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Saturday, April 17, 2021
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अब कैसे लड़ी जाए कोरोना की लड़ाई?

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कोरोना वायरस के खिलाफ क्या भारत को अपनी लड़ाई का तरीका और तीव्रता दोनों बदलने की जरूरत है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि भारत में कोरोना वायरस के संक्रमितों की सख्या 11 लाख से ऊपर पहुंच गई है। अब हर तीन दिन में एक लाख नए केसेज आ रहे हैं और अगर संक्रमण बढ़ने की यहीं रफ्तार रही तो जल्दी ही दो दिन में एक लाख केसेज आने लगेंगे। इस रफ्तार से संक्रमण का बढ़ना इसलिए चिंता की बात है कि भारत में हो रहे हर प्रोजेक्शन में कहा जा रहा है कि सितंबर में भारत में संक्रमण का पीक आएगा। हालांकि दुनिया के दूसरे प्रतिष्ठित संस्थानों का कहना है कि पीक अगले साल फरवरी तक आने की संभावना है। अगर अगले एक दो महीने में कोरोना वायरस की वैक्सीन नहीं आती है और मामले इसी रफ्तार से बढ़ते रहे तो भारत में अगस्त के अंत तक 25 लाख से ज्यादा मामले होंगे और अगर इनमें से 25 फीसदी को भी अस्पताल में रखना हुआ तो बड़ी आफत हो जाएगी।

इसलिए अब भारत को कोरोना के खिलाफ अपनी लड़ाई का तरीका बदलना होगा। अब तक एक तरीका यह बताया जा रहा था कि टेस्टिंग ज्यादा हो और कांटैक्ट ट्रेसिंग हो और फिर ट्रीटमेंट हो। अब इसमें से कांटैक्ट ट्रेसिंग को हटाना होगा या उस पर से ध्यान कम करना होगा। अब जबकि हर दिन 35 से 40 हजार के बीच केसेज आने लगे तो इतने लोगों की कांटैक्ट ट्रेसिंग का सिस्टम सरकार के पास नहीं है। किसी भी सरकार के पास इतने लोग नहीं हैं कि वह उनके जरिए हर संक्रमित की कांटैक्ट ट्रेसिंग करा सके। दुनिया के जिन देशों ने इस फार्मूले पर काम किया उन्होंने बड़ी संख्या में वालंटियर्स की सेवा ली या बड़ी संख्या में लोगों को इसी काम के लिए भरती किया। भारत ने कोई बहाली नहीं है की इसलिए मौजूदा मैनपावर के ऊपर बोझ बढ़ाना उचित नहीं है।

इसलिए सरकारों को चाहिए कि तत्काल टेस्टिंग बढ़ा दे और कांटैक्ट ट्रेसिंग की बजाय इस बात का प्रचार शुरू हो कि लोग खुद ब खुद टेस्टिंग के लिए आगे आएं। हर संक्रमित और उसके परिजनों को ही कहा जाए कि वे खुद अपने संपर्क में आए लोगों को सूचना दें और जांच के लिए कहें। ज्यादातर संक्रमित लोगों को होम क्वरैंटाइन किया जा रहा है वे क्वरैंटाइन रहते हुए अपने संपर्क में आए लोगों को सिर्फ यह जानकारी दे दें कि वे कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं तो वे खुद ही जांच के लिए आगे आएंगे।

यह तय मानें कि भारत सरकार को तत्काल टेस्टिंग की कैपिसिटी बढ़ानी होगी। अगर 40 हजार केसेज एक दिन में आने लगते हैं और हर आदमी के संपर्क में औसतन दस आदमी के आए होने की कल्पना करें तो चार लाख सैंपल तो इन्हीं के टेस्ट करने होंगे। इसी औसत को आधार बना कर सरकार को टेस्टिंग की सुविधा बढ़ानी होगी ताकि संक्रमितों के संपर्क में आए लोग सुविधा और आसानी के साथ जांच करा सकें। इसके अलावा भी जिनको लगता है कि वे संक्रमित हुए हैं या जिनमें कोरोना को लक्षण दिख रहे हैं उन्हें आसानी से जांच की सुविधा मिलनी चाहिए। मौजूदा स्थिति में हर आदमी जांच में होने वाली मुश्किल और देरी का रोना रोता दिख रहा है। सो, कोरोना से लड़ाई जीतने के लिए सबसे पहले जांच की सुविधा बेहतर करनी होगी और क्षमता बढ़ानी होगी।

इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल बड़े सुधार करने होंगे। क्योंकि अब कोरोना के मामले महानगरों और बड़े शहरों से निकल कर छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में फैल रहे हैं। महाराष्ट्र में तीन लाख केसेज हैं, जिनमें से एक लाख मामले मुंबई के हैं और दो लाख दूसरे जिलों के हैं। इन दूर-दराज के जिले भी शामिल हैं, जहां गांवों और कस्बों में संक्रमण फैल रहा है। इसी तरह बिहार में राजधानी पटना के साथ साथ दूर-दराज के गांवों में भी, जहां बाहर से लोग पहुंचे हैं वहां कोरोना का संक्रमण पहुंच गया है। इसलिए छोटी जगहों पर टेस्टिंग की सुविधा बढ़ानी होगी और वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार करना होगा। कोरोना वायरस के इलाज के लिए ऑपरेशन थिएटर लगाने या बहुत जटिल मशीनरी की जरूरत नहीं है। ज्यादातर मामलों में सिर्फ ऑक्सीजन की जरूरत है। अगर ऑक्सीजन के पर्याप्त सिलिंडर सब जगह पहुंचा दिए जाएं और जिलों में गिनती के भी वेंटिलेटर पहुंच जाएं तो लोगों को मरने से आसानी से बचाया जा सकता है। अगर लोगों को मरने से बचा लिया गया तो संक्रमण फैलने की ज्यादा चिंता नहीं रह जाएगी।

टेस्टिंग और इलाज की बेसिक सुविधा के साथ साथ अब सरकार को इसके आर्थिक पक्ष पर गंभीरता से विचार करना होगा। सरकार को मेडिकल सुविधाओं में निवेश के साथ साथ लोगों के हाथ में पैसा पहुंचाने पर ध्यान देना होगा। लोगों के हाथ में पैसे नहीं होंगे तो किसी हाल में मांग नहीं बढ़ने वाली है और अगर मांग नहीं बढ़ी तो सप्लाई साइड को मजबूत करने के लिए सरकार जो भी कदम उठा रही है वह काम नहीं आएगा। सरकार ने जो भारी भरकम पैकेज दिया है वह सब बेकार है अगर बाजार में मांग नहीं होती है और जुलाई महीने की कहानी मांग खत्म होने की ही है। मई-जून में प्रधानमंत्री को जो ‘हरी कोंपलें’ दिख रही थीं वह सूखने लगी है। हर सेक्टर में मांग लगभग खत्म हो गई है और जैसा कि रघुराम राजन ने कहा था कि छह महीने में बैंकों की एनपीए में अभूतपूर्व बढ़ोतरी होगी, उसकी भी रिपोर्ट आने लगी है। सिर्फ जून के महीने में किश्त बाउंस के मामले 45 फीसदी पहुंच गए हैं। 35 हजार करोड़ रुपए के आसपास की किश्तें बाउंस हुई हैं। यह मध्य वर्ग के बड़े संकट का संकेत है, जिसे सरकार को समझना चाहिए।

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