धार्मिक मान्यताओं में दखल देने के खतरे

शशांक राय

सर्वोच्च अदालत ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की मंजूरी के अपने फैसले पर पुनर्विचार करते हुए इसका दायरा बढ़ा दिया है। अदालत ने तमाम पुनर्विचार याचिकाओं को सात जजों की बड़ी बेंच के पास भेजा है। पांच जजों की संविधान पीठ ने न सिर्फ इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा है, बल्कि इसके साथ और कई मामले भी जोड़ दिया है। सात जजों की बेंच अब सबरीमाला या किसी भी दूसरे हिंदू मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर विचार करेगी।

इसके अलावा मस्जिद में महिलाओं या दूसरे धर्म की महिलाओं के उनके धार्मिक स्थल पर पूजा के लिए जाने के अधिकार पर भी विचार करेगी। ध्यान रहे कई मस्जिदों में महिलाओं के जाने पर पाबंदी है तो गैर पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं को भी उनके धर्मस्थल के अंदर जाने की मनाही है। इसके अलावा एक खास मुस्लिम समुदाय में प्रचलित महिलाओं के खतने के मामले पर भी यहीं बेंच विचार करेगी।

सोचें, अदालत के इस फैसले से कितने बड़े विवाद का पिटारा खुलने वाला है। पहली नजर में तो यह मामला धार्मिक नियमों या लोक मान्यताओं के प्रचलन बनाम महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकारों की बहस का दिख रहा है। इसे सिर्फ इतने सरल तरीके से देखें तो कह सकते हैं कि महिलाओं को भी संविधान के सारे अधिकार मिलने चाहिए। मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों में उनको प्रवेश से रोकना उनके अधिकारों का हनन है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने चार-एक के बहुमत से यहीं फैसला दिया था। चार जज महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में थे और जिस एक जज ने इसका विरोध किया वे थीं जस्टिस इंदू मल्होत्रा। यानी बेंच में मौजूद एकमात्र महिला जज ने हर उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के फैसले का विरोध किया था। उनके विरोध का आधार यह था कि अदालत को धार्मिक मान्यताओं में एक सीमा से ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए।

इसके बावजूद पांच जजों की संविधान पीठ ने इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तीन-दो के बहुमत से इसे बड़ी बेंच के पास भेजने और इसका दायरा बढ़ाने का फैसला किया। इसके दो पहलू हैं। एक तो यह है कि अदालत ने एक नई परंपरा शुरू की है। यह तकनीकी मामला है। आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिकाओं में सुनवाई का स्कोप बहुत सीमित होता है।

अगर कोई नया सबूत सामने आया होता है तो अदालत उसकी रोशनी में अपने फैसले की समीक्षा करती है। इसमें आमतौर पर फैसला पलटे जाने या किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश नहीं रहती है। पर इस बार उलटा हुआ है। अदालत ने चार-एक से दिए गए फैसले को विचार के लिए सात जजों के पास भेज दिया। क्या सात जजों की बेंच पांच जजों के फैसले पर पुनर्विचार करेगी या इस पूरे मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी? ऐसा लग रहा है कि अब बड़े सवालों पर नए सिरे से सुनवाई होगी। यह कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा एक तकनीकी मामला है, जिस पर कानून के जानकार विचार करेंगे।

दूसरा मामला, धार्मिक मान्यताओं में अदालतों के दखल का है। अच्छा होता अगर सर्वोच्च अदालत एक बारे में सारी धार्मिक मान्यताओं पर विचार करने की बजाय मामला दर मामला इसे सुलझाने के रास्ते पर चलती। जैसे महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला था या सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का मामला था। ऐसे हर मामले को अलग अलग सुलझाया जाता तो शायद समाज को उसे स्वीकार करने में आसानी होती। हालांकि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंदिर के भक्त और व्यापक हिंदू समाज स्वीकार नहीं कर रहा है। यहां तक कि केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने भी खुले तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया है।

सोचें, अगर एक मंदिर में दशकों या सदियों से चली आ रही परंपरा को बदलने का फैसला सुप्रीम कोर्ट करता है और उसका इतना भारी विरोध होता है तो एक साथ सारी मान्यताओं को बदलने का फैसला कितने व्यापक असर वाला होगा? वह भी मामला सिर्फ हिंदू धर्म का नहीं है, बल्कि सभी धर्मों में प्रचलित मान्यताओं पर विचार का है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कई धार्मिक मान्यताएं महिलाओं के प्रति भेदभाव वाली हैं और उनके सामान्य मानवीय अधिकारों का भी हनन हैं। जैसे मुस्लिम समाज में प्रचलित एक साथ तीन तलाक की प्रथा थी। इसे सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित कर दिया और बाद में केंद्र सरकार ने कानून बना कर इसे संज्ञेय अपराध भी बना दिया है। चूंकि यह प्रथा गलत थी और इसे व्यापक धार्मिक मान्यता नहीं हासिल थी। इसलिए समाज ने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया।

पर मंदिरों में प्रवेश का मामला या किसी धार्मिक कामकाज में महिलाओं की भागीदारी को रोकना कोई वैसी अमानवीय प्रथा नहीं। महिलाओं का खतना करने या एक साथ उनको तीन तलाक बोल कर छोड़ देने या सती जैसी प्रथाएं अमानवीय हैं। पर किसी खास मंदिर या मस्जिद में प्रवेश से रोकना बराबरी के संविधान प्रदत्त अधिकार के विरूद्ध है। इसलिए दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए ऐसे मामलों में कानूनी पहल करने और अदालती फैसले के जरिए इन्हें निर्देशित करने से बेहतर होता है समाज में जागरूकता फैलाना। तभी सर्वोच्च अदालत को भी इस मसले पर विचार करते हुए लोगों की भावनाओं, धार्मिक परंपराओं, प्रचलित मान्यताओं को समझना होगा। जोर जबरदस्ती का कोई भी फैसला समाज नहीं स्वीकार करेगी। संभवतः अदालत को भी इसका अंदाजा है इसलिए उसने अपने पिछले फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजा है।

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