स्पीकर के बहाने बड़े सवाल पर विचार!

सुशांत कुमार– पिछले तीन महीने में विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले आए हैं। दोनों अपने टेक्स्ट और कांटेक्स्ट यानी पाठ और संदर्भ दोनों में बहुत अहम हैं। पहला फैसला पिछले साल नवंबर का है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कर्नाटक के 17 विधायकों की अयोग्यता पर फैसला सुनाया था। अदालत ने विधायकों को अयोग्य ठहराने के तत्कालीन स्पीकर रमेश कुमार के फैसले के अधिकार को स्वीकार किया। कहा कि स्पीकर को इस बारे में फैसला करने का अधिकार है पर अदालत ने विधायकों को पांच साल के पूरे कार्यकाल के लिए अयोग्य करने के फैसले को नहीं माना और कहा कि अयोग्य ठहराए गए विधायक इसी विधानसभा में चुनाव भी लड़ सकते हैं और मंत्री भी बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जज जस्टिस आरएफ नरीमन की बेंच ने मंगलवार को मणिपुर के एक विधायक की अयोग्यता के मामले में एक बड़ा फैसला सुनाया। उन्होंने स्पीकर की कथित निष्पक्षता पर सवाल उठाए और कहा कि स्पीकर पार्टी का ही सदस्य होता है इसलिए वह सांसद या विधायक को कैसे अयोग्य ठहरा सकता है। अदालत का मानना है कि सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराते हुए कहीं न कहीं स्पीकर दलगत राजनीति से प्रभावित हो सकता है। इसलिए उन्होंने रिटायर जजों की एक ऐसी पंचाट बनाने का सुझाव दिया, जो सालों भर काम करे और सांसदों व विधायकों की अयोग्यता के मामले में तटस्थ होकर फैसला करे।

अदालत की इस राय से भारत की संसदीय व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। अगर स्पीकर की तटस्थता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठता है तो फिर इस तरह के संशय का दायरा बहुत बढ़ जाएगा। फिर तो उप राष्ट्रपति, जो उच्च सदन यानी राज्यसभा के सभापति होते हैं वे भी पार्टी के सदस्य होते हैं। कई उप राष्ट्रपति दलीय पृष्ठभूमि वाले नहीं रहे हैं पर ज्यादातर उप राष्ट्रपति किसी न किसी पार्टी के सदस्य होते हैं। जिन राज्यों में उच्च सदन है वहां भी सभापति पार्टियों के ही सदस्य होते हैं। आमतौर पर स्पीकर हों या सभापति सत्तारूढ़ दल के सदस्य होते हैं।

राज्यों के राज्यपाल भी, जिनको हर राज्य में प्रोटोकॉल में सबसे ऊपर रखा जाता है वे भी पार्टियों के ही सदस्य होते हैं। अनेक राज्यपाल पद से हटने के बाद सक्रिय राजनीति में उतरे हैं और मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री भी बने हैं। फिर उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे दलगत भावना से ऊपर उठ कर काम करेंगे? विपक्ष के शासन वाले अनेक राज्यों में इस समय सरकार और राज्यपालों में ठनी है। पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक कई विवाद हुए हैं। जिस तरह स्पीकर के साथ सदस्यों की अयोग्यता का विवाद जुड़ा है उसी तरह राज्यपाल के साथ राज्यों की सरकारों को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने का विवाद जुड़ा है। हाल ही मिसाल उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर का है। उत्तराखंड की सरकार को तो हाई कोर्ट ने बहाल कर दिया था पर जम्मू कश्मीर में जिस अंदाज में राज्यपाल की सलाह पर विधानसभा भंग करने का फैसला हुआ वह हैरान करने वाला था। विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्य में सरकारों के कामकाज में राज्यपाल के दखल का विवाद लगातार चलता रहता है।

इसी तरह प्रधानमंत्री भी पार्टी का ही सदस्य होता है। भारत में कभी भी किसी भी प्रधानमंत्री को मतदाताओं के 50 फीसदी का बहुमत नहीं मिला है। इसके बावजूद उम्मीद की जाती है कि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद वह नेता पूरे देश का प्रतिनिधित्व करेगा। पर व्यावहार में ऐसा होता नहीं है। प्रधानमंत्री भी चुनाव के समय एक पार्टी विशेष का प्रचार करते हैं। वे राज्यों में जाते हैं, विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्यों पर काम नहीं करने या घोटाला करने का आरोप लगाते हैं। केंद्रीय फंड में हेराफेरी का आरोप लगाते हैं। क्या इसे न्यायसंगत माना जाए? पिछले दिनों कुछ लोगों ने बहस के लिए यह मुद्दा उठाया था कि प्रधानमंत्री रहते किसी नेता को प्रचार की मंजूरी मिलनी चाहिए या नहीं? यह बड़ा सवाल है और यह तय मानना चाहिए कि कोई भी नेता इतना तटस्थ नहीं होता कि वह पद पर बैठने के बाद अपनी पार्टी की तरफदारी न करे।

हां, चाहे स्पीकर या सभापति हों, राज्यों के राज्यपाल या प्रधानमंत्री हो नियुक्ति के बाद उनसे न्यूनतम निष्पक्षता और तटस्थता की उम्मीद की जाती है। अगर वे न्यूनतम निष्पक्षता और तटस्थता नहीं दिखाते हैं तो पूरा संसदीय सिस्टम ही ध्वस्त हो जाएगा। फिर किसी तरह से इसे बचाया नहीं जा सकता है। इन संवैधानिक पदों के बाद वैसे पदों की बारी आती है, जिन पर सरकार नियुक्ति करती है। सरकार की ओर से जिन पदों पर सीधे नियुक्ति होती है उन अधिकारियों की निष्पक्षता भी हमेशा सवालों के घेरे में रहती है। तभी अनेक संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई। जैसे लोकपाल, सीबीआई निदेशक, सूचना आयुक्तों आदि की नियुक्ति में सत्तारूढ़ दल के साथ साथ न्यायपालिका और विपक्षी पार्टियों की भूमिका भी बनाई गई है।

खुद न्यायपालिका ने सरकारों के दखल से मुक्त होने के लिए ही 1993 में कॉलेजियम सिस्टम विकसित किया, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे वरिष्ठ जज ही उच्च अदालतों और उच्चतम अदालत के जजों की नियुक्ति और तबादले के बारे में फैसला करते हैं। तभी न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम कर पाती है। पर इस तरह की व्यवस्था संसदीय प्रणाली में बनाने में मुश्किलें आएंगी। आखिर कोई भी पंचाट बनेगा तो नियुक्ति सरकार ही करेगी या उसमें सरकार का बहुमत होगा। संसदीय प्रणाली में निष्पक्षता और न्यायसंगत व्यवस्था तभी बनेगी, जब राजनीतिक में नैतिकता के मूल्य बढ़ेंगे।

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