बैचेन बनाने वाली चहल-पहल

हल्ला-गुल्ला, आवाजे फिर सुनाई देने लगी है। घर के बाहर चहल-पहल शुरू है। सामान बेचने वालों की आवाजें सुनाई पड़ने लगी हैं। फर्क यह है कि अब चेहरे पर मास्क लगे हैं। आसपड़ोस में भी फिर से कोलाहल शुरू हो गया है। कार साफ करने वाले पहले की तरह सुबह ही सुबह पहुंच जाते हैं। कामवालियां भी जल्द से जल्द अपने काम पर पहुंच रही है और कुत्ते सुबह की अलसाई नींद में पड़े दिख जाते हैं। इसी तरह ड्राइवर भी लौट चुके हैं और कार को इस तरह से देखते मिल जाएंगे जैसे कोई पहली बार कार चलानी है।

यानी पुराने दिनों की सुबह की वापसी हो चुकी है। पार्क भी फिर से खुल गए हैं और सड़कों पर टहलते या दौड़ लगाते अब कम ही लोग मिलेंगे। आरडब्लूए में भी खासी चहल-पहल है, लोग गपशप और इधर-उधर की बातें करते दिख जाएंगे। हालांकि हमारा ब्रेडवाला अभी भी अपनी छोटी सी गाड़ी में जिसमें हल्का हल्का संगीत भी बजता रहता है, बेकरी का सामान लेकर पूरी कालोनी में लगातार आता रहा है और उसकी घंटी एक उम्मीद लिए होती है।

हवा में चिड़ियों की लगातार चहचहाहट सुनने को मिल जाती है, पर अब उनका कहीं कोई ठिकाना नहीं रह गया है। जिस तरह से पार्क में पहले मोर आसानी से घूमते दिख जाते थे, वैसे अब नहीं दिखते। इसी तरह फुटबाल खेलने वाले भी पार्क में आने लगे हैं। और याद करते हैं पुराने दिनों को कि तब किस तरह से आजाद होकर खेलते थे। और हमारे घर की बात करें तो यहां कोई शोर नहीं रह गया है। लॉकडाउन एक खत्म होते होते और दूसरा शुरू होते ही आधा परिवार सुरक्षित स्वर्ग घर में, घर के कमरों में था। दिल्ली टाइम बम में तब्दील हो चुका है और किसी भी दिन यह बम फट जाएगा और वायरस हवा में फैल चुका होगा, यह अप्रैल के दूसरे सप्ताह से लगने लगा था।

नए वक्त में हमारे यहां सीएनएन की जगह बीबीसी ने ले ली है। मुझे बीबीसी ज्यादा ठोस सूचना देने वाला और बेहतर लगता है और कोविड के इस दौर में सीएनएन के मुकाबले बीबीसी ने ज्यादा सकारात्मक खबरें दिखाईं। आतंक के इस दौर में उम्मीद ही ऐसी मारक दवा है जो कभी भी पूरी नहीं पड़ सकती। लेकिन ज्यादातर वक्त टेवीविजन बंद रखा जाता है। एक कप कॉफी के बजाय मैंने दो कप तेज कॉफी लेनी शुरू की, ताकि बाहर के चुप्पी वाले शोर का आनंद ले सकूं जो कमरे को अपने संगीत और लय से भर देता है।

मम्मी का अंगकोरवाट मंदिर फूलों और भौरों से हराभरा हो रहा है और इसमें दिन में दो बार पानी दिया जा रहा है। सफाई और खाना रोजमर्रा की नीरस जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लॉकडाउन एक और दो के दौरान खाने के जो प्रयोग हुए उनसे चाट, दाल-बाटी, केक, दाल मखनी और नान की तो अचानक से जैसे इच्छा ही खत्म हो गई। पास्ता ही हमारा खाना बन गया, जिसे बनाने में हम दोनों ही माहिर हैं। सुस्त दोपहर अद्बुद बन गईं, जिसमें नेटफ्लिक्स पर बॉलीवुड और हॉलीबुड की फिल्में देखी जाती हैं।  हालांकि शाम का नया रूटीन बना है। अब मैं सामने वाले यार्ड में करीब पौन घंटे तक तेजी से घूमती हूं। मुझे इसमें काफी आनंद मिलता है। इसके अलावा नए रूटीन में बैडमिंटन को भी शामिल कर लिया है। दिल को खुश कर देने वाले इस खेल के लिए मुझे स्थायी तौर पर एक साथी मिल गया है।

लॉकडाउन 1,2,3 या 4 के मुकाबले अनलॉकडाउन-1 में हमारे लिए कुछ भी अलग नहीं है। अभी कामवालियों को घर में नहीं घुसने दिया जा रहा है, दफ्तर अभी तक बंद पड़े हैं और घर से काम का प्रयोग भारी सफलता हासिल कर चुका है। बाहर से खाना मंगाना अभी भी जोखिमभरा है, इसलिए पिज्जा लेने हम खुद ही पिज्जा पार्लर चले जाते हैं। डिब्बे को घर के बाहर नष्ट कर देते हैं और फिर पिज्जा माइक्रेवेव में गरम कर लेते हैं। और सच कहूं तो, पहले टुकड़े का अपना ही मजा है जिसमें पिज्जा की कुरकुरी पपड़ी और पिघला हुए चीज मुंह में जाता है तो लगता है कि यही पार्टी हो गई।

लॉकडाउन में एक शब्द न्यू नॉर्मल यानी नया सामान्य बार-बार सुनने में आया और अब यह पूरी तरह से चलन में आ चुका है। लोग मास्क लगाए दुकानों पर जा रहे हैं, खा-पी रहे हैं, मिलजुल रहे हैं, काम कर रहे हैं और कुल मिलाकर अपने को आजाद महसूस कर रहे हैं। दिल्ली जो अचानक 24 मार्च को खाली-सा हो गया था, फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने लगा है। पिछले दो महीने में लोग जिस तरह से हताशा और अवसाद में आ गए थे, वह अब खत्म होता नजर आ रहा है। जल्द ही होटल, मॉल, रेस्तरां, धार्मिक स्थल और स्कूल कॉलेज खुल जाएंगे।   लेकिन सवाल है कि जब महामारी अब तेजी से फैल रही है तो हमारा इस तरह अचानक से निकल पड़ना क्या सही है?

पिछले दो महीने में जिस तरह का सख्त लॉकडाउन लागू किया गया, जिसमें आवाजाही पूरी तरह से बंद थी, तब मेरा काम ऐसा था जिसकी वजह से मैं बाह निकल रही थी। दिल्ली की सड़कों पर जब सन्नाटा पसरा था और हवा एकदम साफ थी, तब मैं दिल्ली में घूम रही थी। सच कहूं, तो यह कोई बहुत दिलचस्प नहीं था, अकेले और अजीब सी शांति में घूमना। यह ठीक वैसा ही था जैसे मुझे अकेला छोड़ दिया गया है और अगर मैं चीखूंगी तो मेरी चीख वापस मेरी ओर ही लौट आएगी। दिल्ली एकदम खोखली लग रही थी, लेकिन सुरक्षित महसूस कर रही थी।

जब भारत में लॉकडाउन शुरू हुआ था तब कोरोना के संक्रमित मामलों की संख्या 519 और मरने वालों की संख्या मात्र दस थी। आज सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दो लाख सोलह हजार लोग संक्रमित हैं (और लगातार बढ़ते जा रहे हैं) और सात हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं (यह संख्या भी बढ़ती जा रही है)। भारत दुनिया के उन शीर्ष पांच देशों में शुमार हो चुका है जो इस महामारी से गंभीर रूप से जूझ रहे हैं। और इस वक्त में जब आवाजाही पर और सख्ती की जानी चाहिए, भारत भी पश्चिम की देखादेखी उसके रास्ते पर चल पड़ा है और सब कुछ खोल दिया है। जिस देश में अस्सी फीसद में महामारी के लक्षण नहीं दिख रहे हों और व्यापक स्तर पर कोविड जांच नहीं हो रही हो, वहां हर व्यक्ति को बाहर निकलने और अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए भागीदार बनने को कहा जा रहा है।

नए वक्त का नया सामान्य अब ज्यादा असुरक्षित और ज्यादा छक्के छुड़ा देने वाला बन चुका है। लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों और राजनेताओं ने एक तरह की शांति कायम कर दी है। कोविड को यहां बने रहना है और हमें इसी के साथ रहने और जीने की जरूरत है और अगर मरना पड़े तो भी। “फ्लैट नंबर 9— ने सूचित किया है कि उनके परिवार का एक सदस्य कोरोना जांच में संक्रमित पाया गया है और परिवार के बाकी दूसरे सदस्यों की रिपोर्ट आना अभी बाकी है।“ अनलॉक-1 के अगले दिन आरडब्लूए की तरफ से यह संदेश मेरे फोन पर आया। बावजूद इसके कालोनी के गेट भी खोल दिए गए थे और लोगों की आवाजाही से प्रतिबंध भी हटा दिया गया था। दो महीने के लिए हमने कोविड को बाहर रखा था, लेकिन आज यह अंदर आ गया है, हमारे घर से कुछ दूरी पर। आरडब्लूए की तरफ से एक और वाट्सऐप आता है- सी9 में दो और पॉजिटिव केस मिले हैं, लोग कृपया सावधानी बरतें।

जैसे ही भारत खुला, दिल्ली में सख्ती एकदम से खत्म हो गई। अनलॉक के हफ्ते भर के भीतर ही सी9 में तीन संक्रमित मामले निकल आए। पर जानी पहचानी पुरानी आवाजें सुनाई पड़ रही हैं, लोगों की उनमुक्त आवाजाही का शोर सुनने को मिल रहा है, लेकिन मन ही मन एक उदासी की छाया में घिरने लगा है। वायरस का वह नया दौर शुरू है जिसकी चहलपहल  बैचेनी बढा रही है, धीरे-धीरे ही सही लेकिन लगातार बढती बैचेनी।

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