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रोया दीया और अचानक।।।वे क्षण, वह मूड!

दिन 28 जनवरी। वक्त कोई रात के 9.30 बजे। दिन भर दिल्ली की सिंघू सीमा पर किसानों का मूड समझने-बूझने के बाद मैं गाजीपुर के प्रदर्शनस्थल पर थी। सब कुछ नियंत्रित और शांत। भारत किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का रोता हुआ वीडियो देख चुकी थी। मन मान बैठा था कि किसान आंदोलन अब अंतिम सांस लेते हुए है। थोड़े-बहुत किसान जो बचे हुए थे वे शांत और जो होने वाला था उसका इंतजार करते हुए थे। टेंट-ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर जो डेरे थे, उनकी पहले जो संख्या-भीड़ थी वह छंट चुकी थी। खाली, सूने टेंट और चंद किसान और टिकैत के आंसुओं में गमगीन इलाका पत्रकारों में यह खबर बनवाए हुए था कि सब कुछ उजड़ गया है। सरकार-प्रशासन के कड़े रुख से घबराए किसान भाग गए हैं। प्रशासन की जगह खाली कराने की मंशा दो टूक है। जो किसान बचे हुए थे वे सब यह सोचते हुए बेचैन कि क्या होगा? क्या करेंगे?

सड़क के इस पार चिंतित, घबराए, मायूस किसानों के चेहरे तो सड़क के उस पार पुलिस, अर्द्धसैनिक बलों के खड़े वे जवान जो हथियारों से लैस आदेश को एक्शन में बदलने को तत्पर!

इस पार और उस पार। इस पार याकि वह प्रर्दशन स्थल जो दो दिन पहले तक किसानों के आंदोलन की भीड़, उनके इरादों और गतिविधियों में उतना ही सरगर्म था, जितना दिल्ली की सीमाओं के दूसरे आंदोलन स्थलों पर था। पर 26 जनवरी 2021 के गणतंत्र दिवस की घटनाओं ने और उसके मीडिया प्रसारण ने सब बदल दिया। उस दिन क्या होना था, क्या हुआ और भारत के मीडिया ने उसे कैसे प्रचारित किया, इसका आगे सम-सामयिक इतिहास में बहुत विश्लेषण होगा। पर जो हुआ उसका असर 27-28 जनवरी को सिंघू बॉर्डर व गाजीपुर बॉर्डर के आंदोलन स्थल पर बहुत गहरा था। किसान न केवल हैरान-परेशान-शर्मसार थे, बल्कि हर चेहरा यह सोचते गमगीन था, निराश था कि अब क्या बचा? सब खत्म! मकसद हुआ शर्मसार और जोश-हिम्मत पर पाला!

तभी किसानों के लिए 28 जनवरी की रात अनिश्चितता की घोर अंधेरी रात थी। आंदोलन के दीये की आखिरी रात! सभी प्रर्दशन स्थलों में बिजली-पानी काट दिया गया। न पीने का पानी और न कोई ओर बेसिक बंदोबस्त। टिकैत को, किसानों को दो टूक आदेश कि जगह खाली करो। कुछ रिपोर्टरों ने कहा सरकार सीसीटीवी कैमरे भी हटवा रही है। जाहिर है सुबह तक सब साफ मिलेगा। तमाम तरह की बातें, साजिश की पुष्ट-अपुष्ट कई थ्योरी। न्यूज चैनल अलग तनाव और सस्पेंस बनवाते हुए।

गाजीपुर प्रदर्शन स्थल किलेबंदी में घिरा हुआ तो सिंघू बॉर्डर भी। चारों और से सुरक्षा बलों की भारी बैरिकेडिंग, घेरेबंदी और बिजली-पानी-आवाजाही सब बंद। एक के बाद एक चेक प्वाइंट। सशस्त्र जवानों से सब कुछ घिरा हुआ। कहीं खाली जगह की गुजांइश नहीं। देर रात प्रर्दशन स्थल की ओर जाते हुए ईर्द-गिर्द का प्रशासन द्वारा बनवाया सन्नाटा इस खबर, धारणा को पुष्ट बनाने वाला था कि आज रात किसान भगा दिए जाएंगें। ज्यों-ज्यों प्रदर्शन स्थल के करीब पहुंचते गए त्यों-त्यों पुलिस बलों के जवानों की बढ़ती तादाद यह जतलाते हुए थी कि सरकार का इरादा दो टूक है। केंद्र और प्रदेश सरकार के तमाम तरह के पुलिस बलों के जवानों सहित सरकार समर्थक हुड़दंगियों की भीड़ की सड़क पार की मोर्चेबंदी के आगे टिकैत और उनके किसानों का मतलब बचा ही क्या था!

बढ़ता अंधेरा, बढ़ती ठंड! एक्शन का इंतजार। अचानक 11 बजे दीये का भभका तेज हुआ। हलचल बनी और तभी बदलने लगा मूड। नारे लगने लगे ‘जय जवान, जय किसान’! ‘भारत माता की जय’! ट्रैक्टरों की आवाज आने लगी। बेचैन, उनींदे किसानों ने जाना उनके साथी किसान आ रहे हैं। पता नहीं शुरुआती किसान कहां से आए लेकिन आए और रात एक बजते-बजते मूड में चमत्कारी परिवर्तन था। किसानों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी तो उधर सड़क पार सुरक्षा बल के जवान छिटकने लगे। जो रात हंगामी होनी थी, जोर-जबरदस्ती वाली और शायद हिंसक हो सकती थी वह उत्सवी हो गई। 26 जनवरी को बिखरे किसान फिर एकजुट हो गए और आंदोलन के दीये की बाती का विश्वास लौट आया। किसान आंदोलन हिम्मत और निश्चय में वापिस उठ खड़ा हुआ।

सुबह तीन बजते-बजते साफ हो गया कि जो रात सरकार-सत्ता के ताकत प्रर्दशन की रात होने वाली थी वह किसानों की रात है। दीया जो बूझने वाला था उसके रोते, टिमटिमाते आंसुओं से वह चमत्कार हुआ कि किसानों का हुजूम उमड़ पड़ा। किसी ने कल्पना नहीं की और शायद राकेश टिकैत ने भी उस क्षण या उसके बाद भी नहीं सोचा होगा कि सत्ता की दबिश की बेचैनी, भावविह्लता में जब वे रो पड़े थे तो वह बाकी किसानों के दिल-दिमाग को ऐसे छू लेगा।

चंद आंसू, भावविह्ल चेहरे के कुछ क्षण और उन्हें देख सत्ता-सरकार के आगे किसानों का गाजीपुर चल पड़ना! आंसू बनाम निर्दयी सत्ता, बिखरे-असंगठित किसान बनाम संगठित सत्ता, शबद कीर्तन करते किसान बनाम प्रायोजित मीडिया के सर्वव्यापी झूठे प्रोपेंगेडा और दीये बनाम तूफान की सन् 2021 की इस स्टोरी का अंत क्या होगा यह वक्त बताएगा। बावजूद इसके 28 जनवरी की रात के वे क्षण तो हमेशा याद रहेंगे जब दीया आंसुओं से नई रोशनी ले सत्ता से लड़ने वापिस उठ खड़ा हुआ।

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