कश्मीर पर बात से करें परहेज!

क्या‍ हम कश्मीर को कभी समझ सकते हैं? इससे भी बड़ी बात यह कि क्या हम कभी कश्मीर समस्या को हल कर पाएंगे?

ये सवाल इसलिए मस्तिष्क में कौंध रहे हैं क्योंकि अब साल खत्म होने को है और कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी लगे और घाटी के इलाके को देश से कटे डेढ़ सौ दिन होने वाले हैं। सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि कयास कश्मीर के इस तरह से अलग-थलग पड़े रहना और साल खिंच सकता है। कश्मीर मुद्दे पर जो लोग सरकार के साथ करीब रहकर काम कर रहे हैं, उनका भी मानना है कि कश्मीर अनिश्चितता के भंवर में फंसा रहेगा। कम से कम तीन साल यथास्थिति माने। कोई हल नहीं निकलने वाला। इस दौरान लोगों में गुस्सा खदबदाता रहेगा, गुस्सा-हिंसा फूट सकती है तो हालात जटिल बनते जाएगें। इससे जो वक्त और माहौल बनेगा, वह पहले को मुकाबले कहीं ज्यादा अशांति वाला होगा। नतीजतन कश्मीर के लिए और हमारे लिए हालात और मुश्किलों भरे हो जाएंगे। संभाले नहीं संभलेंगे।

इसकी आहट महसूस की जा सकती है। जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, कश्मीर में इसकी झलक मिलनी शुरू हो गई है। कश्मीरियों में अलगाव की भावना पैठ रही है। कश्मीरी मुसलमानों का वह हिस्सा जो एक समय हमारे साथ और समान सोच-विचार वाला दिखता था, जिसने खुद को आधुनिक विचारों और मिजाज में ढाल लिया था,वह मुख्यधारा से खिसकना शुरू हो गया है। उनसे बातचीत करके देखिए, एक तरह का आक्रोश अब झलकता है, लोगों के मन में गुस्सा भरता जा रहा है, खुशी गायब है।

कश्मीरी अब हमसे दूरी बनाते जा रहे हैं। पिछले पांच महीनों में देखें तो हर वह बात, हालात जिसे हम पहले खराब कह रहे थे, अब और ज्यादा बदतर हैं। जैसे तब अनुच्छेद 370 को खत्म करना क्या सही फैसला था? दशकों पुरानी इस समस्या के समाधान के लिए और कोई उपाय नहीं सूझ सकता था, लेकिन ठीक उसी समय से मोदी सरकार के इस फैसले को लेकर संदेह भी पैदा होते चले गए और ये संदेह अब और गहराते जा रहे हैं। और सिर्फ हमारे उनके बीच पनपे अलगाव को लेकर ही नहीं, बल्कि उस नैरेटिव को लेकर भी है जो हमने शुरू किया और उसे लगातार तवज्जो देते चले गए।

कुछ दिन पहले मैं दिल्ली स्थित ब्रिटिश हाईकमीशन में सेंट एंड्र्यूज डे के समारोह में गई थी। वहां शाकाहारी हैगिस (स्कॉटलैंड का एक पारंपरिक व्यंजन) पर बातचीत शुरू हुई और बढ़ते-बढ़ते कश्मीर पर चली गई। ज्यादातर लोगों का मानना था कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, वह पूरी तरह गलत है। सरकार का बहुत ही क्रूर फैसला था। हमने दलील दी थी कि दूसरा रास्ता क्या था, क्यों यह वक्त के अनुभव में जायज, महत्त्वपूर्ण था, बजाय एक क्रूर फैसले के। लेकिन इस संवाद का अंत सिर्फ यह हुआ कि किसी को गले यह सफाई नहीं उतरी, सिर्फ दो ही लोग दूसरे पक्ष से संतुष्ट हो पाए।

मुझे लगता है कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला एक उपलब्धि है, लेकिन सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश में एक बड़ा हिस्सा है जो इसे दूसरे तरीके से भी देख रहा है। और यही वह दूसरा पक्ष भी है। कश्मीरियों (मुसलमानों ) ने संघर्ष किया है और अब उन्हें घेरा जा रहा है। 16 नवंबर को दिल्ली में रास्ता में एक संगीत महोत्सव का आयोजन हुआ।उसमें कश्मीर के अहमर जावेद ने प्रस्तुति दी थी। अहमर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की सुर्खियां बने। उनकी इस प्रस्तुति की खूबी ये थी कि उनके संगीत में पीड़ा, नफरत और आजादी का ‘समावेश’ साफ था। बीस से तीस साल के बीच के नौजवानों ने उनके कार्यक्रम में जिस तरह का जोश दिखाया और पूरा कार्यक्रम जिस तरह से तालियों की गड़गड़ाहट में चलता रहा, उसमें साफ झलक रहा था कि अहमर सहित सारे लोगों में सरकार के प्रति, जमीन संबंधी कानूनों को लेकर और सरकारी प्रतिनिधियों को लेकर भारी गुस्सा है।

आखिर अहमर का यह संगीत था क्या? पंजाबी, हिंदी और कश्मीरी के मिले-जुले इस संगीत में यह बताया गया था कि निर्दोष कश्मीरी मुसलमानों पर सेना किस तरह से दमन कर रही है, उन्हें कुचल रही है। सरकार और सेना के दमन को बताने वाले शब्दों का बार-बार इस्तेमाल किया गया और संगीत को इस तरह से तैयार किया था कि नौजवान उसमें खिंचे चले आएं। इस संगीत में अभिव्यक्ति की आजादी को बार-बार दोहराया जा रहा था, लोग अहमर के साथ-साथ पूरे जोश में थे और गुस्से में सरकार की कड़ी भर्त्सना कर रहे थे। लोगों का वह गुस्सा घाटी की हकीकत को बयां करने के लिए काफी था। यह भी साफ नजर आ रहा था कि जिस आजादी में यह संगीत उत्सव चल रहा है और लोग खुल कर सरकार के खिलाफ बोल-गा रहे हैं, वैसी आजादी कश्मीर में कहां है? यह बिडंबना ही है कि इसे कोई गंभीरता से नहीं ले रहा।

कश्मीरोनॉमिक्स भी एक ऐसी ही छोटी सी पहल थी। यह कार्यक्रम 27 नवंबर को आयोजित किया गया था। अपनी तरह के पहले इस कार्यक्रम में समान सोच वाले कुछ पत्रकारों, नौकरशाहों, कारोबारियों और सुरक्षा प्रमुखों ने शिरकत की थी और जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लिए आगे का रास्ता क्या हो, इस पर विचार हुआ था। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और स्मृति ईरानी चेहरा जरा-सी देर के लिए आए और थोड़ी बातचीत में कहा कि इस तरह के प्रयास होते रहने चाहिए, और फिर निकल लिए।

अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद संभवत यह पहला मौका था जब इस तरह के संवाद की कोई पहल हुई थी, जिसमें सामाजिक ढांचे, सुरक्षा, कारोबार, शिक्षा, पर्यटन जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद की शुरुआत हुई।

कश्मीरोनॉमिक्स नाम का यह कार्यक्रम कश्मीर में जन्मे पत्रकार सिद्धार्थ जराबी के दिमाग की उपज थी जिसमें लोगों को जुटाय़ा गया था और यह पूरी तरह से सरकार प्रयोजित था। दुख की बात यह है कि जिस नई पहल के लिए इसका मकसद रखा गया था, वह तो इसमें कहीं दिखाई नहीं दी, बल्कि यह कार्यक्रम एक प्रोपेगेंडा, झूठमूठ के प्रचार का हथियार बन कर रह गया। इसमें जिन लोगों को बुलाया गया था, वे एक तरह से सरकार-समर्थक ही थे। जो पत्रकार इसमें पहुंचे, वे सरकार के अनुकूल बातें करने वाले थे और इसमें एक समुदाय विशेष के लोगों को खासतौर पर बुलाया गया था जिनकी संख्या काफी ज्यादा थी।

पर ऐसे ही आयोजनों की जरूरत है। इनके जरिए ईमानदारी से सरकार को गंभीरता से यह सोचने की जरूरत है कि कश्मीर के लिए क्या योजनाएं बनाई जाएं? इसलिएभी जरूरी है कि कश्मीरोनॉमिक्स जैसे आयोजनों से नया करने के जो संवाद और प्रयास होते हैं, वे हमेशा अनिश्चितता लिए होंगे, उनका कोई सार्थक नतीजा निकल पाएगा, इसमें संदेह है क्योंकि अहमर ने जिस तरह से संगीत आयोजन से लोगों खासतौर से नौजवानों को अपनी ओर खींचा, वह बड़ी बात है। अहमर जैसे लोग ऐसे आयोजनों से लोगों को अपनी ओर खींचते रहेंगे। वह एक-पक्षीय नैरेटिव होगा। आज जो कश्मीरी नौजवान हैं उन्हें कश्मीरी पंडितों के पलायन की पीड़ा के बारे में जरा भी पता नहीं है। कश्मीरियों की इस जवान पीढ़ी को कट्टरपंथी दुष्परचार के बारे में भी कुछ नहीं पता जो घाटी में पूरी तरह से पैर पसार चुका है।

सवाल उठता है कि क्या इसे रोका जा सकता है? क्या बदलते माहौल में कश्मीरोनॉमिक्स जैसे प्रयास कारगर हो सकते हैं? क्या इससे कश्मीर समस्या के समाधान का रास्ता निकल सकता है? जवाब है- नहीं, क्योंकि इस समस्याग्रस्त पुल के नीचे से बहुत पानी बह चुका है। और इसलिए कश्मीर हमेशा एक समस्या बना रहेगा। क्योंकइसे समझ पाना और बांधे रख पाना दोनों ही बहुत मुश्किल है। हालांकि एक रास्ता बन सकता है और वह यह कि सबसे पहले तो हम कश्मीर नैरेटिव के बारे में कुछ भी बोलना या बात करना बंद कर दें। कुल मिलाकर अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म करके कश्मीर को भारत का संपूर्ण हिस्सा बना लिया गया है, न कि कोई विशेष। जब कश्मीर भारत का अटूट अंग है तो फिर हमें कश्मीर और कश्मीरियों को केंद्र में रख कर बार-बार बात क्यों करनी चाहिए। उस स्थान को और उन्हें महत्व क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?

कश्मीर को भी वैसे ही लिए जाने की जरूरत है जैसे हम भारत के अन्य राज्यों को लेते हैं। अब हमें अगला आयोजन जम्मूनॉमिक्स को लेकर करना चाहिए और उसमें लद्दाख को भारत का कोहिनूर बताने की जरूरत है। पत्रकार बिरादरी के लिए अब वक्त आ चुका है जब उसे अपना ध्यान कश्मीर के साथ-साथ जम्मू और लद्दाख पर भी देना होगा। देश-दुनिया को वहां के विकास और सशक्तीकरण के बारे में बताना होगा। अब समय आ गया है जब हमें कश्मीर के बारे में बातचीत से परहेज करना चाहिए और धार्मिक प्रपंच से बाहर निकल कर नए राजनीतिक वातावरण के लिए काम हो।

2 thoughts on “कश्मीर पर बात से करें परहेज!

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