फिर संसद की जरूरत क्या है? - Naya India
लेख स्तम्भ | आज का लेख| नया इंडिया|

फिर संसद की जरूरत क्या है?

संसद का मॉनसून सत्र महज 18 दिन का होना था और वह भी दस दिन में ही खत्म कर दिया गया। सत्र चला भी तो उसमें कई संसदीय गतिविधियों को सीमित कर दिया गया। सत्र के दौरान मोटे तौर पर सिर्फ सरकारी कामकाज हुआ। सिर्फ खानापूर्ति के लिए कुछ मसलों पर चर्चा हुई। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी को लेकर संसद में चर्चा नहीं की गई। देश की अर्थव्यवस्था भयावह स्थिति में है। पर उसके बारे में भी संसद में कोई चर्चा नहीं हुई। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ कई महीनों से गतिरोध चल रहा है। चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए। कई बार दोनों देशों के सैनिकों ने गोलियां चलाईं। पिछले 45 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि चीन के साथ सीमा पर गोलियां चलीं और उससे पहले जवान शहीद हुए। पर राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े इस अहम मसले पर संसद में चर्चा नहीं हुई। दोनों सदनों में रक्षा मंत्री का बयान हुआ, जिस पर सांसदों को सवाल नहीं पूछने दिया गया। राज्यसभा के उप सभापति वेंकैया नायडू ने इस मामले पर रक्षा मंत्री के साथ विपक्षी नेताओं की बैठक कराने का भी सुझाव दिया था पर उसके बारे में भी कोई सूचना नहीं है।

सरकार ने संसद के दो सत्रों के बीच की अवधि में 11 अध्यादेश लागू किए थे। ऐसा लग रहा है कि इस सत्र का मकसद सिर्फ इतना था कि इन अध्यादेशों की जगह लेने वाले कानून बना दिए जाएं। सो, उसने इन अध्यादेशों की जगह लेने वाले विधेयक पास करा दिए। चूंकि छह महीने में एक बार संसद सत्र बुलाने की औपचारिकता निभानी होती है इसलिए भी जरूरी था कि सत्र आहूत किया जाए। आखिर पिछला सत्र बजट सत्र था, जो आनन-फानन में 25 मार्च से पहले खत्म कर दिया गया था। कोरोना वायरस के संकट की वजह से वह सत्र भी समय से पहले खत्म किया गया और बजट से जुड़े कई प्रस्ताव बिना किसी चर्चा के पास कराए गए। उसके बाद वायरस की वजह से संसद सत्र बुलाने में देरी हुई। संवैधानिक बाध्यता में एक छोटा सत्र बुलाने का फैसला किया गया तो वह भी 18 दिन का था, जिसे दस दिन में ही खत्म कर दिया गया।

सवाल है कि क्या सरकार को सत्र शुरू होने से पहले ही इसका अंदाजा था कि यह सत्र 18 दिन तक नहीं चल पाएगा? इस बात की पूरी संभावना दिख रही है कि सरकार को इसका अंदाजा था और वह खुद भी चाहती थी कि सत्र छोटा हो, जिसमें सिर्फ सरकारी कामकाज हो। संभवतः इसी वजह से वर्चुअल सत्र की अनुमति नहीं दी गई। विपक्ष की ओर से अनेक सांसदों ने इसकी मांग की थी कि संसद का वर्चुअल सत्र आयोजित किया जाए। सोचें, संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के 75 साल के मौके पर हो रहा सालाना सत्र वर्चुअल हो रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित दुनिया के 193 देशों के शासनाध्यक्ष या उनके प्रतिनिधि इस वर्चुअल सत्र को संबोधित करेंगे। पर भारत सरकार ने संसद के वर्चुअल सत्र की इजाजत नहीं दी। हां, जो सत्र आयोजित हुआ उसमें भी तकनीक का पूरा इस्तेमाल हुआ और ज्यादातर सदस्य सदन में बैठने की बजाय इधर-उधर बैठ कर वर्चुअल तरीके से ही सत्र में शामिल हुए।

अगर सरकार ने वर्चुअल सत्र का आयोजन किया होता तो सांसदों को दिल्ली पहुंचने की जरूरत नहीं होती। वे अपने घर से सत्र में हिस्सा लेते और तब संसद का सत्र सुचारू रूप से पूरी अवधि तक चल सकता था। लेकिन सरकार ने इसकी बजाय सबकी शारीरिक रूप से उपस्थिति अनिवार्य की। इसका नतीजा यह हुआ है कि संसद परिसर में हुई जांच में 30 सांसद संक्रमित निकले और सरकार के लिए यह आपदा में अवसर हो गया कि वह इस बहाने संसद सत्र को दस दिन में ही खत्म कर दे।

सरकार इस बात का डंका बजा रही है कि इस बार लोकसभा में 153 फीसदी प्रोडक्टिविटी हुई है। सवाल है कि इसका आम लोगों के लिए क्या मतलब है? संसद के इस सत्र के आखिरी तीन दिन तक राज्यसभा सांसदों ने सदन का बहिष्कार किया। कई विपक्षी पार्टियों ने लोकसभा की कार्यवाही का भी बायकॉट किया। बिना विपक्ष की मौजूदगी के सरकार ने धड़ाधड़ बिल पास कराए। क्या यहीं संसदीय परंपरा है? फिर केंद्र सरकार के कैबिनेट से पास हुए अध्यादेश और संसद से मंजूर किए गए विधेयक में क्या फर्क रह गया? संसद के दोनों सदनों में सिर्फ सरकारी पक्ष के सदस्य बैठे और उन्होंने ध्वनि मत से सारे बिल पास कर दिए। फिर संसद बुलाने की भी क्या जरूरत है?

जब विपक्षी सदस्य सदन में मौजूद थे और सरकार के लाए विधेयक पर वोटिंग की मांग कर रहे थे तब भी सरकार ने आसन के साथ कान में बात करके विधेयक को ध्वनि मत से पास कर दिया। सोचें, कृषि से जुड़े तीनों विधेयकों को तैयार करने में सरकार ने न किसान संगठनों से बात की थी और न विपक्षी पार्टियों को भरोसे में लिया। विधेयक संसद में आया तो उसे संसदीय समिति में भेजने की मांग भी ठुकरा दी गई। उसके बाद विपक्ष की वोटिंग की मांग को खारिज करके बिल पास कर दिया गया।

आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन का विधेयक तो विपक्ष की गैरहाजिरी में पास किया गया। देश की खाद्य सुरक्षा पर सर्वाधिक असर डालने वाले विधेयक को सरकार ने एकतरफा तरीके से पास करा दिया। इसी तरह सरकार श्रम सुधारों से जुड़े तीन विधेयक भी विपक्ष की गैरहाजिरी में पास कराया। इस पूरे प्रकरण में यानी संसद का सत्र बुलाने से लेकर कार्यवाही के दौरान और सत्र के समापन से यह दिख रहा है कि धीरे धीरे संसद को अप्रासंगिक बनाया जा रहा है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
दिल्ली में फिर बढ़ी पाबंदियां, अब इन पर लगा अंकुश, उपराज्यपाल ने दी ये जानकारी
दिल्ली में फिर बढ़ी पाबंदियां, अब इन पर लगा अंकुश, उपराज्यपाल ने दी ये जानकारी