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Saturday, May 15, 2021
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संस्थाओं की साख का सवाल

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चुनाव करा रही संस्थाओं की साख पर बड़ा सवाल उठा है। यह पहली बार है, जब इस तरह से संस्थाएं विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आई हैं। चुनाव आयोग के ऊपर तो खैर कुछ पहले से आरोप लगने लगे थे लेकिन अर्धसैनिक बलों पर पहली बार आरोप लगे हैं कि वे मतदान को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नाम की संस्था और गृह मंत्री नाम की संस्था भी पहली बार इस तरीके से निशाना बनी है। यह पहली बार हुआ है कि जब किसी चुने हुए सांसद ने प्रधानमंत्री को निशाना बना कर कहा कि ‘वे आवारों की तरह बोलते हैं’। तृणमूल कांग्रेस की सांसद मोहुआ मोइत्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मजाक उड़ाने वाले भाषण का जिक्र किया। उन्होंने उनके बोलने की शैली पर नाराजगी जताते हुए उसकी तुलना सड़क किनारे खड़े होकर आती-जाती महिलाओं पर तंज करने वालों से की। अगर यह तुलना नहीं भी की जाए तो यह कहने में हिचक नहीं है कि प्रधानमंत्री की शैली उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं थी। वे देश के प्रधानमंत्री हैं और देश की इकलौती महिला मुख्यमंत्री पर तंज कर रहे थे, यह काम शालीनता और राजनीतिक शैली में भी हो सकता था। इसके लिए अत्यधिक नाटकीयता की जरूरत नहीं थी।

बंगाल की 294 में से पहले दो चरण में सिर्फ 60 सीटों पर मतदान हुआ था और उसी आधार पर प्रधानमंत्री ने चुनाव जीतने का दावा कर दिया और राज्य सरकार के अधिकारियों को मंच से आदेश देने लगे कि जब वे शपथ ग्रहण समारोह में आएं तब तक क्या क्या हो गया होना चाहिए। सोचें, वे प्रधानमंत्री हैं और किसी भी समय अधिकारियों को आदेश देने का अधिकार रखते हैं लेकिन सिर्फ 20 फीसदी मतदान के बाद जीत का दावा करके वे क्या साबित करना चाहते थे? अपनी जीत का ऐलान करने की ऐसी बेचैनी किसी छुटभैया नेता की हो तो समझ में आती है पर देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री एक जैसी भाषा में मंच से नतीजों की घोषणा कर रहे हैं, यह एक नई ही परंपरा की शुरुआत है, जिसे अच्छा नहीं कहा जा सकता है।

यह असल में दोनों नेताओं की बेचैनी को दिखाता है और एक तरह से इससे यह संकेत भी मिलता है कि उनके लिए रास्ता बहुत मुश्किल है इसलिए वे हर चरण के मतदान के बाद जीत का ऐलान करके अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा रहे हैं और आम मतदाताओं को कंफ्यूज कर रहे हैं। इसी तरह से देश के गृह मंत्री विपक्षी नेताओं को जेल भेजने की बात कर रहे हैं। वे भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में अगर किसी विपक्षी नेता के आपराधिक कृत्य के बारे में उनको जानकारी है तो उस पर कार्रवाई के लिए उन्होंने राज्य का चुनाव जीतने का इंतजार क्यों करना चाहिए? अगर कोई अपराध हुआ है, जो गिरफ्तार होने लायक है और वे उसके बारे में जानते हैं तो क्या वह सभाओं में कहने की बात है या उस पर कार्रवाई होनी चाहिए?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव में ड्यूटी कर रहे अर्धसैनिक बलों पर भी बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अर्धसैनिक बलों ने तृणमूल कांग्रेस के लोगों को डराया और मतदाताओं को भी प्रभावित करने का प्रयास किया। हालांकि चुनाव आयोग ने अपनी जांच कराने के बाद ऐसी किसी घटना से इनकार किया। लेकिन ममता ने अपने आरोपों के समर्थन में यह भी कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अर्धसैनिक बलों को आदेश दे रहे हैं। ध्यान रहे अर्धसैनिक बलों की कमान संभालने वाला मंत्रालय गृह मंत्रालय ही होता है, जिसके मुखिया अमित शाह हैं।

पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के दर्जनों नेता दूसरी पार्टियां छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हैं। उन सबको वाई या जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गई है और सबकी सुरक्षा में अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। इसलिए प्रदेश में कोई नेता अर्धसैनिक बलों के साथ घूमता है तो यह उसकी पहचान होती है कि वह भाजपा का है। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और नक्सवाद से लड़ने के लिए बने अर्धसैनिक बलों को इतनी बड़ी संख्या में भाजपा नेताओं की सुरक्षा में तैनात किया गया है कि लोगों की नजर में इस संस्था की साख प्रभावित हुई है।

इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा सवाल चुनाव आयोग की साख पर उठे हैं। पश्चिम बंगाल में आठ चरण में चुनाव कराने के फैसले से ही आयोग की साख सवालों के घेरे में आ गई। इस समय देश में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है और फरवरी के अंत में जब चुनावों की घोषणा हुई तब कोरोना की दूसरी लहर आने का अंदेशा जताया जाने लगा था। ऐसी स्थिति में कायदे से कम चरण में चुनाव करा कर चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए थी। राज्य में सुरक्षा स्थिति की दुहाई देने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि ऑपरेशन ग्रीन हंट के बाद राज्य में नक्सली गतिविधियों में काफी कमी आई है और पिछले सात-आठ साल में राज्य में कोई बड़ा नक्सली हमला नहीं हुआ है। इसलिए नक्सली खतरे का कोई मामला नहीं बनता है। हां, यह संभव है कि पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव हो, जो कि हर चुनाव में हर जगह होता है, क्या उसके लिए चुनाव आठ चरण में कराए जाएंगे? क्या तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके में टकराव नहीं होता है या केरल में यूडीएफ और एल़डीएफ के कार्यकर्ता आपस में नहीं उलझते हैं?

चुनाव आयोग ने आठ चरण में मतदान की घोषणा के साथ हर चरण के लिए सीटों का चुनाव इस तरह से किया कि शुरुआती दो चरण में भाजपा के असर वाले इलाकों में मतदान हो। इससे भाजपा को अपनी जीत की हवा बनाने का मौका मिला। तृणमूल कांग्रेस के असर वाले इलाकों में आखिरी तीन चरण में मतदान रखा गया। इसके बाद चुनाव प्रचार के दौरान आयोग ने नेताओं के मुंह पर लगाम लगाने का कोई उपाय नहीं किया। यहां तक चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद केंद्रीय एजेंसियां विपक्षी पार्टियों के नेताओं को परेशान करती रहीं, पुराने मामलों में छापे मारती रहीं, जमानत रद्द करा कर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कराती रहीं, लेकिन चुनाव आयोग ने इस बारे में एक बार भी सवाल नहीं उठाया। चुनाव के दौरान सभी पार्टियों के लिए बराबरी का मैदान सुनिश्चित करने का जिम्मा चुनाव आयोग का होता है लेकिन वह अपनी यह जिम्मेदारी निभाने में बुरी तरह से फेल रहा।

वोटिंग के बाद ईवीएम लेकर उसके कर्मचारी भाजपा उम्मीदवार की गाड़ी में बैठे पकड़े जाते हैं और आयोग इसका भी बचाव करता है। जिस बूथ पर 70 मतदाता हैं वहां 181 वोट पड़ जाते हैं और आयोग इसका भी बचाव करता है। असम में भाजपा के नेता हिमंता बिस्वा सरमा ने बीपीएफ के हाग्राम मोहिलारी को खुलेआम उठवा लेने की धमकी दी, जिस पर आयोग ने 48 घंटे के लिए प्रचार से पाबंदी लगाई पर 24 घंटे में ही वह पाबंदी हटा ली गई। तमिलनाडु में ऐसी ही पाबंदी डीएमके नेता ए राजा पर भी लगाई गई थी लेकिन वहां पाबंदी नहीं हटाई गई या केरल में सीपीएम के नेता ने राहुल गांधी के ऊपर बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था पर आयोग ने कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी।

तभी पहली बार ऐसा हुआ कि किसी मुख्यमंत्री ने खुले शब्दों में यह कहा कि चुनाव आयोग कुछ भी कर ले, बंगाल में भाजपा नहीं जीतेगी। ममता बनर्जी ने साफ-साफ आरोप लगाया कि आयोग भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है। इसके बाद चुनाव आयोग को निश्चित रूप से आत्ममंथन करना चाहिए आखिर वही संस्था है, जिसके ऊपर लोकतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। ध्यान रहे भारत के लोगों के लिए लोकतंत्र मतदान केंद्र पर ही खत्म हो जाता है। इसलिए मतदान में किसी किस्म की गड़बड़ी लोकतंत्र में लोगों के भरोसे को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी।

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साभार - ऐसे भी जाने सत्य

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