स्वायत्ता मिली हुई थी। संघीय सरकार में भी टीपीएलएफ का दबदबा हुआ था। इसके चलते राष्ट्रीय एकता, आर्थिक विकास और सुरक्षा तीनों में देश बेहतर हुआ। यह मॉडल कम से कम एक दशक तक सफलता से चला। देश पुराने संकटों से बाहर निकला। ध्यान रहे अफ्रीका का दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश इथियोपिया 1983-85 में भयानक सूखे से तबाह हुआ था। मगर फिर अमन-चैन के साथ वह पूर्वी अफ्रीका का सबसे मजबूत आर्थिक पावर हाउस बना। देश का वह विकास बुनियादी नागरिक आजादी और राजनीतिक अधिकारों में जनता की दमदारी से था। इसी के चलते बाद में सत्तावादी निरकुंश शासन के खिलाफ जन विद्रोह भी हुआ और अबी के पूर्ववर्ती, हैलीमारियम देसालेगन को बेगैरती के साथ इस्तीफा देना पड़ा।  

तब 2018 में सत्तारूढ़ प्रभु वर्ग ने देश में तनाव घटाने और राजकाज में परिवर्तनों के लिए ओरोमो जाति के अबी को चुन उन्हे प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को खत्म किए बगैर। प्रधानमंत्री बनते ही अबी ने नया सत्तारूढ़ गठजोड़ बनाया। नए समीकरण। चार पार्टियों को मिलाकर एक अकेली नई प्रोसपेरिटी पार्टी बनाई। इससे क्षेत्रिय-नस्लीय दल का रूतबा घटा। टीपीएलफ अलग-थलग हो गई। पूरे इथियोपिया के लिए एक राजनीतिक दल के लक्ष्य याकि सब तरफ मेरा और मेरी पार्टी के वर्चस्व की प्रधानमंत्री की राजनीति ने प्रदेशों की क्षेत्रिय पार्टियों में डर पैदा किया। टाइग्रे नस्ल से जाने वाले राज्य में अलगाव की भावना बनी और टाइग्रे के नेता और लडाका कार्यकर्ता, उत्तर में अपने पहाड़ी सेंटर में चले गए जहां उन्होने अपनी क्षेत्रीय सरकार अपने हिसाब से चलाई।

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सितंबर 2020 में तनाव बढ़ा। टाइग्रे के लोगों ने प्रधानमंत्री अबी की परवाह न करते हुए अपने प्रदेश में  वे संसदीय चुनाव करवाएँ जो कोरोना वायरस महामारी के कारण टले थे। अबी ने उस चुनाव को अवैध करार दिया। दोनों तरफ एक-दूसरे का विरोध बना। केंद्र सरकार ने प्रदेश और टीपीएलएफ नेतृत्व को जाने वाले पैसे में कटौती की। दोनों तरफ ठन गई। प्रादेशिक सरकार और संघीय सरकार के बीच जैसे को तैसा की एक ऐसी सीरिज शुरू हुई कि आमने-सामने लडाई की नौबत!

4 नवंबर 2020 को प्रधानमंत्री ने टाइग्रे की क्षेत्रीय राजधानी मेकेले के बाहर संघीय सैनिक छावनी पर टीपीएलएफ द्वारा हमले और वहा हथियार छीनने की कोशिश का आरोप लगाया। अबी ने सैनिक आपरेशन का आदेश दिया। पड़ोस के अमहरा प्रांत से राष्ट्रीय सैनिकों और इरिट्रीया से भी सैनिकों को भेजा। महीने भर के अंदर अबी ने टीपीएलएफ और उसके लडाकों को हरा तो दिया लेकिन बागी प्रदेश में अपनी क्षेत्रिय सरकार बना उसका नियंत्रण बनवाना व बागियों को खत्म करना मुश्किल काम था।

एक प्रदेश में टकराव शुरू होते ही नस्लीय आधार पर बने दूसरे प्रदेशों में भी तनाव व हिंसा सुलगी। इनमें प्रधानमंत्री अबी का गृहक्षेत्र, ओरोमिया भी शामिल है। यह प्रदेश देश का सबसे घनी आबादी वाला है। इसमें मई 2021 में हथियारबंद समूह ओरोमो लिब्रेशन आर्मी (ओएलए) ने अबी की सरकार के खिलाफ “पूर्ण युद्ध” छेड़ने का एलान किया।

जून 2021 में टाइग्रे के लडाकों ने क्षेत्रीय राजधानी मेकेले पर फिर से कब्जा किया। तब केंद्र सरकार ने एकतरफा युद्ध विराम घोषित कर टीपीएलएफ से सुलह चाही। मगर उसने स्पष्ट रूप से युद्ध विराम से इनकार किया और अपनी लड़ाई टाइग्रे की सीमा से आगे पड़ोस के अमहरा और अफार प्रदेशों में भी फैला दी।  

कुल मिलाकर इस एक साल में ग़ृह युद्ध में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। 20 लाख से ज्यादा लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं। अकाल, मनमानी व अत्याचार में काफी कुछ तबाह है।

अब इथियोपिया में गृहयुद्ध जोरों पर है। टाइग्रेन सेना और उनके सहयोगी राजधानी आदिसअबा की ओर बढ़ रहे हैं। वे चारों और जमीन से घिरे इथियोपिया को जोडने वाले मुख्य बंदरगाह ज़िबूती का रास्ता बाधित करने की कोशिश में है। इथियोपिया सरकार ने इमरजेंसी की घोषणा कर रखी है। प्रधानमंत्री नागरिकों से अपील कर रहे है कि वे सशस्त्र सेना में शामिल हो। गए हफ्ते प्रधानमंत्री अबी ने एलान किया कि वे टाइग्रे सेना और उसके सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष को निजी तौर पर निर्देशित करेंगे।

उन्होंने लिखा, “युद्ध के मोर्चे पर मिला जाएऔर समय आ गया है कि देश का नेतृत्व बलिदान के साथ किया जाए।इसके बाद दो ओलंपियन एथलीट (दो बार स्वर्ण पदक और दो बार रजत पदक) ने अपना नाम सेना में लिखवाया। उधर बिगडते हालातों में दुनिया के देश इथियोपिया से अपने नागरिकों को लौट आने के लिए कहने लगे है।

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विडंबना है कि प्रधानमंत्री अबी अहमद (बराक ओबामा के बाद) नोबल शांति पुरस्कार के महत्व और प्रतिष्ठा को कायम नहीं रख सके। नस्लीय दुराव को पाटने और शांतिपूर्वक, लोकतांत्रिक आजादी के वायदों के बावजूद अबी ने दमनकारी फैसले लिए। जैसे इंटरनेट और टेलीफोन सेवाएं बंद करना, पत्रकारों को गिरफ्तार करने और आलोचकों को दबाना। अबी की आलोचना टाइग्रे में टकराव के दौरान “भड़काने वाली बातों” के लिए भी है। टाइग्रे के लडाका समूह को उन्होंने “जंगली घास” और “कैंसर” कहा। यों जुलाई में युद्ध के बीच अबी और उनकी पार्टी ने आम चुनाव में जीत हासिल की थी मगर विपक्षी दलों के बायकाट के बीच। कई मतदाताओं को वोट नहीं डालने दिया गया। इनमें टाइग्रे के मतदाताओं को रोका गया। यह सब उन लोगों के लिए भारी निराशा का मुद्दा है जिनसे अबी ने तीन साल पहले लोकतांत्रिक उदारता का वादा किया था।

जाहिर है इथियोपिया आज वह देश है जो अपने ही खिलाफ युद्ध कर रहा है और इतिहास गवाह है कि ऐसे युद्ध का अंत बर्बर विस्थापन और मौत के रूप में होता है। पूरा  देश खत्म हो जाता है और लोग विस्थापित हो कर भारी कीमत चुकाते हैं।

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