अमेरिका में भी है अंध, रूढ़ समाज!

संयोग से ही किताब मिली। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ख्याति और कामयाबी हासिल करने व बराक ओबामा द्वारा इसे जरूर पढ़ी जाने वाली किताब बताने से लेकर टाइम पत्रिका की 2019 की सर्वाधिक प्रभावशाली किताब घोषित किए जाने के बावजूद मुझे इसका पता नहीं था। तारा वेस्टोवर की लिखी इस किताब या उनके बारे में अपने यहां भी कभी, कही पढ़ने को मिला नहीं था। कुछ सुना तक नहीं था। लेकिन अपने पिता के जिज्ञासु मस्तिष्क की व्यापक खोज खबर में जब उनसे फरीद जकारिया के शो जीपीएस में किताब की जानकारी मिली तो मैंने गूगल पर किताब तलाशी। तब जाना कि बात सामान्य है लेकिन समाज दास्ता लिए हुए विस्मयकारी उपलब्धि वाली। किताब लेखक का यह अनुभव लिए हुए है कि उसने पूरी पढ़ाई लिखाई घर पर ही की लेकिन वह उसी के बाद पीएच.डी के लिए केंब्रिज गई। इसके पूरे सिलसिले में उसे जिन अनुभवों, हालातों में गुजरना पड़ा वह बहुत चौंकाने वाला है।

पुस्तक का नाम है‘एजुकेटेड’। यह इक्कीसवीं सदी के लिए रूढ़िवाद विरोधी, अस्वभाविक, हैरान करती एक कहानी है। विश्वास नहीं होता कि आज जब हम तकनीकी विकास के य़ुग में हैं और हमारा जीवन भौतिकवाद में डूबा हुआ है, बावजूद इसके अमेरिका जैसे विकसित देशों केसमाज मेंऐसे वर्ग भी हैं जहां लोग अंधविश्वासी, महा क्रूर और दया के पात्र व ऐसे घोर रूढिवादी परिवार भी हैं जो कूपमंडूक, अंध धारणाओं में जी रहे है। तैतीस साल की तारा वेस्टोवर की किताब एक जीवन-वृत्त है। इतिहास है। उसका लालन-पालन सामान्य जीवन से एकदम अलग माहौल में हुआ। यह अमेरिका के इदाहो राज्य की वह एक छोटी दुनिया है जो एकदम न्यारी। तारा वेस्टोवर इस विश्वास और मान्यता के बीच बड़ी हुई कि शिक्षा दिमाग को खराब कर देती है। उसे आम जीवन और लोगों से दूर ऐसे परिवेश, माहौल में रखा गया जिसमें माना जाता है कि डाक्टर हीलर नहीं किलर याकि ठीक करने के बजाय मार डालते हैं।ऐसा माहौल जिसमें बच्चों का कबाड़खाने में काम करना आम बात है और जीवन का हर दिन ऐसे निकलता है जैसे वह दिन आखिरी दिन साबित होने जा रहा हो।

और इस परिवेश, विषम हालातों कबाड़-आदिम सोच के बावजूद तारा वेस्टोवर एक स्वतंत्र विचारक, लेखक, ज्ञान की विपुलता लिए बड़ी होती है!और सचमुच सोलह साल की उम्र से पढ़ाई शुरू करती हुई वह उनतीस साल की उम्र में केंब्रिज से पीएचडी कर लेती है। बिल गेट्स के शब्दों में वह होर्डर ऑफ नोलेज, प्रेरणादायी है!

तारा वेस्टोवर इदाहो में एक बहुत ही कट्टर मोरमन परिवार (जिसमें बहु-पत्नी प्रथा होती है) में पैदा हुई थी। वह अपने सात भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। उसके पिता कट्टर उग्र रेडिकल विचारों वाले थे। वे हर तरह की सांगठिकता के खिलाफ थे। शिक्षा और शिक्षण संस्थानों के खिलाफ, जन्म प्रमाणपत्र या चिकित्सा बीमा में उनका भरोसा नहीं। उनका पक्के तौर पर मानना था कि सरकार मतलब मानवता के खात्मे के लिए बनी हुई संस्था। उन्होंने अपने सबसे बड़े बच्चे को स्कूल से हटाया और बाकी बच्चों को स्कूल भेजना तो दूर, स्कूल के बारे में सोचने तक से मना कर दिया था, ताकि उन्हें ज्ञानवान होने से बचाया जा सके। अस्पतालों और डॉक्टरों में उनका भरोसा नहीं था, बावजूद इसके कि वे खुद और उनके परिवार के सदस्य सड़क सहित कई तरह के हादसों में बार-बार जख्मी हो चुके थे। वे वेस्टोवर से कहते थे कि ईश्वर और उसके दूत यहां मौजूद हैं और वे हमारे साथ अच्छा कर रहे हैं। वे तुम्हें कोई नुकसान नहीं होने देंगे। एक बार उसे (वेस्टोवर को) जब टॉंसिल की बीमारी हो गई थी, तो उसके पिता ने कहा कि वह कड़ाके की ठंड में अपना मुंह खोल कर बाहर खड़ी हो जाए, ताकि सूरज अपना चमत्कार दिखा सके। उसे एक महीने तक ऐसा करना पड़ा।

उसके पिता के मुकाबले उसकी मां फाये जरा कम कट्टर थीं। वे एक गैर-लाइसेंसशुदा दाई का काम करती थीं और एक सड़क हादसे में बुरी तरह जख्मी होने से उनके दिमाग में गंभीर चोट आई थी। लेकिन इसके बाद भी वे किसी अस्पताल या डॉक्टर के पास नहीं गईं और अपने घरेलू उपायों और ईश्वर में आस्था का ही सहारा लेती रहीं। इसके बाद वे लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था पैदा करने के काम में लग गई। इन सबके बावजूद फाये ने अपने बच्चों को इतनी बुनियादी तालीम देना जरूरी माना ताकि वे लिखना-पढ़ना जान सकें। वे अपने पति को बताए बिना तारा को नृत्य और संगीत की शिक्षा दिलाने एक स्कूल में ले जाती थीं। उनका मानना था कि अगर कोई बीमारी या जख्म गंभीर है तो डॉक्टर के पास जाना जरूरी हो जाता है। अक्सर वे अपने पति और उनके विचारों से असहमति व्यक्त कर देती थीं। लेकिन उनका धर्म उन्हें बांधे हुए था।

कुल मिलाकर अमेरिका में उस जगह जीवन हर तरह बहुत त्रासदायी, बहुत ही कष्टों और दुखों से भरा था। बच्चों की पढ़ाई घर पर होती थी, लेकिन बिना किसी शैक्षणिक बातचीत या माहौल के। पढ़ाई के बारे में बात करना तक मना था। उन्होंने बाइबिल से पढ़ना सीखा, मोरमोन की किताब पढ़ी, जोसेफ स्मिथ और ब्किहम यंग के प्रवचन पढ़े-सुन। वेस्टोवर ने अपनी मां के साथ दाई के काम में हाथ बंटाने से लेकर पिता के साथ कबाड़ी का काम किया। काम करते हुए पिता कबाड़ की चीजे उस पर फैंकते रहते थे।

लेकिन इन सबके बावजूद वेस्टोवर ने अपना रास्ता खुद बनाया। बिना किसी औपचारिक शिक्षा, खुलेपन, स्वच्छंदता, दुनिया को जाने-समझे बिना और अवसरों, संभावनाओं को जाने बिना उसने स्थानीय विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया ।

इस पर उसके पिता नाखुशी पर भी कहते – इससे कम से कम एक बात तो साबित होती है कि हमारे घर का स्कूल किसी सरकारी शिक्षा के स्कूल जैसा ही अच्छा है। उसने किशोर उम्र में ही स्नातक स्तर की शिक्षा ले ली। विश्वविद्यालय में दाखिले का रास्ता बनाया और फिर वहां से इतिहास में पीएच. डी करने का केंब्रिज तक का सफर तय किया।

वेस्टोवरने अपनी किताब की शुरुआत ‘चूज द गॉड’ (ईश्वर को चुनना) से की है जिसमें लेखक के पिता की कही बात का हवाला है- “मैं अपने बच्चों को सड़क के उस स्कूल में भेजने के बजाय शैतान को समर्पित कर दूंगा” और खत्म इस बात से होती है कि “में इसे शिक्षा कहता हूं”। इन दोनों के बीच मृग-मरीचिका और संभ्रांति का एक विशालकाय पर्वत है। एक बड़ी दीवार है जिसमें एक तरफ भूतिया परिवेश और भय सहित ब्रेनवाश हुए, कुंद बाल दिमाग, गालीगलौज वाला बचपन है तो दूसरी तरफ जीवन का सफर नया शुरू होता हुआ। बचपन-किशोर उम्र की कहानी के बाद नए जीवन की शुरुआत जिसे कुछ लोग जीवन का कायापलट (ट्रांसफॉर्मेशन) कह सकते हैं तो कुछ विश्वासघात भी। इस सबका अंतयह कि उसने खुद अपने आपको, अपना निर्माण, अपने को शिक्षित बना कर किया।

वेस्टोवर के अंधकार से उजाले की और कूदने का बिंदु वह है जब शिक्षा के लिए भूख पैदा हुई। शिक्षा के जरिए नए जीवन का निर्माण शुरू हुआ। वह एक तरह से जीवन का कायापलट है। यह वह है जिसके वजह से आप किताब पढ़ने को मजबूर होते हैं। तारा वेस्टोवर इसे अपने जीवन को बदलने की ‘सेल्फ डायरेक्शन’ कला कहती हैं, जिसमें उनके सहित परिवार का हर सदस्य वह सब सीख सका जो उसने खुद पड़ा। किताब में तारा खुलासा करती हैं कि किस तरह से उन्होंने बाइबिल को पढ़ा और किस तरह उत्सुकता में, पढ़ने की भूख लिए उसके नोट्स तैयार हुए और शब्दों के अर्थ खोजने के लिए उन्हें वे लिख लिया करती थीं। किस तरह से वे गणित की पढ़ाई के लिए अपने शहर से बाहर निकलती थीं, जबकि उन्हें न कोई मदद देने वाला था, न मार्गदर्शन देने वाला।

स्वंयशिक्षा से हुई मुक्ति, ज्ञान प्राप्त करने की धुन-लगन, प्रतिबद्धता, संकल्प ने उनसे परिवार का मोह तोड़ा खासतौर से पिता से एक तरह का अलगाव उनके मन में पनप चुका था, जिन्हें वे तमाम कठोरताओं और जिद्दी रवैए के बावजूद स्नेह करती थीं। उन्होंने आखिर दिन तक इस बात का इंतजार किया कि पिता उन्हें पढाई की इजाजत देंगे और उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन पिता को शिक्षा की अहमियत पता चलेगी। यह इस किताब की खूबसूरत ख्वाहिशहै। सबकुछ अग्निपरीक्षा की तरह, दिलों के बिछुड़ने की पीड़ा ज्ञान प्राप्ति की लगन के बीच।लेखक के परिवार के साथ रिश्तों की याद, भाई के साथ के वे मधुर क्षण जब वह बहन के लिए गाने की सीडी छोड जाता, और मांग कर ली गई डेस्क पर पढाई की यादकी भाव-भंगिमा के साथ किताबवह कहानी लिए हुए है जो हम में से हरेक को अपने अस्तित्व, अपने बनने का बोध कराती है। हम कैसे अपने को बनाते हैं और परिवार की छाया से बाहर निकल कर कैसे वह बनते है जो हम होते है।

अमेरिका से आई यह किताब दुनिया के लिए, मेरे-आपके लिए आंखें खोलने वाली है। पता पडता है कि विकसित देश में भी क्या -क्या है। विकसित राष्ट्रों का एक अलग चेहरा भी सामने आता है, जिसके बारे में हम अनजान हैं, यह कुछ ऐसी कहानी कहती है जिसके बारे में हम मुश्किल से कल्पना कर पाएं। वेस्टोवर की पृष्ठभूमि अमेरिकी समाज की विद्रूपताओं को उजागर करती है। एक ऐसा देश, ऐसा समाज जहां ढोरों अवसर हैं, वहां आज भी पारंपरिक अमेरिकी समाज किस तरह से अंधविश्वासों और रूढ़ियों में जकड़ा पड़ा है और शिक्षा के आगे वे बाझाएं, रोडब्लाक्स है जो लोगों को जड़ों से बाहर निकलने में रोकते है!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares