दबाव में किसान नहीं झुकेंगे!

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कमाल की बात कही है। उन्होंने केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के साथ वापस बातचीत की बहाली का न्योता भेजने के बाद कहा कि प्रधानमंत्री के ऊपर दबाव काम नहीं करता है। यानी प्रधानमंत्री दबाव में कोई फैसला नहीं करते हैं और दबाव में झुकने वाले नहीं हैं। तो क्या कृषि और किसान कल्याण मंत्री यह मान रहे हैं कि आंदोलनकारी किसान दबाव में झुक जाएंगे और सरकार की ओर से बनाए जा रहे दस किस्म के दबावों में आकर आंदोलन वापस ले लेंगे? अगर ऐसा है तो यह सरकार की गलतफहमी लग रही है। असलियत यह है कि किसानों ने अभी तक सरकार पर बहुत ज्यादा दबाव डालने वाला कोई कदम नहीं उठाया है वे संविधान से मिले शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार के तहत ही आंदोलन कर रहे हैं, जबकि लोकतांत्रिक देश की लोक कल्याणकारी सरकार हर तरह से दबाव डाल रही है और तमाम किस्म के हथकंडे अपना रही है ताकि आंदोलन को तोड़ा या खत्म किया जा सके।

कृषि मंत्री का यह कहना कि प्रधानमंत्री पर कोई दबाव काम नहीं करता, अपने आप में किसानों पर दबाव डालने का एक हथकंडा है। उनको डराया जा रहा है। आठ दिसंबर से लेकर 30 दिसंबर तक बातचीत रोके रखना भी दबाव का ही हथकंडा था। क्या देश की लोक कल्याणकारी सरकार को दिख नहीं रहा था कि हजारों किसान तीन-चार डिग्री की ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठे हैं, आंदोलन कर रहे हैं? यह सब देखते हुए भी सरकार ने आठ दिसंबर के बाद किसानों से बात नहीं की और उन्हें बैठे रहने दिया तो इसका मकसद किसानों का हौसला तोड़ना था। सरकार मान रही थी कि किसान क्या करेंगे! सरकार की उदासीनता से, ठंड से, बीमारी से, संसाधनों की किल्लत से परेशान होकर झुक जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटे सरकार की उदासीनता से किसानों का हौसला मजबूत होता गया और जितनी देरी हुई उतना ही आंदोलन का विस्तार होता गया। अब कई राज्यों में आंदोलन शुरू हो गए हैं।

किसानों पर दबाव डालने का एक तरीका यह निकाला गया कि प्रधानमंत्री रोज टेलीविजन पर आकर कृषि कानूनों के फायदे समझाएंगे। पिछले 34 दिन से प्रधानमंत्री हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी बहाने से देश के लोगों को कृषि कानूनों के फायदे समझा रहे हैं या किसानों के हित में किए गए काम गिना रहे हैं। उनकी सरकार ने दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों से बातचीत बंद कर दी और प्रधानमंत्री कच्छ से लेकर मध्य प्रदेश और जम्मू कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र और जाने कहां-कहां के किसानों या दूसरे लोगों से बात करते रहे। सरकार के प्रबंधकों को इस बात की भी हैरानी है कि किसानों के आंदोलन से दिल्ली-एनसीआर के लोगों को भारी परेशानी हो रही है इसके बावजूद आंदोलनकारी किसानों के खिलाफ माहौल नहीं बन रहा है, उलटे लोकप्रिय समर्थन बढ़ता जा रहा है। तभी खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि विपक्षी पार्टियां आंदोलन के बहाने दिल्ली के नागरिकों के लिए परेशानी पैदा कर रही हैं। इसके बावजूद दिल्ली के लोग किसानों के खिलाफ नहीं भड़के।

केंद्र सरकार ने आठ दिसंबर को जिस दिन आंदोलनकारी किसानों से आखिरी बात की थी उसके बाद लगभग रोज कृषि मंत्री पता नहीं कहां-कहां के किसान संगठनों से मिल रहे हैं और टीवी पर आकर, प्रेस कांफ्रेंस करके बता रहे हैं कि आज अमुक किसान संगठन के लोग मिले और कृषि कानूनों का समर्थन किया। देश के सारे किसान संगठन इस बात से भी हैरान हैं कि आखिर कहां के किसान हैं, जो इन कानूनों का समर्थन कर रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने तो यहां तक कहा कि वे उन किसानों से मिलना चाहते हैं, जो इन कानूनों का समर्थन कर रहे हैं। तीन हफ्ते बाद किसानों से बातचीत के लिए राजी होने के दिन यानी 28 दिसंबर को भी कृषि मंत्री की तस्वीर जारी हुई, जिसमें कहा गया कि 22 किसान संगठनों के लोग मिले हैं और इन कानूनों का समर्थन किया है। सवाल है कि सरकार इन किसान संगठनों को भी वार्ता में क्यों नहीं बैठा रही है? या इन संगठनों से क्यों नहीं कह रही है कि वे आंदोलनकारी किसानों से मिलें और उन्हें समझाएं कि ये कानून कितने फायदेमंद हैं? ये किसान मंत्रियों के चैंबर में ही क्यों मिल रहे हैं, मीडिया के सामने जाकर कानूनों के फायदे क्यों नहीं बताते या इन कानूनों के  समर्थन में आंदोलन क्यों नहीं करते?  इसका कारण यह है कि ये सब सरकार या भाजपा के नेता-कार्यकर्ता हैं, जिनको दिखा कर किसानों पर दबाव बनाया जा रहा है।

सरकार के लोग रोज कह रहे हैं कि किसानों को गुमराह किया जा रहा है। असलियत इससे अलग है। सरकार को इस बात की चिंता नहीं है कि किसान उसके बनाए कानूनों को समझ नहीं रहे हैं, सरकार को इस बात की चिंता है कि किसान उन कानूनों को समझ गए हैं! किसानों को समझ में आ गया है कि इन कानूनों का असली मकसद क्या है। काश देश के आम लोग खास कर मध्य वर्ग के लोग भी समझ पाते इन कानूनों का असली मकसद? चूंकि किसान इसका मकसद समझ गया है इसलिए वह या तो आंदोलन कर रहा है या आंदोलन को मौन समर्थन दे रहा है। कहीं से भी इस आंदोलन का विरोध होने की खबर नहीं है।

किसानों ने सरकार से बातचीत का जो एजेंडा भेजा है उससे भी सरकार को समझ आया होगा कि किसान कहां तक सोचे हुए हैं। किसानों ने सरकार से यह नहीं कहा है कि कानून वापस लेने पर बात करेंगे। उन्होंने एजेंडे में लिखा है कि कानूनों को निरस्त करने की प्रक्रिया पर बात करेंगे। यानी कानून निरस्त तो होना ही है वह कैसे होना है इस बार बात करेंगे। इसी तरह किसानों ने इस बार के एजेंडे में एमएसपी की कानूनी गारंटी नहीं मांगी है, बल्कि कहा है कि एमएसपी की गारंटी कैसे मिलेगी, इसकी प्रक्रिया, मोडेलिटीज पर बात करनी है। सोचें, इसके बाद भी सरकार समझ रही है कि वह किसानों को दबाव डाल कर झुका लेगी! किसान किसी किस्म के दबाव में नहीं झुकने वाले हैं, ऐसा उन्होंने अपने एजेंडे से जाहिर कर दिया है। अब सरकार को फैसला करना है कि वह आंदोलन कर रहे अपने लाखों नागरिकों की बात गंभीरता से सुन कर करोड़ों देशवासियों के हित में ईमानदारी से फैसला करती है या अपने दो क्रोनी पूंजीपतियों का हित साधने के फैसले पर अड़ी रहती है!

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