युवा नेताः विचार में सूखे, अवसर के भूखे!

सन् 2020 का वक्त विचार, विचारधारा और आदर्शो का नहीं है। न युवा राजनीति, यूथ नेता विचार और संर्घष में पके है। तब यदि यूथ नेता बदलते फैशन की तरह पार्टियां बदले, नए रंग आजमाए तो क्या आश्चर्य!  ज्योतिरादित्य और सचिन पायलट उस पीढ़ी के प्रतिनिधी है जिसे सब जल्दी चाहिए!  राजनीति अब वह प्रोफेशन, वह करियर है जिसमें फटाफट पदौन्नति, पैसा, सत्ता, यश चाहिए। यदि कंपनी विशेष में जल्दी सब नहीं मिला तो दूसरी कंपनी  से पैकेज बनवाओं और नौकरी बदलों। मैं हूं नेता और वह यदि खानदानी विरासत वाला यूथ चेहरा हुआ, इलाके विशेष या जाति विशेष का नौजवान नेता हुआ तो कहना ही क्या! तब दिल-दिमाग में दंभ सबसे ऊपर हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि अवसरवादी हर पीढ़ी में नहीं होते, सत्ता और पैसे के पीछे नहीं भागते, चाहे इसे व्यक्तिगत स्तर पर देख लें या सामूहिक स्तर पर। बावजूद इसके तब और अब का फर्क तो है। कैसे यह हुआ जो वक्त हमें आज वहां ले आया जहां हम हैं। एक तरफ वैश्विक महामारी से लड़ रहे हैं तो दूसरी और सत्ता की भूख के वे किस्से है जिसमें बार-बार सवाल बनता है कि देश की राजनीति में विवेक को किस वायरस ने खाया है। ऐसा और इतना कि पहले मध्यप्रदेश में और अब राजस्थान में यूथ नेता ने वह किया जिससे करियर की भूख में विचार-विचारधारा की जीरो चिंता नहीं।

निश्चित ही राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद सचिन पायलट ने अपने को चौराहे पर पाया।  उनको और उनके दरबारियों को स्वभाविक लगा कि उन्होंने जैसा काम किया उससे वे जिसके हकदार थे, वह उन्हें नहीं मिला। लेकिन सवाल तब भी था कि क्या उन्होंने ऐसा कुछ किया भी जिससे कांग्रेस जीती!

विधानसभा चुनाव के दौरान चुनावी रिपोर्टिंग में मैंने एक बात साफ तौर पर देखी थी कि राजस्थान के लोगों में इस बात को लेकर एकराय थी कि मुख्यमंत्री के लिए तो अशोक गहलोत को ही वोट दिया जाए और भविष्य के तौर पर सचिन पायलट ठिक होंगे।  युवाओं से लेकर वृद्ध तक, नौकरीपेशा तबके से लेकर व्यापारी वर्ग तक और यहां तक कि घरेलू महिलाओं से लेकर कालेज जाने वाले युवा तक की पसंद अशोक गहलोत थे। जयपुर के जवाहर कला केंद्र में कॉफी और मसाला डोसा का लुत्फ लेते हुए पत्रकारों में भी तब सहमति दिखी कि उन पर (गहलोत) जनसामान्य का भरोसा है और सामान्य जन के सहज नेता हैं।

तभी सत्ता की बागडोर स्वभाविक तौर पर, अधिकांश विधायकों की राय से अशोक गहलोत को मिली। उस वक्त सचिन पायलट के पास अंग्रेजी मीडिया का प्रचार था कि उन्होंने ‘कड़ी मेहनत’ की। पर हकीकत में वह भी ज्यादा था जो उन्हे उपमुख्यमंत्री बनाया गया। पायलट संतुष्ट नहीं हुए। यूथ नेता की बैचेनी बढ़ती गई। पायलट को लगता रहा कि अशोक गहलोत ने जितना काम अपने चार दशक के राजनीतिक जीवन में नहीं किया, उससे ज्यादा कड़ी मेहनत और काम तो उन्होंने चार साल में कर दिखाया। सचिन को लगा वे अलग-थलग किए जा रहे हैं। उनके साथ अन्याय हो रहा है। प्रदेश में पार्टी का, कंपनी का मैं मालिक, मैं वोट दिलवाने वाला, मेरा गुर्जर आधार, मेरे पर मरता अंग्रेजी का राष्ट्रीय मीडिया और फिर भी मैं अशोक गहलौत के अधीन उपमुख्यमंत्री।

उन्हें लग रहा था और जैसा कि बताया भी जा रहा था कि 2014 से 2018 के बीच उन्होने राज्य के दौरों से, लोगों से मुलाकाते कर,  सभाओं में अपने कलपदार कुर्ते वाली वेशभूषा से अपना करिश्मा बना कर,  दिल्ली के मीडिया के जरिए राज्य के नंबर एक नेता के नाते जब वे स्थापित है तो उन्हे मुख्यमंत्री बन कर ही चैन लेना है। हकीकत अलग थी। राजस्थान के लोगों ने पायलट को शुरू से ही देखा कि वे एक तरह से छद्म और दिखावे वाले हैं। कांग्रेसी नेताओं, कार्यकर्ताओं का भी उनके व्यवहार के हवाले कहना होता था कि सचिन के पास अभी अनुभव की बहुत कमी है। लोगों के बीच केवल वे नौजवान चेहरा होने को भुनाते हैं। उनकी असल मुश्किल जातिगत राजनीति है। चुनाव के वक्त कई लोगों ने सचिन पायलट की गुर्जर राजनीति को उनकी कमी बताया। वे राज्य में सभी जातियों का मिलाजुला व्यापक जनाधार वाला नेता बनाने में नाकाम रहे। यह बात लोगों के मन में पैठी कि ऐसा नेता कैसे राज चलाएगा जो जाति विशेष की राजनीति करता है।

इस हकीकत को सचिन पायलट ने नहीं समझा। पर प्रदेश के लोगों की भावना को दिल्ली में गांधी परिवार ने समझा। उन्हें हमेशा लगता रहा कि पिता की विरासत को बनाए रखने के लिए वे कांग्रेस में थे और पंद्रह साल से उन्होंने जितना भी किया, पार्टी ने उन्हें कुछ नहीं दिया। वे दिल्ली में अपने दरबारियों से घिरे रहे और मुख्यमंत्री बनने का सपना पालते रहे। उन्हे गलतफहमी थी कि मुख्यमंत्री उन्हें ही बनाया जाएगा, बनाया जाना चाहिए था क्योंकि वही सर्वाधिक योग्य और हकदार है। कांग्रेस को उनका ऋणी होना चाहिए। जाहिर है यह सब सोचते-सोचते उनकी महत्त्वाकांक्षाओं ने दिमाग में विचार, विचारधारा और सिद्धांतों को हाशिए में डाला।

संदेह नहीं कि दीपेंदर सिंह हुड्डा, जतिन प्रसाद, सुष्मिता देब सहित ज्योतिरादित्य सिंधिंया और सचिन पायलट को भविष्य के नेता के रूप में देखा जाता रहा है। नब्बे और उसके अगले दशक वाली पीढ़ी के ये नेता विचारधारा के लिए प्रतिबद्धता, पार्टी के प्रति वफादारी, सुनियोजित तरीके से पार्टी में अपने को बढ़ाने में सफल थे। लेकिन ज्योंहि पार्टी का ग्राफ गिरा और राजनीति संर्घष की बनी तो सब बाते एक तरफ और करियर की चिंता हावी। उसमें भी फिर छोटे अंहकार, छोटे स्वार्थ में वह हुआ है जिससे मौजूदा और भावी युवा पीढ़ी से यह उम्मीद करनी ही नहीं चाहिए कि वे राजनीति में विचार, आदर्श और मूल्यों का ख्याल रखेंगे।

सिर्फ राज्यसभा के लिए सिंधिया का भाजपा में शामिल हो जाना या सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से पायलट का बागी हो जाना न सिर्फ देश के यूथ के बुरे प्रतिनिधी उदाहरण है, बल्कि यह उस नई राजनीति का चित्रण भी है जो संतोष, धेर्य, वफादारी, प्रतिबंद्धता जैसे राजनैतिक-मानवीय मूल्यों से विहीन है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि 2019-2020 का वक्त गुजरे सालों से काफी अलग है। मोदी और शाह की राजनीति ने सत्ता हासिल करने के लिए देश को साम, दाम, दंड, भेद और पैसों के उन संस्कारों में ढाला है जिनसे पूरा समाज आदर्श, मूल्य, नैतिकता, विचार और विचारधारा में सूखा, बंजर हुआ है। ऐसे में यूथ नेता और नई पीढ़ी के पास कैसे कुछ बचेगा।  सिंधिया और पायलट के पास क्या रास्ता बचता है? पायलट और सिंधिया ने बहुत मजे से राजनीति भोगी। कांग्रेस में उन्हें एकल ऐसा माहौल था जो पिता की विरासत से था। इन्हे हाथ में पानी का गिलास भी नहीं पकड़ना पड़ा। दोनों आराम का राजनीतिक जीवन जी रहे थे और उसी से लोगों का लगाव-झुकाव थ। इससे अवसर थे। लेकिन क्योंकि ये विचार व विचारधारा में पके नहीं थे और विरासत से थे तो मोदी- शाह ने ज्योंहि अवसर की गाजर लटकाई तो पलक झपकते अवसरवादी हो गए। ऐसा करने वाले सिर्फ ये अकेले नहीं हैं। इसमें सिर्फ युवा ही नहीं हैं जो पैसे और भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा दे रहे हैं, बल्कि सत्तर और अस्सी के दशक की पीढ़ी के वे महिला-पुरुष नेता भी हैं जो विचार- विचारधारा, आदर्श-मूल्यों की शून्यता से मोदी-शाह की नई राजनीति के आसान टारगेट है।

अंत में, फिलहाल हर कोई अवसरवादी है, क्योंकि हम अब ऐसे वक्त में जी रहे हैं जिसमें अंहम, अंहमन्यता, अंहकार ही सब कुछ है। अगर अहम संतुष्ट होता है तो सब कुछ है। लेकिन जैसा कि इतिहास बताता है, एक दिन यह अहम भी मर जाएगा। लेकिन तब तक पायलट और सिंधिया जैसे लोगों की विचारधारा की बजाय अवसर को लपकने वाली राजनीति होगी ही। जब देश का प्रायोजन ही सत्ता और धन है और उसका खुलम-खुल्ला, खुला खेल फरूखाबादी है तो क्यों न सब अवसरवाद के तालाब में कूदे, छलांग लगाए और उसमें तैरै। यही 2020 है।

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3 thoughts on “युवा नेताः विचार में सूखे, अवसर के भूखे!

  1. क्या राहुल के करीबियों को निपटाया जा रहा है जब से प्रियंका गांधी राजनीति में सक्रिय हुई हैं ।

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