आतंकी और न्याय व्यवस्था - Naya India
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आतंकी और न्याय व्यवस्था

आतंकी मामलों में दोषियों के खिलाफ ठोस और तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं हो पाती, यह ऐसा और बड़ा सवाल है जो आमजन के मन-मस्तिष्क में घूमना स्वाभाविक है। देश में जितनी आतंकी वारदातें हुई हैं, बड़े आतंकी हमले हुए हैं, उनके दोषियों को कितनी जल्द और क्या सजा हुई, दो-चार मामलों से ज्यादा किसी को याद भी नहीं होगा। कसाब को फांसी पर लटका दिया गया, या फिर इने-गिने कुछ और मामले ऐसे हो सकते हैं जिनमें सजा सुनाई गई। पर मुद्दे की बात है कि आतंकी मामलों में जिस तरह की कठोर और तुरंत कार्रवाई की लोग उम्मीद रखते हैं, वह नहीं होती है। इसी सवाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने सोमवार को राज्यों के आतंकवाद निरोधी दस्तों के प्रमुखों की बैठक में उठाया। मसला वाकई गंभीर है। इस मसले पर डोभाल भारत की न्यायिक व्यवस्था पर बरसे। उन्होंने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि आतंकी मामलों में भी भारत की अदालतें सामान्य आपराधिक मामलों की तरह ही रुख अख्तियार करती हैं। और ऐसे में होता यह है कि मामले से संबंधित चश्मदीद गवाहों को सामने लाना मुश्किल हो जाता है। और मामले वर्षों तक खिंच जाते हैं, आरोपी बरी तक हो जाते हैं।

आतंकी मामलों से निपटने में जांच ऐजेंसियों और अदालतों की भूमिका ही प्रमुख होती है। सवाल है कि जांच ऐजेंसियां कैसे काम करती हैं। जांच ऐजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर ही अक्सर सवाल उठते रहे हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था अपने न्याय के सिद्धांतों से ही चलती है, वह उसके परे नहीं जा सकती। ऐसे में आतंकी मामलों को कैसे निपटा जाए, यह बड़ा और गंभीर सवाल बन जाता है। क्या अदालतें कानून के दायरे के बाहर जाकर काम करें, या फिर आतंकी मामलों से निपटने के लिए अलग से न्यायिक तंत्र स्थापित किया जाए। हालांकि गंभीर मामलों को निपटाने के लिए त्वरित अदालतें बनाई जाती हैं लेकिन उनका दायरा न्याय प्रणाली के बाहर नहीं होता। ऐसे में डोभाल ने जिस गंभीर समस्या की ओर इशारा किया है, वह बनी रहती है। आतंकी मामलों में कोई भी चश्मदीद डर के मारे कैसे अदालत में गवाही देगा?

भारत लंबे समय से आतंकवाद की मार झेल रहा है। देश के भीतर आतंकी नेटवर्क चल रहे हैं। पाककिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक के आतंकी संगठन भारत में घुसपैठ कर रहे हैं। सुरक्षा ऐजेंसियों और जांच ऐजेंसियों दोनों के लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं है। डोभाल की चिंता से जो बड़ी बात निकल रही है, वह आतंकी मामलों से निपटने के लिए अलग से व्यवस्था की जरूरत को रेखांकित करती है।

यह व्यवस्था ऐसी हो जिसमें कोई आतंकी पकड़ा जाए, उसके खिलाफ मामला चले, गवाही की जरूरत भी न हो, पुख्ता सबूत मिले या न मिले, लेकिन अदालत उसे आतंकी मानते सजा दे दे। लेकिन सवाल यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में ऐसा अलग खाका बनाना संभव और व्यावहारिक हो पाएगा। ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जिनमें आरोपियों को आतंकी मामलों में पकड़ा गया और सालों तक मुकदमा चला और फिर आरोपी निर्दोष निकले। आतंकियों से निपटने के लिए न्याय व्यवस्था में सुधार हो, लेकिन निर्दोष न फंसे इसका पुख्ता इंतजाम होना जरूरी है।

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