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मोदी-शी की वार्ता से क्या मिला?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग के साथ दो साल में दूसरी बार अनौपचारिक वार्ता की। 11 और 12 अक्टूबर को तमिलनाडु के ऐतिहासिक शहर ममल्लापुरम में दोनों नेताओं के बीच दूसरी वार्ता हुई। अलग अलग टुकड़ों में छह घंटे से ज्यादा समय तक दोनों ने एक दूसरे से बात की। इतनी लंबी वार्ता से क्या हासिल हुआ यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘चेन्नई कनेक्ट’ की बात कही और दोनों देशों के बेहतर संबंधों का दावा किया।

बाद में विदेश सचिव विजय गोखले ने प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि कारोबार संतुलन को ठीक करने के लिए दोनों देश एक तंत्र बनाने पर सहमत हुए हैं। पर कुल मिला कर अनौपचारिक वार्ता से कुछ ठोस हासिल होने की बजाय माहौल बेहतर होना का संदेश गया है। यह संदेश गया है कि दोनों देशों के नेता एक दूसरे करीब हैं, दोस्ताना माहौल में बात कर सकते हैं और दोनों देशों के बीच हर मसले पर बात करने का तंत्र मौजूद है। इसके अलावा कुछ ठोस हासिल का दावा नहीं किया जा सकता है। दोनों के संबंध ऐसे हैं, जिसमें कुछ ठोस हासिल नहीं किया जा सकता है।

कुछ ठोस हासिल करने के लिए भारत को सख्ती दिखानी होगी। चीन से असहज सवाल पूछने होंगे। उसके सामने अगर भारत दो टूक अंदाज में कहता कि जम्मू कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है तो चीन ने क्यों संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में उसे ले गया? भारत कहता कि वह चीन से आने वाला सामानों पर ऊंचा शुल्क लगाएगा क्योंकि चीनी सामानों की वजह से कारोबार असंतुलन बना है। तब पता चलता है कि दोनों के संबंधों में कितनी गहराई है या चीन हमारे हितों का कितना ध्यान रखता है। ध्यान रहे भारत जितने का सामान चीन को बेचता है, चीन उसका पांच गुना सामान भारत को बेचता है। दोनों के बीच सात लाख करोड़ रुपए का कारोबार असंतुलन है।

भारत का दौरा खत्म करके राष्ट्रपति शी जिनफिंग नेपाल गए। सब जानते हैं कि रणनीतिक रूप से नेपाल और भारत कितने जुड़े हुए हैं। हालांकि पिछले कुछ समय में चीन और पाकिस्तान की ही कूटनीति के चलते नेपाल और भारत में दूरी बढ़ी है। तभी माना जा रहा है कि भारत के बाद नेपाल को अपनी यात्रा के लिए शी ने किसी खास मकसद से चुना। उन्होंने नेपाल के साथ 18 समझौते किए। प्रत्यर्पण को लेकर भी एक साझा तंत्र बनाने पर विचार हुआ।

सबसे बड़ी बात यह है कि चीन ने नेपाल के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को अपग्रेड किया और उसे रणनीतिक सहयोगी का दर्जा दिया। सोचें, नेपाल के साथ चीन का क्या रणनीतिक सहयोग हो सकता है, सिवाए इसके कि दक्षिण एशिया में उसे भारत पर नजर रखनी है और भारत की गतिविधियों को नियंत्रित रखना है। जिस तरह का संबंध चीन नेपाल के साथ बना रहा है वैसा ही संबंध उसने भारत के दूसरे पड़ोसियों से विकसित किए हैं। वह भूटान के साथ संबंधों को अपग्रेड कर रहा है। डोकलाम के 2017 के विवाद के बाद वह इस प्रयास में लगा है कि भूटान ने अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए जो करार भारत से किया वह चीन से कर ले। इसके अलावा श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में भी चीन बहुत सक्रिय है। वहां बड़े निवेश किए जा रहे हैं और उन्हें रणनीतिक सहयोगी बनाया जा रहा है।

भारत के बाद नेपाला जाना ही एक प्रतीकात्मक महत्व की बात नहीं है। भारत आने से ठीक पहले वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और वहां के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से मिल कर आए थे। 11 अक्टूबर को भारत आने से एक दिन पहले इमरान खान से शी की मुलाकात हुई थी और शी ने कहा था कि पाकिस्तान के साथ चीन की दोस्ती अटूट है और दुनिया की बदलती व्यवस्था इस पर कोई असर नहीं डाल पाएगी। भारत के लिए इतना इशारा काफी होना चाहिए। तभी भारत के साथ वार्ता में अगर चीन ने कश्मीर का मुद्दा नहीं उठाया तो यह सुनिश्चित किया कि भारत भी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की बात न करे।

इस बीच खबर है कि पाकिस्तान ने एक अध्यादेश के जरिए ग्वादर बंदरगाह पर चीन की गतिविधियों को करमुक्त कर दिया है। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे, सीपीईसी के लिए एक अलग व्यवस्था बनाई है ताकि उसके कामकाज में दिक्कत न आए। बदले में चीन उसकी पूरी मदद कर रहा है। अपनी मदद के बदले ही चीन ने पाकिस्तान को कुछ हथियारों का निर्यातक भी बना दिया है।

तभी यह कहने और मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भारत और चीन के बीच संबंध कोई बहुत मधुर या मजबूत नहीं है। दोनों पड़ोसी देश है और अपनी अपनी ताकत के दम पर एशिया में महाशक्ति हैं। दूसरे चीन के लिए भारत के 130 करोड़ लोग बड़ा बाजार हैं। इसलिए दोनों देशों की मजबूरी है कि वे एक दूसरे के साथ अच्छे संबंध रखें। या कम से कम यह दिखाएं कि दोनों में संबंध अच्छे हैं। पर हकीकत यह नहीं है। हकीकत यह है कि चीन पूरी शिद्दत से भारत को उसकी सीमाओं में घेरने के प्रयास में लगा है तो भारत भी अपनी तरफ से चीन की दुखती रग पर हाथ रखने का कोई मौका नहीं छोड़ता है।

ध्यान रहे भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिल कर चार देशों का एक एशिया प्रशांत का समूह बनाया है, जो दक्षिण चीन सागर में चीन के एकाधिकार को रोकने के लिए काम कर रहा है। सो, कुल मिला कर दोनों देश कामचलाऊ संबंध बनाए रखने के लिए एक-दूसरे से बात कर रहे हैं।

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