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Saturday, April 17, 2021
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ज्वालामुखी पर बैठा है यूरोप!

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समूचा यूरोप इस समय उबल रहा है। फ्रांस में दो लगातार आतंकवादी हमले के बाद ऑस्ट्रिया में आतंकवादी हमला हुआ है। फ्रांस में पहले भी हमले हो चुके हैं और स्पेन, ब्रिटेन भी आतंकी हमले का निशाना बने हैं। फ्रांस में हुए ताजा हमले के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जिस तरह इस्लामिक आतंकवाद को कठघरे में खड़ा किया और उस पर जिस तरह से पूरी दुनिया के मुसलमानों ने प्रतिक्रिया दी है वह एक बड़े विस्फोट की तैयारी का संकेत है। तभी यह सवाल है कि क्या दुनिया में सभ्यताओं के संघर्ष का समय आ गया? क्या इस्लाम और ईसाइयत के बीच निर्णायक लड़ाई की जमीन तैयार हो गई है? क्या इस लड़ाई की शुरुआत यूरोप से होगी और फिर एशिया, अफ्रीका और अमेरिका सब इसमें शामिल होंगे? क्या इस निर्णायक लड़ाई के दौरान दुनिया की पूरी आबादी की बाकी पहचान मिट जाएगी?

ऐसे अनगिनत सवाल हैं, जिनके जवाब आने वाले समय में मिलेंगे। पर मौजूदा समय की हकीकत है कि यूरोप में बड़ी खदबदाहट है। यूरोप के सहिष्णु, उदार और लोकतांत्रिक नेताओं ने खुल कर कहा है कि आतंकवाद का अब एक नाम है, एक धर्म है और धर्म है इस्लाम। दुनिया के तमाम इस्लामी देशों ने इस पर जैसी प्रतिक्रिया दी है उससे इस बात पर मुहर लगी है कि आतंकवाद का एक धर्म है। अगर ऐसा नहीं होता है तो दुनिया के सारे मुसलमान फ्रांस की घटना पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे होते। फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून क्लास रूम में दिखाने पर नाराज 18 साल के एक मुस्लिम छात्र ने शिक्षक की गला काट कर हत्या कर दी। इसकी आलोचना करने की बजाय भारत के जाने-माने शायर मुनव्वर राणा जैसे व्यक्ति ने कहा कि अगर उस छात्र की जगह वे होते तो वे भी ऐसा ही करते।

सोचें, मुनव्वर राणा भारत की सेकुलर मुस्लिम जमात के प्रतिनिधि चेहरे हैं और उनको लग रह है कि 18 साल के युवक ने शिक्षक का सिर काट कर अच्छा किया है तो इससे बाकी दुनिया के बारे में क्या निष्कर्ष निकलता है। फिर तो तुर्की के राष्ट्रपति या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया तो बहुत स्वाभाविक लगती है। आखिर ये दोनों इस्लामी दुनिया में अपना वर्चस्व बनाने के लिए भरसक कोशिश में लगे हैं। इसलिए तुर्की के एर्दोआन और पाकिस्तान के इमरान खान ने एक जैसी प्रतिक्रिया दी। एर्दोआन की अपील के बाद खाड़ी देशों से लेकर दुनिया भर के मुस्लिम देशों में फ्रांस की बनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हो गया। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि देशों में बड़ी संख्या में मुस्लिम सड़कों पर उतरे और फ्रांस का विरोध किया। इस्लामी आतंकवाद वाले बयान पर मैक्रों की खूब लानत-मलानत की।

इसके तुरंत बाद ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में मुंबई स्टाइल में आतंकवादी हमला हुआ। आतंकवादियों एक एक यहूदी धर्मस्थल पर गोलियां चला कर चार लोगों को मार डाला। ध्यान रहे वियना दुनिया में चैन-सुकून से रहने लायक जगहों में नंबर एक है। समूचा ऑस्ट्रिया व्यक्तिगत आजादी, उदारता, सहिष्णुता की मिसाल है। वहां सड़कों पर महिलाओं ने ‘वेलकम रिफ्यूजी’ के पोस्टर लेकर बाहर से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों का स्वागत किया। वहां बेवजह हुआ आतंकवादी हमला ऑस्ट्रिया के साथ साथ पूरे यूरोप को हिला देने वाला था। इसका असर लंबे समय तक रहने वाला है। इसका कारण यह है कि अब न तो यूरोप पीछे हटने वाला है और न इस्लामिक देश अपने को बदलने वाले हैं। इसलिए स्थायी टकराव बना है।

वैसे भी तुर्की में एर्दोआन की तानाशाही बहाल होने के बाद टकराव की गुंजाइश बहुत बढ़ गई है। तुर्की को इस बात की भी खुन्नस है कि उसके तमाम ऐड़ी रगड़ने के बावजूद उसे यूरोपीय संघ ने उसे यूरोप का हिस्सा बता कर अपने साथ शामिल नहीं किया। लेकिन इससे उसकी भौगोलिक स्थिति नहीं बदली है। वह अब भी यूरोप में प्रवेश का दरवाजा बना हुआ है। दूसरे, एर्दोआम की दिली इच्छा सऊदी अरब और पाकिस्तान की जगह इस्लामी दुनिया की सिरमौर बनने की है। एर्दोआन इन दोनों को अमेरिका और विकसित देशों का पिट्ठू बता कर अपने को असली गाजी बता रहे हैं। उन्होंने ऑटोमन साम्राज्य के पुराने गौरव को बहाल करने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए उस साम्राज्य की महानता बताने वाला एक सीरियल भी तुर्की की सरकार की मदद से बन रहा है, जिसे सारे इस्लामी मुल्कों में खूब देखा जा रहा है। अर्तरूल गाजी के ऊपर बना यह सीरियल शुद्ध इस्लाम की गौरव गाथा है।

फ्रांस और ऑस्ट्रिया पर हुए आतंकवादी हमले से पहले सोवियत संघ से अलग हुए दो देशों आर्मेनिया और अजरबैजान की लड़ाई में भी ईसाइयत और इस्लाम के निर्णायक जंग की झलक देखी जा रही है। इस युद्ध में भी देशों का ध्रुवीकरण शुरू हुआ था। सो, चाहे देशों के बीच जंग की शुरुआत से हो या नॉन स्टेट एक्टर्स यानी आतंकवादी संगठनों के साथ यूरोप के देशों की लड़ाई से शुरुआत हो। पर ऐसा लग रहा है कि लड़ाई किसी भी समय शुरू हो सकती है। फ्रांस पर हमले के बाद उसने माली में अलकायदा के आतंकवादी ठिकाने पर हमला किया। फ्रांस ने एयर स्ट्राइक में 50 से ज्यादा आतंकवादी मार डाले। फ्रांस ने और लगभग पूरे यूरोप ने आतंकवाद का नाम जान लिया है और धर्म पहचान लिया है। अब वे लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं। कई देशों ने नागरिकता वापस लेने के कानून बनाने की पहल की है। यानी जिन मुस्लिम शरणार्थियों को यूरोप के देशों में नागरिकता मिली है वह वापस ली जा सकती है। सो, कई स्तर पर यूरोप के देश कार्रवाई करेंगे और जवाबी कार्रवाई होगी तो जंग छिड़ेगी।

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