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Saturday, April 17, 2021
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भारत में अमेरिकी कंपनियों का फलता स्वार्थ

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इसे चीन के साथ चल रहे टकराव से जोड़ कर भी देख सकते हैं या स्वतंत्र रूप से भारत के अमेरिका के करीब जाने की परिघटना से भी जोड़ सकते हैं पर हकीकत है कि भारत में अचानक अमेरिकी कंपनियों की दिलचस्पी बहुत बढ़ गई है। वैसे चीन और अमेरिका का मामला दोनों आपस में जुड़ा हुआ लग रहा है। भाजपा के नेता राम माधव ने लेख लिख कर कहा है कि चूंकि भारत पिछले कुछ समय से अमेरिका के करीब गया है इसी से चिढ़ कर चीन ने सीमा पर विवाद खड़ा किया है। उन्होंने यह सिद्धांत भी समझाया कि चीन हमेशा महाशक्तियों से टकराव में उनके सहयोगियों को निशाना बनाता है। सो, अमेरिका से दोस्ती की वजह से भारत निशाने पर है। अमेरिका के कारण भारत को एक ये ही नुकसान नहीं है। ईरान पर अमेरिका की लगाई पाबंदियों की वजह से भारत और ईरान की दूरी बढ़ी है, जिसका फायदा चीन उठा रहा है। चीन की शह पर ही ईरान ने भारत को चाबहार रेल परियोजना से बाहर कर दिया है।

बहरहाल, अमेरिका की वजह से जो भी कूटनीतिक दुश्वारियां भारत के सामने हैं वो अपनी जगह हैं। पर इसका दूसरा पहलू भी है। अमेरिका की वजह से भारत औऱ चीन के बीच तनाव बढ़ा और उस तनाव की वजह से भारत और चीन के बीच सीमित ट्रेड वार शुरू हुआ, जिसका फायदा अमेरिका की कंपनियां उठाना चाह रही हैं। पिछले कुछ दिनों से अमेरिका की कंपनियों दिलचस्पी भारत में बहुत बढ़ी है। हालांकि अभी वह दिलचस्पी मोटे तौर पर मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस के प्रति है पर आर्थिकी के बहुत से जानकार तो रिलायंस को ही देश मानने लगे हैं। सो, कह सकते हैं कि रिलायंस में दिलचस्पी का मतलब भारत में ही दिलचस्पी है।

ध्यान रहे पिछले दिनों दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक गूगल के भारतीय मूल के कार्यकारी अधिकारी, सीईओ सुंदर पिचाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की और उसके बाद उन्होंने ऐलान किया कि गूगल भारत में 75 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेगा। कंपनी ने बताया कि अगले पांच से सात साल में वह भारत में 75 हजार करोड़ रुपए लगाएगी। इसके दो दिन बाद ही खबर आई कि रिलायंस जियो में हिस्सेदारी खरीदने के लिए गूगल की बात हो रही है और वह 30 हजार करोड़ रुपए का निवेश रिलायंस में कर सकती है। इतने रुपए में सात से आठ फीसदी शेयर खरीदने की योजना होगी। ध्यान रहे रिलायंस जियो में दस फीसदी के करीब हिस्सेदारी फेसबुक ने खरीदी है।

असल में इस समय दुनिया भर में चार अमेरिकी कंपनियों की धूम है। इनके नाम- गूगल, एपल, फेसबुक और अमेजन हैं। इनमें माइक्रोसॉफ्ट शामिल नहीं है। उसके मालिक बिल गेट्स अलग तरह से भारत के कारोबारी माहौल को प्रभावित कर रहे हैं। बहरहाल, इन चार कंपनियों की बडी दिलचस्पी भारत में है। तभी कोरोना वायरस की इस वैश्विक महामारी के समय, जब चारों तरफ निवेश ठप्प हैं तब फेसबुक ने कोई 45 हजार करोड़ रुपए में दस फीसदी शेयर खरीदे। उसके बाद गूगल की 30 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना है। गूगल के निवेश से पहले ही रिलायंस जियो में अमेरिका की आधा दर्जन से ज्यादा कंपनियों ने डेढ़ लाख करोड़ रुपए से ज्यादा निवेश किया है।अमेजन ने भारत की दूसरी संचार कंपनियों में पैसा निवेश करने का फैसला किया है और अपने ई-कॉमर्स कारोबार को मजबूत करने और लोकल वेंडर्स की मदद के नाम पर अमेजन के सीईओ ने भारत में बड़े निवेश का वादा किया है। एपल ने तो भारत में फैक्टरी लगा कर अपने लोकप्रिय उत्पादों को भारत में बनाने का ऐलान किया है। इस तरह दुनिया की ये चारों विशाल तकनीकी कंपनियां भारत में पैसे लगा रही हैं। पहली नजर में कहा जा सकता है कि ये पहले से भारत में काम कर रही हैं और इनको बेहतर संभावना दिख रही है इसलिए ये निवेश कर रही हैं।

एक दूसरा और बड़ा कारण यह दिख रहा है कि चीन में इन कंपनियों में से एपल को छोड़ कर बाकी का कोई खास कारोबार नहीं है। ऊपर से कोरोना वायरस की वजह से चीन के अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अछूत होने के बाद भारत में बेहतर संभावना बनी है। चीन एक तरह से सब कुछ बंद कर रहा है, जबकि भारत सब कुछ खोल रहा है। भारत का आत्मनिर्भरता का प्लान सबसे अनोखा है। यहां ऐसा लग रहा है कि चीन और उसके उत्पादों से छुटकारा पाने को ही आत्मनिर्भरता माना जा रहा है। इसलिए अमेरिकी कंपनियां भारत के आत्मनिर्भरता अभियान में हिस्सा बनने आ रही हैं। इसके अलावा एक कारण यह भी है कि दुनिया की तमाम बड़ी डाटा या ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए भारत में जिस कंपनी से मुकाबला करना था या जिससे खतरा हो सकता था उसको उन्होंने सहयोगी बना कर साथ कर लिया। अब उन्हें भारत में अपने कारोबार में कोई चुनौती नहीं है। उलटे उनके कारोबार को आगे बढ़ाने का एक कैटेलिस्ट मिल गया। एक दूसरा कारण यह लग रहा है कि ये तमाम डाटा कंपनियां और ई-कॉमर्स कंपनियां भारत की नई ई-कॉमर्स नीति को लेकर चिंता में थीं। सरकार नई नीति बना रही है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसमें डाटा लोकलाइजेशन पर खास ध्यान दिया गया है। ये कंपनियां डाटा लोकलाइजेशन का विरोध करती रही हैं। रिलायंस के साथ आने के बाद इनके लिए इस मोर्चे पर भी बहुत सुविधाएं मिल जाएंगी।

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