आंदोलनकारियों की कौन सुन रहा है? - Naya India
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आंदोलनकारियों की कौन सुन रहा है?

केंद्र सरकार के बनाए तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों को आंदोलन करते 20 दिन हो गए। शुरू में सरकार ने किसानों से बातचीत भी की पर पिछले एक हफ्ते से कोई वार्ता नहीं हुई है। गतिरोध बना हुआ है और सरकार के अपने कामकाज रूटीन के अंदाज में चल रहे हैं। किसान अपनी खेती-बाड़ी छोड़ कर दिल्ली की सीमा पर बैठे हैं। रबी की फसल का समय चल रहा है और कम से कम चार राज्यों के किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। दस डिग्री वाली ठंड में प्रदर्शन कर रहे किसानों में से कम से कम एक दर्जन किसानों की मौत हो चुकी है। दिल्ली को पांच तरफ से घेर कर हाईवे पर बैठे हजारों किसानों की वजह से एनसीआर के लोगों का दिल्ली आना-जाना मुहाल हुआ है। पर सरकार आराम से बैठी है। किसानो का आंदोलन शुरू हुआ तब तो सरकार हैदराबाद नगर निगम के प्रचार में बिजी थी। उससे फुरसत मिलने के बाद किसान आंदोलन को सुलझाने का आधा-अधूरा प्रयास शुरू हुआ।

असल में यहीं इस सरकार की रणनीति है। हर आंदोलन को लेकर सरकार का ऐसा ही रवैया देखने को मिला है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ किसान आंदोलन कर रहे हैं या यहीं एक बड़ा आंदोलन हुआ है। पिछले साढ़े छह साल में कई बड़े आंदोलन हुए हैं। यहां तक कि कोरोना वायरस के संकट के बीच भी आंदोलन हुए हैं पर सरकार ने आंदोलनों की अनदेखी करने की रणनीति बनाई है। सरकार मानती है कि किसी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो इसका मतलब होगा कि वह समस्या नहीं है। सो, छात्र आंदोलन, किसान आंदोलन, डॉक्टरों के आंदोलन, नर्सों के आंदोलन या सिविल सोसायटी के दूसरे आंदोलनों में सरकार यहीं रवैया अख्तियार करती है।

संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ हुआ आंदोलन इसकी एक मिसाल है। दिल्ली के शाहीन बाग में तीन महीने से ज्यादा समय तक आंदोलन चलता रहा था। सरकार के किसी प्रतिनिधि ने आंदोलनकारियों से बात तक करना जरूरी नहीं समझा। सिर्फ मीडिया में बयानबाजी होती रही। शहर के दो हिस्सों को जोड़ने वाली सड़क पर आंदोलनकारी बैठे थे और लाखों लोग हर दिन मुसीबत झेल रहे थे। उस नजरिए से भी सरकार ने आंदोलन को खत्म कराने के लिए बातचीत करने की पहल नहीं की। दिल्ली के शाहीन बाग जैसे हजारों आंदोलन देश के दूसरे हिस्सों में चल रहे थे। सबसे ज्यादा तीव्र आंदोलन असम और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में था। वहां आंदोलनकारी इस कानून को असम की संस्कृति पर हमला बता रहे थे। इसके बावजूद सरकार ने आंदोलन खत्म कराने की कोई पहल नहीं की। वह तो संयोग था कि कोरोना वायरस की महामारी आ गई और दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर असम तक आंदोलन स्थगित हो गया।

अब असम में फिर से आंदोलन शुरू हो गया है। कोरोना के केसेज कम होने के बाद एक बार फिर राज्य की सिविल सोसायटी आंदोलन पर उतर गई है। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन से लेकर असम जातीयतावादी छात्र युवा परिषद, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, लाचित सेना सहित 18 संगठनों ने 11 दिसंबर को फिर से आंदोलन शुरू किया। संशोधित नागरिकता कानून के एक साल पूरे होने के मौके पर असम में वापस आंदोलन शुरू हुए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह कानून राज्य की पहचान, भाषा और संस्कृति के खिलाफ है। लेकिन राज्य सरकार, केंद्र सरकार और भाजपा को इसकी परवाह नहीं है। पूरी पार्टी और सरकार पिछले एक महीने बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के चुनाव में बिजी रही और अब अगले साल होने वाले चुनाव की तैयारी में बिजी हो रही है। सरकार मदरसों के सामान्य स्कूल में बदलने और लव जिहाद रोकने जैसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के एजेंडे पर काम कर रही है।

अगर सिर्फ अभी की बात करें तो पूरे देश में कई आंदोलन चल रहे हैं। लेकिन सरकार सबसे बेपरवाह है। राष्ट्रीय राजधानी में डॉक्टरों ने प्रदर्शन किया है। आयुर्वेद के चिकित्सकों को सर्जरी करने की मंजूरी देने के फैसले के खिलाफ आंदोलनों ने प्रदर्शन किया है। लेकिन लग नहीं रहा है कि सरकार इस फैसले पर फिर से विचार करने के मूड में है। सो, डॉक्टर आंदोलन करते रहेंगे और सरकार आयुर्वेद के चिकित्सकों को सर्जरी के अधिकार दे देगी। चूंकि सरकार नए मेडिकल कॉलेज नहीं खोल सकती है और जरूरत के मुताबिक डॉक्टर नहीं पैदा कर सकती है तो आयुर्वेद के चिकित्सकों को ही सर्जरी की इजाजत दे देगी। हो सकता है कि दूसरी वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े लोगों, जिनमें होमियोपैथी, यूनानी चिकित्सक शामिल हैं, उनको भी सर्जरी की इजाजत दे देगी।

कोरोना वायरस के इस संकट के समय देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की नर्सों ने बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी है। वे बरसों से लंबित अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रही हैं। उनको अभी तक छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक भी पैसे नहीं मिल रहे हैं। उनसे बात करके उनके आंदोलन को खत्म कराने की बजाय भारत सरकार ने उनको कोड ऑफ कंडक्ट का हवाला देकर डराना-धमकाना शुरू कर दिया है। इससे पहले अक्टूबर में दिल्ली के तीन बड़े मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने वेतन-भत्तों को लेकर आंदोलन किया था। तीन हफ्ते तक उनका आंदोलन चलता रहा था और सरकार ने उसकी कोई परवाह नहीं की।

असल में भारत की मौजूदा सरकार दिल्ली में हुए दो आंदोलनों की ‘कोलेटरल बेनिफिशियरी’ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और निर्भया कांड के बाद हुए आंदोलन का नेतृत्व दूसरे लोगों ने किया और भाजपा को बैठे-बिठाए उसका लाभ मिल गया। तभी से इस सरकार के कर्ता-धर्ता नेताओं को लगता है कि लोकप्रिय आंदोलन चुनी हुई सरकारों के लिए नुकसानदेह होते हैं। लोकतंत्र के लिए भले कितना भी जरूरी हों पर सरकारों के लिए ठीक नहीं हैं। इसलिए सरकार ने तय किया कि कोई आंदोलन होने नहीं देना है और अगर होता है तो उसकी साख बिगाड़नी है, उसे टुकड़े टुकड़े गैंग का आंदोलन बताना है, पाकिस्तान-चीन समर्थक आंदोलन बताना है, देशद्रोहियों का आंदोलन बताना है, खालिस्तान का आंदोलन बताना है और उसकी अनदेखी भी करते रहना है। हर आंदोलन के साथ इस सरकार ने यहीं बरताव किया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि ज्यादातर आंदोलन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे। सरकार इसे अपनी सफलता मान रही है पर असल में यह उसकी विफलता है। लोकतंत्र में लोकप्रिय भावनाओं को दबाने का जितना प्रयास किया जाता है वे उतनी ही मजबूत होती हैं और अंत में सरकारों को उसका खामियाजा भुगतान पड़ता है।

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