भारत में किसे परवाह निजता की

शशांक राय

अगर सोशल मीडिया प्लेटफार्म व्हाट्सएप को हैक करके लोगों की जासूसी करने और उनकी निजता में दखल देने का मामला अमेरिका की अदालत में नहीं जाता तो भारत में इसको लेकर कोई चर्चा नहीं होनी थी। पिछले दिनों व्हाट्सएप ने अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की संघीय अदालत ने इजराइल की कंपनी एनएसओ समूह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। उसने कहा कि इस इजराइली कंपनी ने अपने पेगेसस एप्लीकेशन के जरिए दुनिया भर में करीब 14 सौ फोन हैक किए और उनके व्हाट्सएप चैट, कॉल और मैसेजेज की निगरानी की। जब इस मुकदमे को लेकर हल्ला मचा तब पता चला कि भारत में भी लोगों के पास काफी समय से एलर्ट आ रहे थे। मई से लेकर सितंबर तक में करीब डेढ़ सौ लोगों को मैसेज आए कि उनके व्हाट्सएप की प्राइवेसी में सेंध लगी है। पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

जब अमेरिका में इस पर विवाद हुआ। इजराइल की कंपनी एनएसओ समूह पर रोक लगाने की मांग हुई और निजता का हल्ला मचा तब भारत में भी इस पर थोड़ी बहुत चर्चा हुई। पता चला कि अप्रैल-मई के दौरान जब भारत में चुनाव चल रहे थे तब अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के फोन हैक किए गए थे और उनके व्हाट्सएप पर नजर रखी गई थी। इसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कह कर सनसनी फैलाई है कि उनका फोन टेप किया जाता है। उन्होंने कहा कि केंद्र और दो-तीन राज्य सरकार की ओर से ऐसा किया जा रहा है। उनकी कही बात को राजनीति का हिस्सा बता कर आया गया होने दिया जाएगा। पर चूंकि इजराइली कंपनी के एप्लीकेशन के जरिए व्हाट्सएप हैक करना अंतरराष्ट्रीय मामला बन गया है इसलिए इस पर चर्चा होगी।

इजराइली कंपनी का कहना है कि वह अपना पेगेसस एप्लीकेशन किसी निजी कंपनी को नहीं बेचती है। उसने कहा है कि उसने इसे सिर्फ सरकारों के लिए तैयार किया है और सरकार की मान्यता प्राप्त सुरक्षा एजेंसियां ही इसे खरीद सकती हैं। इसके लिए उनके पास सरकारी मान्यता निश्चित रूप से होनी चाहिए। कंपनी का कहना है कि उसने आतंकवाद, गंभीर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को ध्यान में रख कर इसे बनाया था। यह भी ध्यान रखने की बात है कि यह बेहद महंगा एप्लीकेशन है। दस लोगों का फोन हैक करने के लिए साढ़े चार करोड़ रुपए खर्च होंगे।

अब सवाल है कि भारत में किस राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने अपने लाइसेंस के आधार पर इसे खरीदा और इसका खर्च किसने किया? दूसरा सवाल है कि एजेंसी ने जिन लोगों के फोन हैक किए उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा को क्या खतरा था? मुश्किल यह है कि इन सवालों का जवाब कौन देगा? सरकार ने दो टूक अंदाज में मना कर दिया है कि उसने इजराइल से पेगेसस एप्लीकेशन नहीं खरीदा। जब सरकार कह रही है कि उसने खरीदा ही नहीं तो फिर उससे जुड़े सवालों के जवाब वह कैसे दे सकती है। फिर सवाल है कि कौन झूठ बोल रहा है- इजराइली कंपनी या भारत सरकार? अब जिस तरह की स्थिति है उसे देख कर लगता नहीं है कि इसका जवाब मिल पाएगा। याद करें राफेल मामले में क्या हुआ था? सौदा करने वाले फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि अंबानी की कंपनी को ऑफसेट पार्टनर बनाने के लिए भारत की ओर से कहा गया था पर भारत सरकार ने मना कर दिया और मामला रफा-दफा हो गया। जिन लोगों के व्हाट्सएप हैक किए जाने की सूचना है उनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र के हैं, भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े हैं या आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले हैं। इनसे भला किसी निजी आदमी या हैकर को क्या मतलब होगा! इनकी जासूसी तो सरकारी एजेंसियां ही कर सकती हैं!

बहरहाल, इस विवाद के कई पहलू हैं। चर्चा सिर्फ यह हो रही है कि लोगों के व्हाट्सएप हैक किए गए और उनके मैसेजेज देखे, सुने गए। व्हाट्सएप की ही चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इसका मैसेज एंड टू एंड यानी एक यूजर से दूसरे यूजर तक इन्क्रीप्टेड होता है, जिसे कंपनी का दावा है कि वह भी नहीं देख सकती है। अगर कोई ऐसा साफ्टवेयर बन गया, जिसकी मदद से व्हाट्सएप के मैसेज देखे जा सकेंगे फिर बाकी एप्लीकेशन का इन्क्रीप्शन तो ज्यादा मजबूत होता भी नहीं है। ध्यान रहे सरकार बहुत समय से चाहती है कि व्हाट्सएप कंपनी अपने इन्क्रीप्टेड मैसेजेज तक सरकार को एक्सेस दे। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। एक तरफ सरकार इन्क्रीप्टेड मैसेज तक पहुंच चाहती है और दूसरी ओऱ अवैध तरीके से यह काम हो भी गया।

अगर किसी साफ्टवेयर के जरिए किसी यूजर का फोन हैक किया जाता है तो उसका सिर्फ एक एप्लीकेशन हैक नहीं होता है। यानी सिर्फ व्हाट्सएप के मैसेज और उसकी बातें नहीं सुनी जा रही हैं, बल्कि पूरा फोन ही हैकर के हाथ में होगा। सोचें, यह कितनी चिंताजनक और डरावनी बात है। इन दिनों हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा लगभग समूचा डाटा उसके फोन में होता है। मोबाइल से बैंकिंग होती है। उसका आधार नंबर सेव होता है। उसके ई मेल में आय कर रिटर्न से लेकर उसके आय-व्यय का ब्योरा और कामकाज से जुड़े तमाम दस्तावेज होते हैं। पिछले ही दिनों यह खबर भी आई थी एक करोड़ों लोगों का डाटा बिक्री के लिए उपलब्ध था, जो निश्चित रूप से ऐसे ही कहीं से हैक करके जुटाया गया होगा।

जाहिर है कि इस डिजिटल दौर में कोई भी डाटा गोपनीय नहीं रह गया है। सरकारें डिजिटल गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए जोर दे रही हैं तो कंपनियां इसके लिए तरह तरह के प्रचार कर रही हैं। बैंक भी लोगों को मोबाइल और ऑनलाइन बैंकिंग अपनाने की सलाह दे रहे हैं।

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