nayaindia 16 मईः हमारी तारीख, हमारी प्राप्ति, पर चिंता की भी तारीख! - Naya India
बेबाक विचार | लेख स्तम्भ | श्रुति व्यास कॉलम| नया इंडिया|

16 मईः हमारी तारीख, हमारी प्राप्ति, पर चिंता की भी तारीख!

हम तिथियों की महत्ता मानते हुए, उसकी पूजा करते हुए जीते है। उनका खास अर्थ उसके खास भाव से होता है। तारीख विशेष के हम कतृज्ञ होते हैं। तारीख बहाना होती है उत्सव का, समझने का, रस-रंग में डूबने का। उनसे हम इसलिए भी प्रेम करते है क्योंकि वे जीवन के मकसद की याद दिलाती हैं। तारीखें उष्म, मूल्यवान और स्वप्निल होती हैं।

16 मई एक ऐसी ही खास तारीख है, खास अर्थ लिए हुए।

यह भी पढ़ें :   त्रासद है यह नया भारत

यह तारीख हमारे लिए, ‘नया इंडिया’ की छोटी सी टीम के लिए उत्सव की है तो राहत के साथ चिंता की भी। उत्सव-संतोष-खुशी इसलिए कि ‘नया इंडिया’ आज अपने अस्तित्व के 11 वर्ष पूरे कर रहा है। लंबी सांस के साथ राहत इस कारण कि बिना प्राण वायु, साधन-संसाधन-विज्ञापन के बावजूद ‘नया इंडिया’ जिंदा है। लेकिन दिल-दिमाग बोझिल है इस सवाल से कि– क्या हम बदहाल-अंधकारमय वक्त में लक्ष्मी के श्राप, धन-साधन की अनिश्चितता, अभाव में जिंदा रह पाएंगे?

पिछले दो साल, तिल-तिल कर खत्म होती ऑक्सीजन के… उत्सव रूखे-सूखे लेकिन वही सवालों की आग जलाने, फड़फड़ा देने वाली।

पिछले वर्ष में ‘नया इंडिया’ फरवरी से ही शत-प्रतिशत घर से काम में बनता-निखरता और धार पाता हुआ है। नई हकीकत और आने वाले महाकाल को अग्रिमता से ‘नया इंडिया’ ने ही समझा-जाना। और अपने आपको सत्य के अपने ध्येय में क्षमता से अधिक झोंक डाला। इन दो वर्षों में सरकार की गलतियों से देश, समाज, आर्थिकी, जनजीवन, वक्त और राष्ट्र-राज्य की जैसी-जितनी तबाही हुई है उन सब पर ‘नया इंडिया’ की कलम से वह सब हुआ है, जो पत्रकारिता का सत्य धर्म है तो राष्ट्र धर्म और लोक धर्म भी। पिछले वर्ष ‘नया इंडिया’ का वार्षिक अंक प्रवासी मजदूरों की त्रासदी, असहायता को समर्पित था। मैं तब मर्मांतक विवरण, विश्लेषण, तस्वीरों को देख असहज थी। मुझे लगा माहमारी के हालातों में उम्मीद और हौसला बनाना ज्यादा जरूरी है। तभी मैंने उस दिन उम्मीद पर लिखा- भय दूर करने के लिए आशा की छोटी-छोटी बूंदों का हो छिड़काव।

यह भी पढ़ें : बैचेन बनाने वाली चहल-पहल

आज उस लेख को मैंने जब पढ़ा तो मैं दुख-खेद में व्यथित हुई। व्यथा कि मैं कैसी भोली, नासमझ थी तब। मैंने उम्मीद से तब ऐसी उम्मीद बांधी बिना यह सोचे, कल्पना किए कि वक्त कैसा भयावह आने वाला है। मेरा आशावाद… उस भविष्य का गवाह बनने के लिए था, जब लोग तडपते, सिसकते हुए, सांस के पल-पल के लिए हांफते हुए और मृतक अपने लोथड़े, अपनी दुर्गंध, मानवता की दुर्गंध की नदियों में बहते, पशु-पक्षियों से नोच जाने की चिंता में जीवन बाद की शांति के लिए बेचैन।

मैं निराश हूं। मैंने उम्मीद से जरूरत से ज्यादा उम्मीद बनाई थी। मैंने आशा की थी कि हम सब बचे रहेंगे। न मेरे परिवारजन और मैं कोविड से बीमार होऊंगी, कोविड केसेज की एक संख्या बनूंगी, लेकिन मैं भी एक साल बाद कोविड की शिकार हो ऐसी बीमारी का हिस्सा बनी, जो लगातार नए रूप पा रही है और अधिकाधिक क्रूर व निर्दयी बनती जा रही है।

हां, तारीख ऐसा करती है। वे सत्य-विचार-परीक्षण के लिए याद कराने का प्रमाण बनती हैं।

जैसे की 16 मई 2019 का दिन था। वह दिन जब भारत में लोग लबालब आत्मविश्वास से भरे अपने सुप्रीम नेता की ज्यादा संख्या की बड़ी जीत से उम्मीद और आशा से झूमते हुए थे। आशाओं का नशा… लोग झूमते-नाचते हुए… पंखों को उड़ने के नए पंख। अब तो भारत बढ़ेगा ही, संपन्न बनेगा, पांच खरब डॉलर की आर्थिकी… ऐसा हिंदू राष्ट्र, जिसके आगे दुनिया झुकेगी, कांपेगी, आंख मिला नहीं पाएगी। भारत संपन्न, सोने की अनुशासित चिड़िया, साफ-सुथरा-सभ्य- आत्मनिर्भर और क्रांतिकारी। साल के भीतर जब जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटी तो उसकी तारीख लोगों के लिए बन गई तिथि। सीएए लागू किया गया, राम मंदिर की मंजूरी हो गई और सांप्रदायिक विभाजन की फसल पक कर कटने के लिए तैयार थी।

यह भी पढ़ें : यह कैसा नया वक्त, नई मौत!

लेकिन तभी समय खराब होना शुरू हुआ। 2020  का साल लॉकडाउन की धुंध में घिर गया। अनिश्चितता और कुशासन और मूर्खताओं का शुरू सिलसिला। पिछले साल ने आंखों को नम रखा और दिल भारी बना रहा क्योंकि देश के गरीबों और वंचितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। अचानक पूरे देश में किए गए लॉकडाउन ने एक ऐसी सचाई को सामने ला दिया, जिससे देश अभी तक जूझ रहा है। 2014 के ‘न्यू इंडिया’ के ऊंचे सपने देखने वाले महत्वाकांक्षी लोग रेलवे लाइन और सड़कों के किनारे मरने लगे, बंद ट्रकों और कंटेनर में घुटने लगे और अपने देश में अपने घर पहुंचने के लिए चोरों की तरह छिप कर जाने को मजबूर हुए। देश की हालत दयनीय हो गई। इसके बावजूद लोगों पर असर नहीं हुआ और अंधा नेतृत्व व सामाजिक असमानता उनके ध्यान में नहीं आई, पता नहीं क्यों। और साल के अंत तक जैसे ही केसेज कम होने लगे कि सड़कों पर, गलियों में घर-घर में कहा जाने लगा- मोदी है तो मुमकिन है!

और फिर 28 जनवरी 2021 को सुप्रीम लीडर ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच से सीना फुलाते हुए ऐलान किया भारत ने कोविड के खिलाफ जंग जीत ली। उसने आत्मनिर्भरता का दंभ भरा और ऐसा दिखाया, जैसे देश में सब कुछ ठीक है, सब चंगा सी। इसके बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ गया। पश्चिम बंगाल का चुनाव मिशन बन गया और कुंभ मेले के आयोजन सब चंगा सी का प्रमाण बना।

प्रधानमंत्री मोदी ने 17 अप्रैल 2021 को अति उत्साह में आसनसोल की रैली में कहा- ‘मैंने इतनी बड़ी भीड़ कभी नहीं देखी।‘ उस समय तक कुंभ मेले में शाही स्नान की पूरी आस्था, श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजन की इजाजत थी और उसी समय देश में कोविड केसेज का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा था। 14 मई को देश में कुल कोविड केसेज की संख्या दो करोड़ 40 लाख 46 हजार 809 हो गई। चार हजार लोगों की मौत हुई, जिससे मरने वालों की संख्या दो लाख 62 हजार 317 पहुंच गई। इसका मतलब हुआ कि इस तारीख को और इस समय में सामान्य से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है।

यह भी पढ़ें : बैचेन बनाने वाली चहल-पहल

हां, तिथियां अहम होती हैं। एक साल में, सात सालों में से दो साल में, एक महीने में, एक दिन में हम उत्साह, उच्छास से दुख, भय और चिंता में पहुंच गए। आज 16 मई 2021 को और कुछ नहीं सिर्फ भय है। चौतरफा घेरता भय, दुख और निराशा से भला हुए या फिर गुस्से से भरा हुआ। आज 16 मई 2021 को कुछ नहीं अपने सुप्रीम लीडर और उसके दरबारियों के निकम्मेपन के लिए बस नफरत, गुस्सा, नापसंदगी ही है। लोगों में गुस्सा है, सवाल है और अविश्वास है। जो व्यक्ति उम्मीद की ऊंची लहरों पर सवार होकर आया था वह पूरे देश और उसके लोगों पर बोझ बन गया है।

क्या आने वाला कल आज से अलग होगा? उम्मीदें खत्म हो गई हैं और भरोसे का कत्ल हो गया है और जिंदा या मर गए लोगों की कराहों में मैं सिर्फ फादर पैनेलो की यह लाइन याद कर सकती हूं- मेरे बंधुओं आप इसी के लायक हो। ( द प्लेग- अल्बर्ट कामू)

Leave a comment

Your email address will not be published.

twenty − fourteen =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
बिहार में उपमुखिया के हत्यारे को भीड़ ने मार डाला
बिहार में उपमुखिया के हत्यारे को भीड़ ने मार डाला