निगेटिव कैंपेन के भरोसे नीतीश

बिहार विधानसभा का चुनाव होगा या नहीं इसे लेकर संशय है। मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने दो टूक अंदाज में कहा है कि अगर पारंपरिक तरीके से प्रचार की इजाजत नहीं मिली तो उनकी पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी। ध्यान रहे इस समय भाजपा और जदयू के नेता वर्चुअल रैलियां कर रहे हैं और चुनाव आयोग चुनाव की तैयारी कर रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने चुनाव आयोग से भी कहा है कि वह वर्चुअल प्रचार में सक्षम नहीं है और न बिहार की जनता इन तरीकों से चुनाव प्रक्रिया से जुड़ पाएगी।

उनके कहने का मतलब यह है कि जब तक कोरोना का संकट है तब तक चुनाव टाला जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि राजद को राष्ट्रपति शासन में चुनाव लड़ने में दिक्कत नहीं है। सरकार की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने भी कहा है कि कोरोना के इस संकट के बीच चुनाव कराने से लाखों लोगों का जीवन खतरे में पड़ेगा। इस वजह से चुनाव पर संशय पैदा हो गया है।

परंतु भाजपा और जदयू का वर्चुअल प्रचार नहीं रूक रहा है, बल्कि और तेज होता जा रहा है। इन दोनों पार्टियों के प्रचार का मुद्दा लालू प्रसाद और उनकी पार्टी का शासन है। ध्यान रहे लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी का शासन बिहार में 1990 से 2005 तक था। इन 15 सालों के शासन को भाजपा और नीतीश कुमार ने जंगल राज का नाम दिया और इसको खत्म करने के नाम पर वोट मांगे। लोगों ने 2005 में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा व जदयू यानी एनडीए की सरकार बना दी। उसके बाद 2010 के चुनाव में भी लोगों ने एनडीए को तीन-चौथाई बहुमत दिया। अगले चुनाव में यानी 2015 में जदयू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया और राजद के साथ मिल कर चुनाव लड़ी और नीतीश कुमार के चेहरे पर एक बार फिर बिहार के लोगों ने मुहर लगाई। हालांकि डेढ़ साल के बाद ही जुलाई 2017 में नीतीश फिर एनडीए में लौट गए।

इसका मतलब है कि लालू-राबड़ी के कथित जंगल राज के बाद 15 साल का राज नीतीश कुमार कर चुके हैं। इन 15 सालों में साढ़े 11-12 साल के करीब भाजपा भी उनके साथ रही है। इसके बावजूद दोनों पार्टियां 15 साल पहले के राज का मुद्दा उठा रही हैं। अपने 15 साल के शासन की उपलब्धियां बताने की बजाय दोनों पार्टियों बिहार के लोगों को डरा रही हैं कि जंगल राज की वापसी हो जाएगी। अपना कामकाज दिखा कर वोट मांगने की बजाय भाजपा और जदयू के नेता बता रहे हैं कि लालू-राबड़ी राज में सड़कें कितनी खराब थीं और कैसे सारे उद्योग-धंधे चौपट हुए।

सवाल है कि इस तरह के निगेटिव कैंपेन की क्या मजबूरी है? क्या नीतीश कुमार और सुशील मोदी के साथ साथ उनकी पार्टी के सारे रणनीतिकार यहीं समझ रहे हैं कि लालू प्रसाद और उनके राज का भय दिखा कर बिहार के लोगों को अपने साथ जोड़े रखा जा सकता है? या उनके पास अपनी कोई उपलब्धि नहीं है या उपलब्धि है तो उस पर भरोसा नहीं है कि उसके जरिए वोट मिल सकता है? यह भी सवाल है कि क्या दोनों सत्तारूढ़ पार्टियों के पास भविष्य का कोई विजन भी नहीं है, जिसे दिखा कर वे वोट मांग सकें? तीस साल पहले के शासन का भय दिखाने की बजाय अगर दोनों पार्टियां 30 साल आगे का विजन पेश करती हैं तो क्या वह बेहतर नहीं होता?

निगेटिव कैंपेन कई बार काम आता है, जैसे 2005 में दो बार हुए चुनावों में यह काम आया था क्योंकि तब लोग एक पार्टी और दो चेहरों- लालू व राबड़ी से ऊबे हुए थे। उन्होंने कुछ नए की चाह में नीतीश कुमार को अपना मुख्यमंत्री चुना। पहले पांच साल नीतीश कुमार ने बिहार के लोगों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए काम भी किया। कम से कम कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर। इसका फायदा उनको 2010 के चुनाव में मिला, जब लोगों ने एनडीए को तीन-चौथाई बहुमत दिया। यह नीतीश कुमार को सकारात्मक एजेंडे की स्वीकारोक्ति थी, उस पर लोगों की मुहर थी। लेकिन दुर्भाग्य से उसके बाद बिहार की गाड़ी फिर पटरी से उतर गई और अभी तक पटरी पर नहीं आ पाई है। यहीं कारण है कि 2015 में नीतीश कुमार को कथित जंगल राज के उसी चेहरे के साथ जाना पड़ा, जिसका विरोध करके वे सत्ता में आए थे।

तभी सवाल है कि 2005 में वे जिस राज का विरोध करके सत्ता में आए थे 2015 में उसका समर्थन करके उन्होंने वह एजेंडा तो गंवा दिया, फिर अब 2020 में वे क्यों उस मुद्दे को उठा रहे हैं? अब तो उनसे ज्यादा मुखर तरीके से राजद के नेता यह बात जनता में बता रहे हैं कि जब लालू प्रसाद जंगल राज का प्रतीक थे तब नीतीश कुमार 2015 में उनके साथ क्यों चुनाव लड़े थे? जाहिर है किसी अच्छे और ठोस मुद्दे की कमी के कारण मजबूरी में जदयू व भाजपा बासी कढ़ी में उबाल लाने का प्रयास कर रहे हैं। पर अब तक का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि निगेटिव मुद्दा एक बार से ज्यादा नहीं भुनाया जा सकता है, जबकि सकारात्मक एजेंडे पर कई चुनाव जीते जा सकते हैं।

बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड में पिछले साल के चुनाव में भाजपा ने पांच शासन करने के बाद अपने एजेंडे पर चुनाव लड़ने की बजाय झारखंड मुक्ति मोर्चा का डर दिखा कर चुनाव लड़ा था और उसे मुंह की खानी पड़ी। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने अजित जोगी और उनकी कमान वाली कांग्रेस सरकार का डर दिखाया था पर लोगों ने उसे खारिज कर दिया क्योंकि पहले वे उस मुद्दे पर चुनाव जीते चुके थे। इसलिए लालू-राबड़ी के राज की याद दिलाने और उनके विरोध के निगेटिव एजेंडे पर चुनाव में जाने की बजाय नीतीश कुमार ईमानदारी से 15 साल का रिपोर्ट पेश करें और अगले 15 साल का विजन बताएं और लोगों को फैसला करने दें।

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