नाजुक वक्त और कश्मीर के सवाल

इकतीस अक्तूबर को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटे अस्सी दिन पूरे हो जाएंगे। इन अस्सी दिनों में जितनी पीड़ा कश्मीर ने झेली है, उससे कहीं ज्यादा भारत भी पीड़ा में है। जरा अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर नजर डालें तो कश्मीर ऐसी सुर्खियां में है जिससे भारत वैश्विक पटल पर एक दमनकारी देश के रूप में पेश हो रहा है। जैसे – 14 अक्तूबर को वाशिंगटन पोस्ट की हैडिंग थी- भारत का कश्मीर में दमन लोकतंत्र के विपरित। 30 सितंबर को न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा- कश्मीर मेंबदहाली और बढ़ता गुस्सा। 14 अगस्त को गार्डियन में शीर्षक था- भारत के अवैध कब्जे में कश्मीर बनता उपनिवेश। 20 सितंबर को फॉरेन अफेयर्स ने लिखा- कश्मीर जीता पर भारत खोया(Winning Kashmir and Losing India)। यह सिलसिला लगातार है। दुनिया के सारे अंतरराष्ट्रीय संगठनों में कश्मीर की चर्चा बतौर विवाद है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक बानगी है जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का बोलना हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केबोलने से अधिक चर्चित हुआ। इस हफ्ते अमेरिकी कांग्रेस में दक्षिण एशिया में मानवाधिकार पर सुनवाई के दौरान भारत घेरे में था, वह भर्त्सना का केंद्र और अपनी बात समझाने में असमर्थ। संदेह नहीं कि दुनिया को समझाने में हम अस्सी दिनो में असमर्थ साबित हुए है। हम दुनिया को अपनी इस बात पर रजामंद करने में नाकाम है कि अनुच्छेद-370 को खत्म करना भारत और कश्मीर दोनों के हित का फैसला है।

आखिर हमें इस मुद्दे पर जूझना क्यों पड़ रहा है? आखिर हम कहां गलतहैं? हम दुनिया को क्यों यह समझा पाने में नाकाम हैं कि भारत वैसा दमनकारी देश नहीं है जैसा कि दुनिया में उसे पेश किया जा रहा है?

दुर्भाग्य है कि यह समस्या दरअसल हमारे अपने भीतर की है, हमारी सरकार की है, इसके रणनीतिकारों की है, मीडिया से है जिसके बारे में वे सोचते हैं कि इसे काबू में कर लिया है, उस सोशल मीडिया को लेकर है जिसके बारे में सोचा जाता है कि पैसे से सबकुछ मनमर्जी बनवाया जा सकता है।

अगर हमें अस्सी दिनों की स्थिति को समझना है तो पहले एक नजर इस बात पर डालनी होगी कि हाल में अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाई में हुआ क्या? इस बैठक का ज्यादातर समय कश्मीर के हालात पर चर्चा में गया। बैठक में ट्रंप प्रशासन की ओर से प्रतिनिधि बन कर आईं दक्षिण एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री ने जम्मू-कश्मीर में भारत की कार्रवाई और प्रदेश के मौजूदा हालात को लेकर तस्वीर पेश करने की जो कोशिश की, वह एकदम निष्पक्ष तो थी, लेकिन उससे यह संदेश गया कि कश्मीर में “मानवीय संकट” खड़ा हो गया है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि भारत सरकार ने अमेरिकी राजनयिकों को घाटी का दौरा नहीं करने दिया और न ही भारत के राजनेताओं को कश्मीर जाने की इजाजत दी। इसके जवाब में भारत ने सबसे बड़ा रक्षात्मक उपाय अपनाते हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सहारा लिया और कहा कि पाकिस्तान वहां आतंकवाद फैला रहा है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से ऐसा किया जा रहा है। पाकिस्तान समर्थक आतंकी संगठन मुसलमानों को मार रहे हैं, इसलिए घाटी में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संचार सुविधाओं पर प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया था।

पिछले अस्सी दिनों में भारत बार-बार इसी तर्क को दोहराता आया है। और इसी से भारत की छवि धूमिल होती गई है।

पाकिस्तान दुनियाभर में पहले से ही एक आतंकी देश के रूप में कुख्यात है। इस बारे में तमाम देशों की एकराय है कि वह आतंकवाद को बढ़ावा देता है और आतंकियों को तैयार करता है। इसलिए पाकिस्तान पर पिछले साल से फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) पहले से ही कड़ी निगरानी रखे हुए है। यह संस्था आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद पहुंचाने वालों पर कड़ी नजर रखती है। यह भी प्रमाणित हो चुका है कि पाकिस्तान ने हाल में कश्मीर घाटी में आतंकियों की घुसपैठ करवाई है ताकि घाटी में अशांति फैलाई जा सके। बावजूद इसके पाकिस्तान को आतंक फैलाने वाले देश के रूप में पेश करने की हमारी कोशिशें कश्मीर को लेकर भारत की छवि बनाने में मदद नहीं कर पा रही हैं। अंतरराट्रीय स्तर पर उसे अलग-थलग कर पाने में हम कामयाब नहीं हो पाए हैं। जाहिर है कश्मीर घाटी की समस्याओं के लिए पाकिस्तान पर दोषारोपण से काम नहीं चलने वाला, हमें उन समस्याओं पर ध्यान देना होगा जो हमारे अपने भीतर मौजूद हैं।

विदेश मंत्री एस, जयशंकर कह रहे हैं कि उदार अंग्रेजी मीडिया सही तस्वीर पेश नहीं कर रहा है। लेकिन माननीय विदेश मंत्री किस सही तस्वीर की बात कर रहे हैं? कश्मीर में क्या हो रहा है और 31 अक्तूबर के बाद क्या होगा, इसकी सही तस्वीर तो सरकार खुद पेश नहीं कर रही है। कश्मीर को लेकर सिर्फ एकतरफा खबरें बताई और दिखाई जा रही हैं। शुजात बुखारी की हत्या की खबर तो अंतरराष्ट्रीय पटल पर छा गई थी, लेकिन हाल में राजस्थान के ट्रक ड्राइवर शरीफ खथान सहित तीन ट्रक ड्राइवरों की हत्या या सेब व्यापारी चरनजीत सिंह की हत्या या छत्तीसगढ़ के मजदूर सेठी कुमार सागर की हत्या की खबरों को कोई नहीं दिखा रहा!

ये वो निर्दोष लोग मारे गए हैं जो रोजी-रोटी के लिए कश्मीर गए थे और क्रूरतापूर्वक इन्हें मार डाला गया और ये घटनाएं इन्ही अस्सी दिनों की हैं। इसी तरह कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं के खौफ की खबरें गायब हैं और हिरासत में लिए गए लोगों की खबरें आ रही हैं। घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन पर दुनिया का मीडिया चुप्पी साधे हुए है। अगर आप गूगल पर कश्मीर सर्च के लिए डालें तो बशारत पीर की कर्फ्यू नाइट्स और मिर्जा वहीद की द कॉलेबोरेटर सामने आ जाएंगी और गूगल की इस सूची में लिखा होगा कि इन्हें जरूर पढ़ें, जिन्हें गार्डियन, फाइनेशिंयल टाइम्स ने कंपाइल किया है।

ये सारा लेखन, किताबें भारत और भारतीय सेना के कश्मीर में दमन को लेकर लिखी गई हैं। और आज भी, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी ये लेखक ऐसा ही नैरेटिव पेश कर रहे हैं।

राहुल पंडिता की किताब ‘अवर मून हैज ब्लड क्लॉट्स’ में हालांकि इस हवा को बदला गया है। पंडिता जैसे पत्रकार बिरले ही हैं जिन्होंने कश्मीर को दूसरे चश्मे से देखने की हिम्मत की है। बहुत ही कम ऐसा देखने में आया है जब कश्मीरी पंडित या हिंदू समुदाय के पत्रकार के लेखों को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कोई जगह मिली हो। घाटी से जो सामने आ रहा है वह सेब जलाने, ट्रक ड्राइवरों की हत्या, पाकिस्तान जिंदाबाद जैसी बाते ही हैं। नेताओं की नजरबंदी, मीडिया पर पाबंदी (सिर्फ सरकार के पसंदीदा मीडिया को छोड़कर ) और सारे मामलों को गोपनीय रखने की कवायदें जारी हैं। और गार्डियन, न्यायार्क टाइम्स फॉरेन अफेयर्स दुनिया को जो तस्वीर दिखाएंगे, उसे‘निष्पक्ष’ माना जा रहा है। पर इंटरनेट, वैश्विक मीडिया पर ये है तो है इसके समानांतर और है क्या? तस्वीरें दुख और गुस्सा पैदा करती हैं, लेकिन यह हकीकत है। इसकी काट में और जमीनी सच्चाई, घटनाओं के हवाल भारत सरकार को असली तस्वीर सामने लाने के लिए कदम तो उठाने होगे।

अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करने का फैसला सरकार का सही कदम था, ऐसा देश के लोगों का मानना है और इसलिए लोगों ने इसे समर्थन भी दिया है। लेकिन झूठी किस्सागोई चलाते रहना भी सही नहीं है। दुनिया को अधिकार के साथ यह बताने की जरूरत है कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है और इसे हमने सही तरीके से हल किया है और भविष्य में भी ऐसा ही होता रहेगा। और वहां के लोगों के अलगाववाद, पाकिस्तान के आंतकवाद की सच्चाई फंला-फंला है। इतने ड्राइवरों के, सेब के कारोबारियों को फंला-फंला तरह मारा या दबाया गया।

सो बात कहने के, दृष्टिकोण रखने के तरीके में व्यापक सुधार की जरूरत है। दाय़रा व्यापक होना चाहिए। भारत सरकार द्वारा इसके लिए ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जिससे लगे कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के बिना ही अनुच्छेद 370 के खात्मे से कश्मीरियों और भारत दोनों का फायदा हुआ है। इसमें पूर्वाग्रह से ग्रस्त नैरेटिव नहीं होना चाहिए। 31 अक्तूबर को भारत के नौ केंद्र शासित प्रदेश हो जाएंगे, लेकिन अभी किसी को भी यह नहीं मालूम कि इनमें से एक का क्या होगा? क्या भारत जम्मू-कश्मीर के लोगों को सामूहिक रूप से इसके लिए संतुष्ट कर पाएगा, मीडिया और सोशल मीडिया में इसे लेकर जो चल रहा है, उसे लेकर बनी आशंकाएं दूर हो पाएंगी, ये गंभीर सवाल है। वक्त बहुत ही नाजुक है और भविष्य के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। आज दुनिया में भारत को एक ऐसे मुल्क के रूप में देखा और पढ़ा जा रहा है जो अपनी लोकतांत्रिक चमक, रंग खो रहा है।

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