बाल संरक्षण इकाईयों को भी तलब करे सुप्रीमकोर्ट

सुप्रीमकोर्ट को राजनीति करने की जरूरत नहीं थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले सुप्रीमकोर्ट ने यह कह कर शाहीन बाग़ के धरने पर टिप्पणी नहीं की थी कि वह क्यों राजनीति में शामिल होलेकिन शाहीन बाग़ में जिस तरह बच्चों का इस्तेमाल किया गया , उस पर तो चुनाव से पहले टिप्पणी की जा सकती थी जो सुप्रीमकोर्ट ने 58 दिन बाद दस फरवरी को की|

सुप्रीमकोर्ट ने अभी भी धरने पर कोई एक्शन नहीं लिया है , अलबत्ता दोनों सरकारों को नोटिस जारी किया है। चुनावों के दौरान धरने से कन्नी काटते हुए अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि उन की तो कोई भूमिका ही नहीं है। अब अगर वह मंगलवार के रिजल्ट में जवाब देने लायक बच गए तो उनकी ही सरकार को सुप्रीमकोर्ट में जवाब देना होगा। सुप्रीमकोर्ट ने दोनों सरकारों को नोटिस जारी कर के यह तो तय कर ही दिया है कि दिल्ली सरकार ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया था। अगली सुनवाई 17 फरवरी को होनी है , तब तक या तो वह निपट चुके होंगे या दुबारा शपथ ले चुके होंगे।

सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने धरना देने वालों से कहा कि आप रास्ता नहीं रोक सकते। एक कॉमन क्षेत्र में प्रदर्शन जारी नहीं रखा जा सकता। हर कोई ऐसे प्रदर्शन करने लगे तो क्या होगा ? क्या आप पब्लिक एरिया को इस तरह बंद कर सकते हैं ?  क्या आप पब्लिक रोड को ब्लॉक कर सकते हैं ? हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने जो धरने की जगह सुनिश्चित करने की बात कही है , तो वह पहले से सुनिश्चित है। एक जमाने में इंडिया गेट पर धरने प्रदर्शन हुआ करते थे। नरसिंह राव के शासनकाल में 1992 में जब राजेश पायलट आंतरिक सुरक्षा मंत्री थे ,तो उन्होंने इंडिया गेट पर धरने प्रदर्शनों पर रोक लगा दी थी। उस की जगह पर जंतर मंतर सुनिश्चित किया हुआ है।

अदालतों की तारीख पर तारीख की अक्सर आलोचना होती है , लेकिन इस का अदालतों पर कोई असर नहीं होता। सोमवार को सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने अंतरिम आदेश जारी करने की मांग की तो अदालत ने कहा आप ने 58 दिन इन्तजार किया तो एक हफ्ता और इन्तजार कर सकते हैं। वैसे तो कोर्ट की मर्जी है , लेकिन वह कह सकती थी कि जिस मुद्दे पर धरना चल रहा है वह अदालत के विचाराधीन है , इस लिए धरने का कोई मतलब नहीं है। धरना देने वालों को नागरिकता संशोधन क़ानून पर कोर्ट के फैसले का इन्तजार करना चाहिए था। जब दिल्ली की जनता को एक हफ्ता और इन्तजार करने को कहा जा सकता है , तो धरना देने वालों को भी कोर्ट के फैसले तक इन्तजार करने की सीख दी जा सकती थी।

लेकिन एतराज के मूल मुद्दे पर आते हैं। धरने में बच्चों का शामिल होना और उन के दिमागों को साम्प्रदायिकता से प्रदूषित करना। अनेक बच्चों के वीडियो सामने आए जिन में इस्लाम के नाम पर मरने मारने की बातें कही गई थी , यहाँ तक कि बच्चे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को मार देने की बाते कहते भी सुने गए। अब तो सलमान खुर्शीद जैसे पूर्व केन्द्रीय मंत्री का वीडियो भी सामने आ गया है , जो एक बच्चे के पीछे आज़ादी के नारे लगा रहे हैं। मोदी सरकार कन्हैया का क्या बिगाड़ लेगी जब केंद में केबिनेट मंत्री रहे सुप्रीमकोर्ट के सीनियर वकील आज़ादी के नारे लगा रहे हों। एक मां रात भर अपने आठ साल के बच्चे के साथ सर्दी में धरने पर बैठी रही , सुबह वह बच्चे को लेकर घर पहुंची थी , जहां उस की मौत हो गई। बच्चे की मां और धरने आयोजकों ने बच्चों को धरने पर बिठा कर बच्चे के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया है जो जेजेएक्ट के अनुसार अपराध की श्रेणी में आता है।

सुप्रीमकोर्ट ने आठ साल के इस बच्चे की मौत पर पूछा है कि वह धरने पर क्या कर रहा था। हैरानी यह है कि शाहीन बाग़ की बाल कल्याण समिति , जेजे बोर्ड , एससीपीसीआर और मोदी सरकार की एनसीपीसीआर दो महीनों से कहाँ सोई हुई है। बच्चो के कल्याण की बड़ी बातें करने वाली संस्थाएं कहां मर गई , जो दो महीनों से चाईल्ड राईट्स प्रोटोकाल का उलंघन होते देख रही हैं। क्या सुप्रीमकोर्ट को राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस नहीं देना चाहिए , जिन्होंने लगातार मीडिया में आ रही खबरों के बावजूद बच्चों के संरक्षण की जिम्मेदारी नहीं निभाई।

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