जितनी पुरानी आस्था, उतना मजबूत दावा

शशांक राय

अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के भूमि विवाद में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सबसे सरल व्याख्या यहीं है कि जिसकी आस्था, जितनी पुरानी है, जमीन पर उसका दावा उतना मजबूत है। इस व्याख्या का खतरा यह है कि अगर न्यायिक बिरादरी इस फैसले को नजीर बनाती है तो देश भर में जमीन से जुड़े जितने टाइटल सूट चल रहे हैं उनकी सुनवाई का तरीका बदल जाएगा। यह एक नजीर बन जाएगी, जिस जमीन पर जिसका कब्जा जितना अधिक पुराना होगा उसका उस पर उतना मजबूत दावा होगा, जमीन चाहे जिसकी हो। यह निष्कर्ष निकालने का आधार यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई जमीन का विवाद मान कर की थी। उसने साफ कहा था कि यह आस्था का मामला नहीं है और फैसले में भी कहा कि अदालत आस्था के मामले में नहीं गई है।

सवाल है कि जब यह आस्था का मामला नहीं है और अदालत मान रही है कि जमीन दावा करने वाले तीनों में से किसी पक्ष की नहीं है तो फिर एक पक्ष को जमीन देने का क्या आधार है? सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जमीन सरकार की है। सुनवाई के दौरान कई बार यह बात कही गई और अदालत ने मानी की यह नजूल की जमीन है यानी सरकारी जमीन है। फिर सरकारी जमीन किसी भी पक्ष को कैसे दी जा सकती है? क्या सिर्फ इस आधार पर सरकारी जमीन किसी को दी जा सकती है कि उसका उस जमीन पर कब्जा दूसरे दावेदारों से पहले का है?

अदालत ने पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के रिपोर्ट का हवाला दिया। सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज करने के लिए अदालत ने एएसआई की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि उससे पता चलता है कि मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। उसके नीचे एक बड़ी इमारत का ढांचा था और वह ढांचा इस्लामिक नहीं था। यानी किसी गैर इस्लामिक ढांचे के ऊपर मस्जिद बनी थी। अदालत इस विवाद में नहीं गई है कि वह ढांचा तोड़ा गया था या नहीं। इससे यह जाहिर होता है कि मस्जिद बना कर जमीन पर कब्जा बाद में हुआ। यानी पहले किसी और का कब्जा था।

पहले किसका ढांचा था यह पक्के तौर पर पता नहीं है। फिर उसी जगह पर मस्जिद बन गई। बाद में उसमें मूर्ति रख दी गई या मूर्ति प्रकट हो गई और फिर एक दिन वहां का ढांचा गिरा दिया गया है। अब अदालत का कहना है कि मूर्ति का प्रकट होना या वहां मूर्ति रखा जाना गलत था। अदालत यह भी कह रही है कि ढांचा गिराया जाना भी गलत था। फिर भी उसने एक पक्ष को पूरी जमीन दे दी। अब सवाल है कि यह तथ्यों पर आधारित कानूनी फैसला कैसे हुआ? असल में सुप्रीम कोर्ट ने 40 दिन तक सुनवाई करने के बाद आम सहमति से जो फैसला सुनाया है वह कानूनी तथ्यों, सबूतों और गवाहियों पर आधारित फैसला कम है और एक तरह से सबको खुश करने वाली पंचायत ज्यादा है।

वैसे भी सुप्रीम कोर्ट कहती रही है कि इस मामले का फैसला सभी पक्षों के बीच मध्यस्थता से हुआ होता तो बेहतर होता। वहीं काम एक तरह से सर्वोच्च अदालत ने किया है। अदालत ने फैसले में यह भी कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का जो फैसला दिया था, वह गलत दिशा में चला गया था। पर हकीकत में सुप्रीम कोर्ट क फैसला भी उसी से मिलता जुलता है। सर्वोच्च अदालत ने भी इस विवाद से जुड़े सभी पक्षों को खुश करने के लिए कुछ न कुछ किया है। अगर फैसला ठोस कानूनी नुक्तों और सबूतों के आधार पर होता तो बाकी पक्षों को खुश करने की जरूरत नहीं होती। अगर जरूरत होती भी तो उसे पूरा करने का काम अदालत का नहीं होता है। इससे भी जाहिर होता है कि फैसला आस्था को ध्यान में रख कर किया गया है। वरना टाइटल सूट का फैसला दो टूक होता है और जमीन पर जिसका दावा साबित होता है उसको जमीन मिलती है और दूसरे पक्ष को कुछ नहीं मिलता है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 2.77 एकड़ की पूरी विवादित जमीन रामलला विराजमान को दी है और इस तरह वहां अधिग्रहित समूचे 67 एकड़ जमीन पर मंदिर और उससे जुड़ी चीजें बनने का रास्ता साफ कर दिया है। पर इसके साथ ही यह भी कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अय़ोध्या के अंदर ही किसी प्रमुख जगह पर पांच एकड़ जमीन दी जाए। अगर उसका दावा जमीन पर नहीं था तो उसे अलग से जमीन देने की जरूरत नहीं थी। पर अदालत ने भावना और आस्था के आधार पर ही जमीन देने की बात कही है।

इस विवाद का तीसरा पक्ष निर्मोही अखाड़ा था। उसका कहना था कि सदियों से उसने रामलला की सेवा की है। हालांकि इस आधार पर उसका जमीन पर दावा नहीं बनता था और इसलिए अदालत ने अपने फैसले में सबसे पहले उसका ही दावा खारिज किया। फिर भी अदालत ने कहा कि इतने दशकों की उसकी सेवा को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह उसके लिए कोई उपयुक्त भूमिका बनाए। सोचें, क्या कानूनी फैसले ऐसे होते हैं? यह तो सबको कुछ न कुछ देकर खुश करने का मामला है। आमतौर पर सबकी सहमति वाले फैसले इसी तरह के होते हैं। ऐसे फैसले स्पष्ट होते हुए भी दो टूक नहीं होते हैं और बीच का रास्ता निकालने वाली पंचायत की तरह होते हैं। इस मामले में भी फैसला आस्था, लोक मान्यता, प्राथमिक साक्ष्य आदि पर आधारित है और सबको खुश करने के प्रयास वाला है।

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