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Saturday, April 17, 2021
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क्षेत्रवाद की नई होड़ शुरू होगी

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ऐलान किया है कि उनकी सरकार ऐसा कानून लाने जा रही है, जिसके जरिए राज्य की सरकारी नौकरियां मध्य प्रदेश के युवाओं को ही मिलेंगी। इस तरह की घोषणा करने वाला मध्य प्रदेश देश का संभवतः पहला राज्य बन गया है। इससे पहले कई राज्यों ने निजी नौकरियों खास कर औद्योगिक इकाइयों में स्थानीय युवाओं को नौकरी दिलाने के वादे किए और कुछ ने कानून भी बनाया पर ज्यादातर जगहों पर उस कानून पर अमल नहीं हो सका। यह पहला मौका है, जब किसी सरकार ने सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों को सौ फीसदी आरक्षण का ऐलान किया है।

सबसे पहले कानूनी व संवैधानिक रूप से इसे मंजूर किए जाने की संभावना पर विचार होना चाहिए। भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 (2) में बहुत साफ साफ लिखा हुआ है कि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता है। सो, सिर्फ जन्म स्थान के आधार पर अगर किसी के साथ नौकरी देने में भेदभाव होता है तो इसे अदालत में चुनौती मिल जाएगी और ज्यादा संभावना इस बात की है कि कानून रद्द कर दिया जाएगा। अभी तक राज्य सरकार ने सिर्फ घोषणा की है, कोई कानूनी मसौदा तैयार नहीं हुआ है इसलिए यह समझना थोड़ा मुश्किल है कि आखिर सरकार इसे किस रूप में ले आएगी। परंतु यह पहली नजर में लग रहा है कि अगर संविधान में संशोधन नहीं होता है तो इस किस्म को आरक्षण को मंजूर कराना मुश्किल होगा।

तभी यह भी कहा जा रहा है कि राज्य में 27 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव से पहले मुख्यमंत्री ने यह एक बड़ा दांव खेला है, जिसका फायद उपचुनाव में हो सकता है। उसके बाद भले कानून हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट निरस्त कर दे। लेकिन इस प्रक्रिया में इतना समय मिल जाएगा कि उपचुनाव हो जाएं। ध्यान रहे महाराष्ट्र में चुनाव से पहले मराठों को और हरियाणा में चुनाव से पहले जाटों को जातीय आरक्षण का कानून बनाया गया था, जो अदालतों में जाकर अटक गया। उसी तरह स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों में सौ फीसदी आरक्षण देने का मामला भी अदालत में अटक सकता है।

पर इससे क्षेत्रवाद की नई होड़ शुरू हो सकती है। अस्मिता की राजनीति करने वाले प्रादेशिक नेताओं को मौका मिल जाएगा कि वे सरकारों पर दबाव बनाएं या अगर खुद सरकार में हैं तो इस तरह के कानून बनाएं। ध्यान रहे पहले निजी क्षेत्र में नौकरियों के लिए इस किस्म के कानून कई राज्यों ने बनाए थे। गुजरात जैसे औद्योगिक राज्य ने 1995 में ही अपने स्थानीय युवाओं को औद्योगिक इकाइयों की नौकरी में 75 फीसदी आरक्षण देने के कानून का मसौदा पेश किया था। पर उस पर कभी अमल नहीं हो सका। मध्य प्रदेश में भी पिछले ही साल तब के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने औद्योगिक क्षेत्र में मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए 75 फीसदी नौकरी आरक्षित करने की घोषणा की थी। कर्नाटक ने 2014 में इस तरह का कानून बनाया था और आंध्र प्रदेश में भी मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए इस तरह का कानून पेश किया।

औद्योगिक इकाइयों में नौकरी आरक्षित करना सरकारी नौकरियों के आरक्षण से अलग है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की घोषणा शुद्ध रूप से कानूनी और संवैधानिक मामला है। पर उद्योगों और कारोबारियों के यहां नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था करने से पहले उनकी मर्जी और उनकी जरूरत को जानना भी जरूरी है। देश के ज्यादातर उद्योगपति और कारोबारी इस पक्ष में नहीं हैं कि उनके ऊपर स्थानीय लोगों को भरती करने की बंदिश लगाई जाए। यहीं कारण है कि गुजरात से लेकर कर्नाटक तक कहीं भी आरक्षण की नीति पर अमल नहीं हो पाता है।

कंपनियां अंत में अपनी जरूरत के हिसाब से योग्य लोगों को ही भरती करती हैं। कम से कम निजी सेक्टर में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की घोषणा अभी तक तो चुनावी वादे की तरह ही दिख रहा है। गुजरात में 1995 में ही नीति आने के बाद उस पर कभी अमल नहीं हुआ। सूरत से लेकर जामनगर और बड़ौदा से लेकर अहमदाबाद तक फैक्टरियों, कारखानों में बिहार, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, बंगाल के मजदूरों, पेशेवरों की भरमार है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे बरसों से मराठी लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण की मांग करते रहे रहे हैं पर किसी सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी। इसका कारण यह है कि महाराष्ट्र हो या तमिलनाडु जैसा औद्योगिक राज्य हो अगर वहां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई तो क्वालिटी मैनपावर की कमी पड़ सकती है। जरूरी नहीं है कि स्थानीय लोग हर काम के लिए फिट मिलें। तभी कंपनियां स्थानीय आरक्षण की बजाय अखिल भारतीय टैलेंट पुल में से अपनी जरूरत का मैनपावर छांटने का विकल्प खुला रखना चाहती हैं।

सो, चाहे सरकारी नौकरी में हो या निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के लिए नौकरी आरक्षित करने की बात हो, इसमें कई तरह की अड़चनें हैं। कानूनी और संवैधानिक अड़चन सबसे पहले है। उसके बाद योग्यता और क्षमता का पैमाना आता है। स्थानीय युवाओं के लिए आरक्षण लागू करने से योग्यता व क्षमता के पैमाने से समझौता करना पड़ सकता है। तीसरी अड़चन यह है कि भारत का संघीय ढांचा इस तरह के कानूनों का बोझ नहीं बरदाश्त कर सकता है। एक बार यह पंडोरा बॉक्स खुला तो हर राज्य अपने यहां अस्मिता की राजनीति को हवा देगा और स्थानीय लोगों के लिए पढ़ाई से लेकर, निजी व सरकारी नौकरी और कारोबार में भी आरक्षण की व्यवस्था शुरू कर देगा। इससे संघीय ढांचा चरमराएगा और जिस विविधता को भारत की ताकत बताते हैं वह भारत की कमजोरी बन जाएगी।

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