आम आदमी की लड़ाई और लोहिया

रघु ठाकुर
लोहिया समग्र परिवर्तन में विश्वास रखते थे। उनके ही शब्दों में हिन्दुस्तान की सामान्य जनता मामूली लोग अपने में भरोसा करना शुरू करे कि कल तक जो अंग्रेजी राज था वह पाजी बन गया तो उसे खत्म किया, आज कांग्रेसी सरकार है वह पाजी बन गई तो उसे खत्म करेंगे। कल मान लो कम्यूनिस्ट सरकार बने व पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे परसों सोशलिस्ट सरकार बनेगी मान लो वह भी पाजी बन जाये तो उसे भी खत्म करेंगे। जिस तरह तवे पर रोटी उलटते पलटते सेंक लेते हैं उसी तरह हिन्दुस्तान की सरकार को उलटते पलटते ईमानदार बनाकर छोंड़ेंगे। यह भरोसा किसी तरह हिन्दुस्तान की जनता में आ जाये तो फिर रंग आ जायेगा राजनीति में। लोहिया आम आदमी को लड़ना सिखाकर राजनैतिक परिवर्तन की क्रिया को तेज करना चाहते थे। उनके ही शब्दों में बिना हथियारों के अन्याय से लड़ने का तरीका निकालना पड़ेगा इसका तरीका निकला भी है। सिविल नाफरमानी की क्रिया में न्याय और समता प्राप्त करने की उस मनुष्य की अदम्य प्रवृत्ति प्रकट होती है जिसके हाथ में हथियार नहीं है। हथियारों के खात्मे की तरह गरीबी का अंत भी अपने आप नहीं हो जायेगा। दोनों के लिये लगन के साथ यत्न करना पड़ेगा। हथियार और गरीबी में गरीबी विलाशक ज्यादा मारक रोग है।

लोहिया का हर संघर्ष आम आदमी से जुड़ा हुआ था और आम आदमी का विश्वास जगाने, आम और विशेष का फर्क मिटाने, आदमी में आत्म विश्वास और साहस पैदा करने के लिये था। लोहिया बम्बई की यात्रा पर थे और जिस मकान में ठहरे हुये थे उस मकान के सामने बम्बई की झोपड़ पट्टी के लोग सार्वजनिक नल के सामने लाईन लगाये थे। परेशान महिलायें नजर आयी । लोहिया ने अपने साथियों से सवाल पूॅंछा कि उन्हे संगठित कौन करेगा? एक विचारधारा और पार्टी का आधार ऐसे संगठन ही हो सकते हैं। श्रीमति मृणाल गोरे ने यह जबाबदारी स्वीकार की और बम्बई की झोपड़ पट्टी वालों को संगठित करना शुरू किया तथा पानी के लिये परेशान महिलाओं को संगठित कर सड़कों पर निकलना शुरू किया। कुछ ही समय में मृणाल बाई बम्बई की पानी वाली ताई बन गई और बम्बई के उन गरीब आम असंगठित लोगों ने लड़ना सीख लिया जो मायानगरी की माया के डर से घरों से निकलते नहीं थे।

लोहिया बदलाव के तीन तरीके बताते थे (1) जेल (2) फावड़ा और (3) वोट। उन्होंने जन आंदोलन को जेल का पर्याय तथा वोट की राजनीति का पर्याय माना था। वे सदैव कार्यकर्ताओं को जेल को प्रेरित करते थे जिससे समाजवादी कार्यकर्ता निभर्य बने, उससे आत्मविश्वास पैदा हो और व्यवस्था के नकली शेरों से लड़ने के लिये तैयार हो। उन्होंने पिछड़े पावे सौ में साठ का नारा देकर देश की विषम सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। लोहिया ये जानते थे कि जब तक देश में जाति प्रथा रहेगी तब तक अमीर और गरीब का अंहिसक वर्ग संघर्ष संभव नही है। इसीलिये लोहिया जाति को मिटाना चाहते थे और आम लोगों को आर्थिक सामाजिक गरीबी और पिछड़ेपन के आधार पर संगठित करना चाहते थे। उनके इस नारे ने समूची गंगा-जमना की पट्टी में भारी हलचल पैदा की और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का बड़ा जनाधार कायम किया।

लोहिया वोट के माध्यम से भी प्रतीक और पयार्य खड़ा करते थे तथा वंचित वर्गों को राजनीति के मंच पर अगली कतार में खड़ा करते थे। ग्वालियर के संसदीय चुनाव में लोहिया ने ग्वालियर की पूर्व महारानी स्व. श्रीमति सिंधिया के विरूद्ध एक दलित जमादार परिवार की महिला सुख्खो रानी को पार्टी का प्रत्याशी बनाया था। लोहिया ने चुनाव के कार्यक्रम के रूप में एक बहस शुरू की थी कि एक तरफ महारानी है जो शोषण का प्रतीक है और दूसरी तरफ मेहतरानी है जो परिश्रम और संघर्ष का प्रतीक है। सामाजिक परिवर्तन के लिये लोहिया का यह चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ तथा देश के उन करोड़ों मतदाताओं के मन में इस एक घटना से आत्म विश्वास का संचार हुआ जो रानियों और महारानियों के दर्षन के लिये लालायित होकर खड़े रहते थे, वे लोकतांत्रिक सत्ता हासिल करने के लिये अपने अधिकार के प्रति सचेत हुये। लोहिया जनता की लड़ाई, जन भाषा में ही लड़े जाने के पक्षधर थे। वे मानते थे कि भाषा भी गुलामी को बनाये रखने का काम करती है। उनके ही शब्दों में भारत को इस समय तीन गुलामियों से लड़ना है आर्थिक साम्राज्यवाद के रूप में बाहरी गुलामी, जाति व्यवस्था के रूप में आंतरिक गुलामी और वैचारिक और सांस्कृतिक गुलामी। इन तीनों गुलामियों को बनाये रखने का काम इस समय अंग्रेजी भाशा कर रही है।

भाषा देश के मानसिक विभाजन का आधार तब भी थी और आज भी है। भाषा के आधार पर देश छोटे और बड़े, अमीर और गरीब में बॅंट जाता है। अंगेजी जानने वाले समाज में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और बड़े बन जाते हैं जबकि राष्ट्रभाषा क्षेत्रीय भाषायें और जनभाषायें अज्ञानता और अपढ़ होने का पयार्य बन जाती है। कोई भी देश तभी तरक्की कर सकता है जब वहॉं के आम आदमी की भाषा राजकीय भाषा हो।
ज्ञान और योग्यता की वास्तविक परख भी राष्ट्रभाषा या भारतीय भाषा के आधार पर ही हो सकती है। परन्तु हमारे देश में योग्यता की कसौटी अंग्रेजी भाषा ज्ञान बन जाना है। हिन्दी को बोलने वाले स्वतः अपने आप को छोटा समझने लगते है और हीनग्रंथि का शिकार हो जाते हैं। इसीलिये देश की होटलों, बसों, रेलों और हवाई जहाजों में अंग्रेजी भाषा में बतियाने वाले श्रेष्ठी भाव ग्रस्त व व्यवहार करने है लोहिया इस हीन ग्रंथियों को तोड़ना चाहते थे। उनका अंग्रेजी हटाओ का नारा देश के गरीब और आम आदमी में विश्वास पैदा करने का बड़ा संबल बना था। वे अंग्रेजी सत्ता जो साम्राज्यवाद का बड़ा हथियार था, के खिलाफ थे तथा इसीलिये कहते थे अंग्रेजी हटाओ भारतीय भाषायें लाओ।

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