कांग्रेस को कमजोर आंकने की गलती अब नहीं करेगी भाजपा

देवदत्त दुबे
मध्यप्रदेश में हार की फिसलपट्टी पर सवार भाजपा बार-बार कांग्रेस को कमजोर आंकने की गलती कर रही थी लेकिन झाबुआ विधानसभा के उपचुनाव में तगड़ा झटका लगने के बाद अब यह गलती नहीं करेगी। भाजपा की समझ में आ गया है कि कांग्रेस के पास आज भी प्रतिबद्ध मतदाता हैं। केवल जहां-जहां कांग्रेस का नेतृत्व कमजोर होता है वहां-वहां कांग्रेस चुनाव हारती है और जहां-जहां कांग्रेस मजबूत नेता मोर्चे पर तैनात करती है वहां कांग्रेस को हराना मुश्किल हो जाता है। दरअसल राजनीति में सत्ता का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है कि सत्ताधारी को सत्ता के रहते अपनी गलतियों का एहसास ही नहीं होता है।

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चारों तरफ उसे जी सर, एस सर कहने वाले घेर लेते हैं और वह समझता है कि मैं सर्वमान्य हूं और मैं जो कर रहा हूं वही सही है, वही स्थाई है, बाकी सब बेकार है। यही हाल भाजपा का हुआ। लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के कारण भाजपा ने पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक के चुनाव एक तरफा जीते। यहां तक कि भाजपा नेता कांग्रेसमुक्त प्रदेश का नारा भी लगाने लगे लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेसी नेताओं का अहंकार 15 वर्षों में खत्म हुआ और वो एकजुटता के साथ एक सर्वमान्य नेता के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे और नतीजे के रूप में 15 वर्षों के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई।

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यह बात और है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं में सत्ता के आते ही अहंकार सर चढ़कर बोलने लगा लेकिन उसको अभी फायदा भाजपा के नेताओं का मिल रहा है। जो लगभग एक दशक तक पॉवरफुल रहे वे अभी भी अपने आपको लोकप्रिय और जनाधार वाला नेता समझ रहे हैं और वह यह गलती कर रहे हैं कि कांग्रेस को हम कभी भी किसी भी चुनाव में हरा सकते हैं। भाजपा के ऐसे नेता भूल गए कि चित्रकूट, मुंगावली, कोलारस के बाद विधानसभा के आम चुनाव और फिर छिंदवाड़ा लोकसभा, विधानसभा और हाल ही में झाबुआ विधानसभा का उपचुनाव हार कर भाजपा हार की फिसलपट्टी पर फिसलती जा रही है। उधर कांग्रेस धीरे-धीरे मजबूत होती जा रही है।

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झाबुआ में ना केवल हार बल्कि 27000 से भी ज्यादा मतों की हार ने सिद्ध कर दिया है कि भाजपा नेता अति आत्मविश्वास में हैं। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक पार्टी की तरफ लौट आया है। बहरहाल झाबुआ विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद भाजपा का एक बहुत बड़ा वर्ग अब चिंतित हो गया है। भले ही राष्ट्रीय नेतृत्व की धमक के आगे वह केदार शुक्ला जैसी सार्वजनिक बयानबाजी ना करें लेकिन पार्टी फोरम पर अब नेता खुलकर अपनी बात रखेंगे। यदि यही हालात रहे तो मध्यप्रदेश में कुछ वर्षों के लिए कांग्रेसी भाजपा की स्थिति हो जाएगी जो कांग्रेस की सत्ता से हटने के बाद हुई थी।

पार्टी अब प्रदेश में जीत के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व की तरफ देख रही है कि मोदी और शाह ही कोई करिश्मा करेंगे तब जाकर ही या तो सरकार कांग्रेस की गिरा दी जाएगी या फिर आम चुनाव में पार्टी सत्ता में वापसी कर पाएगी। भाजपा का जो वर्तमान अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व है वह अपनी धार खो चुका है। वह केवल भाजपा की लहर में ही चुनाव जीता सकता है। जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में 29 सीटों में से 28 सीटें जीतने पर भाजपा के नेता अपनी अपनी पीठ थपथपा रहे थे।

भाजपा की यह हालत तब है जब कांग्रेस अपना सकारात्मक माहौल नहीं बना पा रही है। पार्टी के नेता ही बीच-बीच में पार्टी और सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री कमलनाथ सधे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं और सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं यदि उन्हें पर्याप्त अवसर मिल गया तो फिर वाकई में भाजपा नेताओं की प्रदेश में मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

कुल मिलाकर भाजपा के जमीनी नेता प्रदेश में राजनीतिक माहौल को भाप चुके हैं और दीपावली बाद पार्टी के कुछ नेता एक बैठक करके अपने सुझाव से पार्टी नेतृत्व को अवगत कराएंगे जिससे भविष्य में पार्टी अब प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर आंकने की गलती ना दोहराएं अन्यथा यही हाल रहे तो फिर पार्टी को नगरीय निकाय चुनाव और पंचायती राज के चुनाव में कांग्रेस से मुकाबला करने में बेहद कठिनाई होगी। कांग्रेस में अपनी जीत आसान करने के लिए पहले ही चुनाव प्रणाली में परिवर्तन कर लिया है।

पार्टी नेताओं का यह भी मानना है कि लंबे अरसे बाद एक बार फिर यदि कांग्रेस के नेता इन संस्थाओं पर काबिल हो गए तो फिर सहकारी संस्थाओं में भी वे आसानी से कब्जा कर लेंगे और प्रदेश में पार्टी की एक बार फिर जड़ें मजबूत हो जाएंगी उसके बाद भाजपा को सत्ता में वापसी की राहें बेहद मुश्किलें जाएंगी।

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