वामपंथियों को पहली बार जैसा का तैसा!

वामपंथियों में एक खासियत रही है। अब आप इसे खासियत समझें या क़ानून को चुनौती देना। वे अपने आंदोलनों में सारी ताकत झोंक देते हैं। सडकें लाल झंडों से पाट देते हैं और रेलमार्ग ठप्प कर देते हैं। उनका किसान आन्दोलन हो , मजदूर आन्दोलन हो. छात्र आन्दोलन हो , सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला हो या शनि शिगनापुर का आन्दोलन। आंदोलनों के चेहरे अलग-अलग होते हैं। पर आन्दोलन में हिस्सा लेने वाले सारे वही के वही।

मुद्दा कोई भी हो ,या कहें कि बहाना कोई भी हो , देश भर के उनके संगठन सीटू , इंटक , एटक , जनवादी महिला समिति , आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा)’, स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई) और डेमोक्रेटिक स्टूड़ेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ), लेखकों, नाटककारों, कलाकारों, फिल्मकारों के संगठन इप्टा के सदस्य सब एक साथ कूद पड़ते हैं। वामपंथी विचारधारा के अध्यापक टीवी चेनलों पर बहस करने और वामपंथी स्कूल के पत्रकार एकतरफा खबरें लिखने में सक्रिय हो जाते हैं| ऐसे लगता है जैसे सारा देश वामपंथी हो गया है।

लम्बे समय तक जातिवादी और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीति चलती रही है। पहली बार  2014 में नरेंद्र मोदी अल्पसंख्यकवाद और जातिवाद को चुनौती देते हुए चुनाव मैदान में उतरे और जनता ने उन्हें स्पष्ट बहुमत दिया। कांग्रेस तो पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है लेकिन कम्युनिस्ट समाज के सभी क्षेत्रों में व्याप्त अपने संगठनों के माध्यम से हिंदुत्व की एकता तोड़ने की रणनीति बनाते रहते हैं| वह कभी हिन्दुओं में विभाजन रेखा खींचने के लिए महिषासुर का शहादत दिवस के रूप में सामने आता है, कभी हैदराबाद में रोहित वेमूला की आत्महत्या मुद्दा बनता है। कभी भीमा कोरेगांव के कार्यक्रम को हिंसक बनाया जाता है।

नागरिकता संशोधन क़ानून , जनसंख्या रजिस्टर और नागरिकता रजिस्टर अब इनके आन्दोलन के नए मुद्दे हैं| वामपंथी दलों के सारे घटक सडकों पर उतर आए हैं। देश भर के छात्रों को अपने आन्दोलन में जोड़ने के लिए जेएनयूं की होस्टल फीस को राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बना दिया गया। छात्र आन्दोलन तो करते हैं फीस वृद्धि के खिलाफ लेकिन उनके हाथों में प्ले कार्ड होते है कश्मीर की आज़ादी, नागरिकता रजिस्टर आदि राजनीतिक मुद्दों की| जेएनयू में तो पिछले कुछ अरसे से खुल कर भारत विरोधी राजनीति हो रही है। मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी के खिलाफ जिस तरह के कार्यक्रम आयोजित हुए हैं क्या वैसे भारत के किसी अन्य हिस्से में इस तरह के कार्यक्रम किए जा सकते हैं?

आप याद करिए याकूब मेमन की फांसी रुकवाने के लिए जिन 40 हस्तियों ने राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखी थी , वे कौन लोग थे? तो उस सूची में आप सीता म येचुरी और डी.राजा के साथ जावेद अख्तर , अनुराग कश्यप महेश भट्ट जैसों के नाम ही पाएंगे। याद करिए वे कौन लोग थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीजा नहीं दिए जाने के लिए अमेरिकी प्रशासन को चिठ्ठी लिखी थी?

मीडिया के माध्यम से हवा बनाने वाले कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े ज्यादातर लोग पढ़े लिखे हैं , खासकर जेएनयू के छात्र और फिल्म इंडस्ट्री के वामपंथी और वे जानते हैं कि भारत में पहले भी हिन्दुओं को धर्म के आधार पर भारत की नागरिकता दी गई थी। वे जानते हैं कि बंटवारे के समय पाकिस्तान में रह गए अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भारत का वायदा था, वे जानते हैं कि भारत ने उन की चिंता करते हुए पाकिस्तान से समझौता भी किया था। वे जानते हैं कि जिन तीनों देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता के नियम शिथल किए गए हैं , वे तीनों शरीयत के आधार पर चलने वाले इस्लामिक देश हैं , इ के बावजूद वामपंथी  आन्दोलन असल में मोदी सरकार को ध्वस्त करने की लड़ाई है। जिसे संघ परिवार एक चुनौती मानता है , क्योंकि 70 साल के इन्तजार के बाद जब पहली बार हिन्दुओं को गर्व से जीने का मौक़ा मिला है , तो वे इसे जाने नहीं देंगे , इसलिए संघ परिवार के घटक वामपंथियों को अब खुलकर कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares