यह सोनिया युग की समाप्ति है!

अहमद पटेल का जाना क्या सोनिया गांधी के राजनीतिक युग की समाप्ति का संकेत है? कुछ लोग इस निष्कर्ष को जल्दबाजी मान सकते हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि सोनिया गांधी का राजनीतिक युग जो धीरे धीरे खत्म हो रहा था उस पर अचानक भी परदा गिर सकता है। इसमें संदेह नहीं है कि सोनिया खुद ही धीरे धीरे नेपथ्य में जा रही थीं और बेटे राहुल गांधी को पार्टी की कमान स्थायी रूप से सौंपने की तैयारी कर रही थीं। अब यह तैयारी तेज हो जाएगी। इसका कारण अहमद पटेल का नहीं होना है। जब तक अहमद पटेल कांग्रेस की राजनीति संभाल रहे थे, तब तक सोनिया गांधी को ज्यादा परेशानी नहीं थी। वे अपने राजनीतिक युग को थोड़ा और आगे खींच सकती थीं। लेकिन अब अहमद पटेल के नहीं होने से वह संभव नहीं लग रहा है। असल में सोनिया गांधी पिछले ठीक 20 साल से अहमद पटेल के ऊपर पूरी तरह से निर्भर थीं। वे सिर्फ उनके राजनीतिक सचिव नहीं थे, जिनका काम सलाह देना था, बल्कि उस सलाह पर अमल करने वाले भी वे ही थे।

सारे फैसले भले सोनिया गांधी के नाम से होते थे, पर सबको पता है कि उन पर मुहर अहमद पटेल की होती थी और उन पर अमल उनके द्वारा किया किया जाता था। चूंकि यह अरेजमेंट काफी हद तक सफल रहा था इसलिए सोनिया को इसे चलाए रखने में कोई दिक्कत नहीं हुई। सक्रिय राजनीति में आने के बाद पहले छह साल की लगातार विफलताओं ने असल में सोनिया की निर्भरता अहमद पटेल पर ज्यादा बढ़ा दी थी। तभी जब 2004 में अचानक केंद्र की सत्ता मिली और धीरे धीरे कांग्रेस की ताकत बढ़ी तो सोनिया गांधी अहमद पटेल के ऊपर ज्यादा निर्भर होती गईं।

उन दस सालों में कांग्रेस अपनी सफलता के चरम पर पहुंची। केंद्र में लगातार दो चुनाव जीतने के साथ एक समय ऐसा था, जब देश के छोटे-बड़े 14 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी। ऐसा लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी खत्म होने वाली है। लालकृष्ण आडवाणी की कमान में चुनाव लड़ कर भाजपा हार चुकी थी और भाजपा के सामने नेतृत्व का बड़ा संकट था। यह सोनिया गांधी की बड़ी सफलता थी, जिसका श्रेय उन्होंने और पूरी पार्टी ने अहमद पटेल को दिया था। परदे के पीछे से पार्टी संगठन और मनमोहन सिंह की सरकार की कमान अहमद पटेल के हाथ में थी। वह सोनिया गांधी की राजनीति का स्वर्ण काल था। उसके बाद भी पिछले छह साल में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद अहमद पटेल ही कांग्रेस और सोनिया गांधी दोनों की राजनीति संभालते रहे।

तभी अब ऐसा नहीं लग रहा है कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी इस समय कोई ऐसी नई व्यवस्था बनाएंगी, जो अहमद पटेल की बनाई व्यवस्था की जगह ले और फिर सोनिया उस पर राजनीति करें। वैसे भी अहमद पटेल जैसी सहज और सुचारू व्यवस्था बनाना एक दिन का काम नहीं है। उन्होंने पिछले चार दशक में अपनी एक हैसियत बनाई थी। कांग्रेस और विपक्ष की पार्टियों में नेताओं के साथ संबंध बनाए थे। लोगों के काम कराए थे, उनकी मदद की थी, उन्हें आगे बढ़ाया था, जिसका नतीजा यह था कि उनकी व्यवस्था बहुत सहज और सुचारू तरीके से चलती थी। सोनिया गांधी ने कुछ करने को कहा तो वह करने में उन्हें बहुत हाथ-पैर नहीं मारने पड़ते थे। अब सोनिया को पता है कि वैसी स्थिति नहीं बनने वाली है। उनके पास खुद भी अब बहुत ज्यादा समय नहीं है।

इसलिए अब जितनी जल्दी हो, उन्हें अपनी राजनीति का पटाक्षेप करके राहुल गांधी की राजनीति को स्थापित करने और उनके लिए नई व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उनको यह भी समझ लेना चाहिए कि वे अपनी व्यवस्था बना कर उसे राहुल गांधी के हवाले नहीं कर सकती है क्योंकि वह व्यवस्था काम नहीं करेगी। हालांकि कांग्रेस में दो-चार नेता ऐसे हैं, जिनका संबंध सोनिया और राहुल गांधी दोनों से एक जैसा सहज और सामान्य है, लेकिन उनके साथ भी कोई साझा व्यवस्था नहीं बन सकती है। स्वतंत्र रूप से राहुल गांधी के लिए ही व्यवस्था बनानी होगी। इस लिहाज से कह सकते हैं कि यह संक्रमण का बड़ा दौर शुरू हो गया है, जिसमें कांग्रेस जितनी जल्दी निकले उसके लिए उतना बेहतर होगा।

कांग्रेस संक्रमण के इस दौर से तभी निकल सकती है, जब सोनिया गांधी अपने को और नेपथ्य में ले जाएं और राहुल गांधी को आगे करें। राहुल गांधी को अब अपनी हिचक छोड़नी होगी। उन्हें हमेशा इस बात से शिकायत रही है कि उनकी मां की बनाई व्यवस्था उनके रास्ते में बाधा है। वे असल में अहमद पटेल को अपने रास्ते की सबसे बड़ी बाधा मानते रहे थे। हालांकि ऐसा था क्योंकि उसी व्यवस्था के सहारे सोनिया ने राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाया था। अहमद पटेल की गैरहाजिरी में राहुल गांधी के लिए भी पार्टी को संक्रमण के मौजूदा दौर से बाहर निकालना बहुत आसान नहीं होगा। अहमद पटेल के सहारे सोनिया यह काम आसानी से कर सकती थीं। वह नहीं हो सका है। अब इसमें जितनी देरी होगी, मामला उतना ज्यादा पेचीदा होता जाएगा क्योंकि कांग्रेस में कई ताकतें ऐसी हैं, जो राहुल को रोकने के लिए सक्रिय होंगी और उन्हें कंट्रोल करने का एकमात्र रामबाण उपाय, जो सोनिया गांधी के पास था वह अहमद पटेल थे।

सो, यह तय मानना चाहिए कि सोनिया इस हकीकत को समझ रही हैं। उनको अंदाजा है कि उनके राजनीतिक युग का अस्त हो गया है और अब उनको जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी बेटे के राजनीतिक सूर्य को चमकाने के लिए काम करना होगा। अहमद पटेल के बगैर यह काम बहुत मुश्किल होगा और यह देखना भी दिलचस्प होगा कि सोनिया किस पर भरोसा करके राहुल गांधी का करियर आगे बढ़ाती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares