कोरोना की सचाई कैसे पता चलेगी?

भारत में किसी भी मामले की सचाई का पता चलना बहुत मुश्किल काम होता है। भारत में दशकों से पारदर्शिता की बहस चल रही है और इसलिए सूचना के अधिकार कानून की परिकल्पना की गई थी पर वह कानून अब शोपीस बन कर रह गया है। पारदर्शिता के लिए आरटीआई की जो छोटी से खिड़की खोली गई थी उस पर मोटा परदा डाल दिया गया है। तभी लग नहीं रहा है कि सरकार के बाकी दूसरे कामकाज की तरह कोरोना वायरस के संक्रमण की सचाई भी कभी सामने आ पाएगी।

कहा जा सकता है कि कोरोना की ऐसी कौन सी सचाई है, जो देश के लोगों का जाननी चाहिए और वे नहीं जान पा रहे हैं? सारी बातें तो बताई ही जा रही हैं! रोज कितने टेस्ट हुए, अब तक कितने टेस्ट हो चुके, रोज कितने मरीज आ रहे हैं, अब तक कितने ठीक हो गए और कितने मर गए, संक्रमण की दर क्या है, ठीक होने की दर क्या है, मृत्यु दर क्या है, ये सब बताया तो जा रहा है, अब क्या जानना जरूरी है? हां, पीएम-केयर्स के बारे में ज्यादा नहीं बताया जा रहा है पर उससे भी कोरोना के खिलाफ लड़ाई पर क्या असर पड़ रहा है? ये सब बातें अपनी जगह ठीक हैं पर इन्हीं बातों की सचाई की पड़ताल जरूरी है और वह इसलिए जरूरी है क्योंकि ये आंकड़े दे रही एजेंसियां खुद ही कंफ्यूजन पैदा कर रही हैं और अलग अलग बातें कर रही हैं। दूसरे, ये एजेंसियां जिस तरह के अनुमान जाहिर कर रहे हैं, उनके पहले गलत साबित होने का इतिहास रहा है। इसलिए भी इन पर सवाल उठ रहा है।

इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर ने 11 मई से चार जून के बीच देश के रैंडम चुने गए 69 जिलों में सीरो सर्वे कराया था। पिछले दिनों उसकी जो रिपोर्ट जारी हुई है उसमें कहा गया है कि उस समय देश में कम से कम 64 लाख लोग कोरोना वायरस से संक्रमित थे। यह उस समय का आंकड़ा है, जब देश में कोरोना वायरस के संक्रमितों की संख्या दो लाख पहुंची थी। इस सीरो सर्वे की अवधि लॉकडाउन के चौथे चरण की है, जब धीरे धीरे कुछ सेवाएं शुरू होने लगी थीं। लेकिन मोटे तौर पर देश 70 दिन के सख्त लॉकडाउन में रहा था। उस समय आधिकारिक आंकड़ा दो लाख लोगों के संक्रमित होने का था और हर दिन नौ हजार के करीब केसेज रोज आ रहे थे। लेकिन सीरो सर्वे में बताया जा रहा है कि 64 लाख लोग संक्रमित हो चुके थे।

सोचें, जब जून के पहले हफ्ते में जब अनलॉक शुरू हो रहा था और देश में 64 लाख लोग संक्रमित हो चुके थे, तो अभी देश में संक्रमितों की वास्तविक संख्या क्या होनी चाहिए? अगर आईसीएमआर के अपने आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो उसका कहना है कि एक पॉजिटिव टेस्ट के पीछे 80 से 130 पॉजिटिव छूट रहे हैं। यानी जांच के दायरे से बाहर रह जा रहे हैं। इस अनुमान के मुताबिक अगर सबसे न्यूनतम आंकड़े का छोर पकड़ें तो अभी जितने केसेज आ रहे हैं उसके 80 गुना केस रोज आना चाहिए और वास्तविक संख्या भी 80 गुना ज्यादा होनी चाहिए। यानी हर दिन 80 लाख केसेज आने चाहिए और देश में अब तक 40 करोड़ लोगों को संक्रमित हो गया होना चाहिए। अगर 80 से 130 के बीच का औसत निकाल कर 105 गुना करें तो एक करोड़ पांच लाख केसज रोज आने चाहिए।

इस सीरो सर्वे पर भरोसा करें तो पहला सवाल तो यह उठता है कि देश में लागू किया गया दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन किस काम आया? अगर अप्रैल-मई दो महीने के सख्त लॉकडाउन के बावजूद 64 लाख लोगों में संक्रमण हो गया था तो इसका मतलब है कि लॉकडाउन कारगर नहीं हुआ। दूसरा, निष्कर्ष यह है कि जून के बाद से शुरू हुए अनलॉक में संक्रमितों की संख्या दिन-दून रात चौगुनी बढ़ी। फिर सवाल है कि यह बढ़त टेस्टिंग में या केसेज की संख्या में क्यों नहीं दिखी? इसका का एक कारण टेस्टिंग को माना जा सकता है। प्रति दस लाख की आबादी पर टेस्टिंग के मामले में भारत दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में से एक है।

परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि सर्वे करने वाली एजेंसियों का अनुमान गलत हो। इससे पहले इनके अनुमान गलत साबित हो चुके हैं। ध्यान रहे 2002 में जब दुनिया में एचआईवी-एड्स का हल्ला मचा था, तब भारत के बारे में इसी किस्म के सर्वेक्षणों के जरिए अनुमान लगाया गया था कि भारत में ढाई करोड़ एचआईवी संक्रमित हैं। बाद में भारत सरकार ने आम लोगों के बीच सर्वेक्षण के लिए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे, एनएफएचएस के मॉडल का सहारा लिया और आश्चर्यजनक रूप से एचआईवी संक्रमितों का आंकड़ा ढाई करोड़ से घट कर 25 लाख पर आ गया। बाद में यहीं असलियत भी निकली। यानी पहला अनुमान वास्तविकता से दस गुना ज्यादा था। इसलिए इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कोरोना वायरस के संक्रमितों का जो अनुमान लगाया जा रहा है वह भी सही नहीं हो।

यह अंदेशा जताने का कारण भारत में संक्रमण की वास्तविक दर है। अगर संक्रमण की वास्तविक दर दस फीसदी से कम है और सीरो सर्वे का अनुमान देश की एक-तिहाई आबादी के संक्रमित हो जाने का है तो आंकड़ों का यह फर्क बहुत बड़ा है। अगर यह मानें कि भारत में 40 से 50 करोड़ लोग संक्रमित हो गए हैं तो वास्तविक आंकड़ा किसी हाल में एक लाख से कम रोजाना संक्रमण का नहीं हो सकता है। इसलिए ऐसा लग रहा है कि सारी एजेंसियां धूल में लट्ठ मार रही हैं। अंदाजे से आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। कम टेस्टिंग की जा रही है ताकि कम लोगों का संक्रमण दिखे और सीरो सर्वे के आधार पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को संक्रमित बता कर यह मैसेज दिया जा रहा है कि यह कोई बीमारी नहीं है, सब लोग अपने आप ठीक हो रहे हैं। यह बिना सोचे समझे किए जा रहे अनलॉक को जस्टिफाई करने का एक तरीका हो सकता है ताकि लोग मानें कि अब हर्ड इम्यूनिटी जैसी किसी चीज को हासिल किया जा चुका है।

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