त्योहार सावधानी से पर चुनाव नहीं !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर समूचे सरकारी तंत्र ने त्योहारों को कोरोना वायरस के संक्रमण की मूल वजह माना है और लोगों को आगाह किया है कि वे त्योहार सावधानी से मनाएं। यह अलग बात है कि किसी ने यह अपील नहीं कि है कि चुनाव सावधानी से लड़े जाएं। लोग रैलियों में न जाएं। नेता प्रचार के लिए आएं तो उनसे दूरी रखें। यहां तक कि यह भी अपील नहीं की जा रही है कि नेता मास्क पहनें। बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव टार्जन बन कर घूम रहे हैं। उन्होंने दिखावे भर के लिए भी मास्क नही पहना है। वे मास्क नहीं पहन कर अपने लोगों को यह भरोसा दिला रहे हैं कि कोरोना कुछ नहीं है और वे बिना डरे रैलियों में आएं और वोट डालने भी जाएं। यह उनका बहुत बड़ा दांव है। क्योंकि सबको इस बात का अंदेशा है कि चुनाव में लोग कोरोना वायरस के डर की वजह से बाहर नहीं निकलेंगे। एक तरफ भाजपा के नेता हैं, जो सारी सावधानी बरत रहे हैं फिर भी संक्रमित हो रहे हैं और दूसरी ओर तेजस्वी यादव हैं, जो कोई सावधानी नहीं बरत रहे हैं फिर भी उनको कुछ नहीं हो रहा है। यह मैसेज उन्होंने अपने मतदाताओं को दिया है।

इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि चुनाव कोरोना वायरस के असर से अछूता है। बिहार चुनाव पर और देश के दूसरे राज्यों में हो रहे उपचुनावों में कोरोना का असर साफ दिख रहा है। कोरोना के बीच बिहार में विधान परिषद की सीटों पर चुनाव हुए हैं। 22 अक्टूबर को चुनाव हुए थे। स्नात्तक और शिक्षक क्षेत्र की विधान परिषद सीटों के लिए तमाम प्रयासों के बावजूद 50 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं हो सका। पटना जैसी सीट पर जहां पार्टियों के अलावा मजबूत निर्दलीय नेता मैदान में थे वहां भी 50 फीसदी ही मतदान हो सका। इसका मतलब है कि तमाम प्रयासों के बावजूद विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत प्रभावित होगा। बिहार में इस बार ज्यादा मतदान की संभावना जताई जा रही थी क्योंकि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर बाहर से लौटे हैं और अपने घर पर हैं। इसके बावजूद ज्यादा संभावना इस बात की है कि मतदान प्रतिशत कम होगा। पिछले चुनाव में भी 55 फीसदी के आसपास ही मतदान हुआ था।

कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच बिहार में पहली बार चुनाव हो रहा है। दुनिया के कई देशों में इस दौरान चुनाव हुए हैं और हर जगह कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए ईमानदार और सार्थक प्रयास करने वाली पार्टियों को लोगों ने जिताया है। थाईलैंड से लेकर बोलीविया और ताइवान तक लोगों ने उन पार्टियों को हरवाया, जिन्होंने कोरोना वायरस को गंभीरता से नहीं लिया या मुकाबले में विफल रहे और वैज्ञानिकता के साथ संकट को समझते हुए उसका मुकाबला करने वाले लोगों को जीत दिलाई। श्रीलंका में भी चुनाव हुआ पर वहां के नतीजों को कोरोना वायरस के नजरिए से नहीं देखा जा सकता है। बहरहाल, अगर दुनिया भर के देशों में हुए चुनाव को आधार बनाएं तो बिहार सरकार के लिए खतरे की घंटी है। बिहार सरकार भले कोरोना को रोकने का जैसा भी दावा करे पर हकीकत यह है कि बड़ी मुश्किल से मरते खपते लोग अपने घर पहुंचे हैं और वहां भी भगवान भरोसे हैं।

सो, कोरोना वायरस की महामारी की अवधि में उनका जो अनुभव है वह चुनाव नतीजों पर बड़ा असर डालेगा। प्रवासी मजदूरों के अनुभव की वजह से यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि बिहार की महिला मतदाताओं का रवैया भी बदलेगा। अभी तक वे जाति से तटस्थ एक अलग कांस्टीटुएंसी की तरह बरताव कर रही थीं। पिछले दो-तीन चुनावों में उन्होंने जाति से हट कर नीतीश कुमार के लिए वोट किया। उनका वोट प्रतिशत भी ज्यादा रहा। पर कोरोना वायरस का संकट और उनके परिवार के पुरुष सदस्यों के बाहर से लौटने की परिघटना उनके वोटिंग बिहेवियर को प्रभावित करेगी।

अपने अपने कारणों से पार्टियों ने कोरोना वायरस के लिए लागू दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कराया है। हैरानी की बात है कि पार्टियों के साथ साथ चुनाव आयोग और प्रशासन भी पूरी तरह से लापरवाह दिख रहा है। चुनाव आयोग ने खुद कोरोना को लेकर दिशा-निर्देश तय किए हैं। उसके पर्यवेक्षक पूरे राज्य में घूम रहे हैं तो क्या वे यह नहीं देख रहे हैं कि रैलियों में या चुनाव प्रचार के दौरान कहीं भी उनके दिशा-निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है? लोग रैलियों में बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं, 90 फीसदी से ज्यादा लोग बिना मास्क के हैं और सैनिटाइजर कहीं पर नहीं दिख रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग के पालन का सवाल ही नहीं उठता है।

इस तरह की रैलियों को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया है, जिसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई है। लेकिन बिहार में किसी को इसकी चिंता नहीं दिख रही है। तभी इस बात का अंदेशा है कि चुनाव के बाद बिहार में कोरोना का विस्फोट हो सकता है। जिस अंदाज में कुछ पार्टियों के नेता संक्रमित हुए हैं उसे देखते हुए लग रहा है कि चुनाव और दिवाली-छठ का त्योहार खत्म होने के बाद बिहार में बड़ी सख्या में केसेज बढ़ेंगे और तब 94 फीसदी रिकवरी रेट की हकीकत भी पता चलेगी।

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