वैक्सीन निर्माण में जल्दबाजी खतरनाक

ज्ञात इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी बीमारी की दवा या वैक्सीन खोजने की ऐसी होड़ मची हो। यह भी एक तथ्य है कि इससे पहले जो वैक्सीन सबसे कम समय में तैयार हुई थी, उसमें भी पांच साल लगे थे। लेकिन इस बार दुनिया के तमाम वैज्ञानिक, डॉक्टर, दवा कंपनियां, मेडिकल लैबोरेटरी दावा कर रहे हैं कि कोविड-19 की वैक्सीन 12 से 18 महीने में आ जाएगी। 12 से 18 महीने की समय सीमा का मतलब है कि पिछले साल दिसंबर में कोरोना वायरस के संक्रमण का पहला मामला आया था उसके एक साल बाद यानी दिसंबर 2020 से लेकर जून 2021 के बीच वैक्सीन बन कर तैयार होगी। उसके बाद करोड़ों की संख्या में इसके तैयार होने और दुनिया भर में पहुंचने में भी बहुत समय लगना है।

पर दुनिया को हैरान करते हुए भारत में मेडिकल रिसर्च की सर्वोच्च संस्था इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर ने इस साल 15 अगस्त तक वैक्सीन लांच करने की बात कह दी। हालांकि आईसीएमआर की ओर से इस पर कई तरह की सफाई दी गई है पर उस सफाई के बावजूद आईसीएमआर का मानना है कि 15 अगस्त यानी भारत के स्वतंत्रता दिवस तक वैक्सीन तैयार हो जाएगी। आईसीएमआर ने जो सफाई दी है वह वैक्सीन के गुण-दोष पर नहीं है, बल्कि 15 अगस्त की डेडलाइन तय करने की जबरदस्ती पर है।

असल में आईसीएमआर की ओर से 12 लैब्स को लिखी एक चिट्ठी सार्वजनिक हो गई है, जिसमें उनसे कहा गया है कि वे परीक्षण की प्रक्रिया को जल्दी शुरू करें और जल्दी पूरा करें ताकि 15 अगस्त तक इसे लांच किया जा सके। जब चिट्ठी सार्वजनिक हुई तो कहा गया कि लालफीताशाही कम करने के लिए इस तरह की बात चिट्ठी में लिखी गई थी। चिट्ठी में यहां तक लिखा गया था कि अगर आईसीएमआर की बात की अनदेखी हुई तो नतीजे गंभीर होंगे। सोचें, वैश्विक महामारी के लिए चल रहे वैक्सीन के ट्रायल में जल्दबाजी के लिए इस किस्म की धमकी दी गई। इस धमकी पर भी कहा गया है कि लाल फीताशाही कम करने के लिए ऐसा कहा गया। सवाल है कि लाल फीताशाही है कहां? केंद्र की सरकार का तो दावा है कि उसने नौकरशाही की नकेल कस दी है और लाल फीताशाही को खत्म करा दिया है!

समझने की जरूरत है कि वैक्सीन बनाना कोई सड़क निर्माण या भवन निर्माण का काम नहीं है, जिसमें ज्यादा मजदूर लगा कर या ज्यादा सामग्री और मशीनरी जुटा कर निर्माण का काम जल्दी पूरा कर दिया जाएगा। यह प्रचलित कथन है कि नौ महिलाएं मिल कर एक महीने में बच्चा पैदा नहीं कर सकती हैं, बच्चा पैदा होने की प्रक्रिया नौ महीने में पूरी होती है तो उतना समय उसमें लगेगा ही। इसी तरह वैक्सीन बनाने का काम है। इसमें लैब से लेकर क्लीनिकल और ह्यूमन ट्रायल का एक निश्चित मानक है, तय प्रोटोकॉल है, निश्चित समयावधि है, जिसका उल्लंघन बहुत खतरनाक नतीजे देने वाला हो सकता है। इसमें नौकरशाही या लाल फीताशाही का कोई मतलब नहीं होता है। किसी भी लैब में वैक्सीन तैयार करते समय तय मानकों का पालन करना ही है।

वायरस का स्ट्रेन अलग करने से लेकर जानवरों पर परीक्षण और उसके बाद इंसानों पर परीक्षण के कई चरणों से इसे गुजरना होता है। इंसानों पर पहला परीक्षण तो सिर्फ इस बात का होता है कि इसका कोई साइड इफेक्ट तो नहीं है। परीक्षण के लिए प्रस्तुत वालंटियर्स को टीका देकर तीन महीने तक इंतजार किया जाता है कि उस पर कोई साइड इफेक्ट न हो। उसके बाद दूसरा परीक्षण टीके का असर देखने के लिए किया जाता है। पुराने जमाने में टीका देकर लोगों को खुला छोड़ दिया जाता था कि वे संक्रमितों के संपर्क में आएं। उन पर नजर रखी जाती थी कि वे संक्रमित होते हैं या नहीं। अगर कोई भी व्यक्ति संक्रमित नहीं हुआ तब भी यह नहीं माना जाता था कि ऐसा टीके की वजह से हुआ है।

इस बात की भी संभावना रहती थी कि वालंटियर्स किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया ही नहीं हो या आया तो उसे संक्रमण नहीं लगा हो या इम्युन सिस्टम इतना मजबूत हो कि उसे संक्रमण लगा हो तब भी खुद ही ठीक हो गया है। तभी परीक्षण का यह चरण काफी लंबा चलता था। पर अब जल्दबाजी है इसलिए जानवरों पर परीक्षण और साइड इफेक्ट के परीक्षण के बाद वालंटियर्स को अपनी देख-रेख में संक्रमित कराया जाता है और इस बात का परीक्षण किया जाता है कि उसका शरीर कैसी प्रतिक्रिया देता है। यह बहुत जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है।

इसलिए इसे किसी समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। दुनिया के अमीर, सभ्य और विकसित देश, जहां लोगों की एक-एक जान की कीमत है वहां भी भले मूर्ख और अहंकारी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हैं पर उन्होंने भी वैज्ञानिकों पर दबाव नहीं डाला कि वैक्सीन जल्दी तैयार कराई जाए। अमेरिका ने नहीं कहा कि चार जुलाई को उसका स्वतंत्रता दिवस है तो उस दिन वैक्सीन लांच कर देनी है, जबकि उसने वैक्सीन के लिए ब्रिटेन की कंपनी एस्ट्रोजेनेका से 30 करोड़ डोज का सौदा भी कर लिया है और पैसे भी दे दिए हैं। यह सिर्फ भारत में देखने को मिला है कि समय सीमा देकर वैक्सीन तैयार करने को कहा जा रहा है। याद करें कैसे इसरो के चंद्रयान के समय तमाशा क्रिएट किया गया था। बड़ा इवेंट बनाने के चक्कर में कई चीजों की अनदेखी हुई थी। प्रधानमंत्री खुद लांच देखने चले गए थे और लांच फेल हो गया था। उससे सबक लेना चाहिए और वैज्ञानिक प्रक्रिया को उसकी रफ्तार से चलने देना चाहिए। उसे इवेंट नहीं बनाना चाहिए। वैक्सीन को अगर इवेंट बनाया गया तो लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है।

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